Saturday, 4 April 2026

यमदूत का अयोध्या प्रवेश

 उस दिन जब मृत्यु ने अयोध्या की दहलीज पर कदम रखा। एक वानर के तेज ने काल को भी झुका दिया और एक अंगूठी ने काल और समय का रहस्य खोल दिया। जब यमराज को यह खबर मिली कि उनके यमदूत अयोध्या की सीमा के अंदर कदम ही नहीं रख पा रहे हैं, तो वे चिंतित हो गए। यह कोई साधारण बात नहीं थी। जिन यमदूतों को पूरे संसार में कोई रोक नहीं सकता वे अयोध्या के पास पहुंचते ही वापस क्यों लौट रहे थे? यमराज ने तुरंत यमदूतों को बुलवाया और पूछा सच-सच बताओ आखिर वहां हो क्या रहा है? यमदूत कांपती आवाज में बोले प्रभु जैसे ही हम अयोध्या के द्वार के पास पहुंचते हैं वहां खड़े एक वानर के शरीर से ऐसा तेज निकलता है कि वो हमें जला देता है। उस प्रकाश को सहवाना हमारे लिए असंभव हो जाता है। हम आगे बढ़ ही नहीं पाते। यह सुनकर यमराज की आंखों में आश्चर्य और क्रोध दोनों आ गए। एक वानर और तुम सब उससे डर कर लौट आते हो। चित्रगुप्त ने आगे बढ़कर धीमे लेकिन गंभीर स्वर में कहा प्रभु वो कोई साधारण वानर नहीं है। वो स्वयं पवन पुत्र हनुमान हैं। कई वर्षों से अयोध्या में किसी की मृत्यु नहीं हो पाई है क्योंकि आपके दूत भीतर जा ही नहीं पा रहे। अब बात यमराज के सम्मान की थी। उन्होंने बिना एक पल गवाए अपने महेश्वर बैठकर अयोध्या की ओर प्रस्थान किया और कुछ ही क्षणों में वे अयोध्या के मुख्य द्वार पर पहुंच गए और वहां उनके सामने वही वानर खड़ा था शांत स्थिर तेजस्वी वो थे प्रभु श्री राम के परम भक्त हनुमान हनुमान जी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और विनम्र स्वर में कहा हे धर्मराज आपका इस पवित्र नगरी में स्वागत है। कृपया बताइए किस कार्य से पधारे हैं? मैं श्री राम से मिलने आया हूं। उनकी पृथ्वी लीला की अवधि पूर्ण हो चुकी है। समय किसी के लिए नहीं रुकता। हनुमान जी का चेहरा शांत ही रहा। पर उनकी आवाज अब पहले से अधिक दृढ़ थी। हे यमदेव, मेरे प्रभु की अनुमति के बिना कोई भी अयोध्या में प्रवेश नहीं कर सकता। यह सुनकर यमराज के चेहरे पर कठोरता आ गई। क्या तुम समय और काल को रोकने की कोशिश कर रहे हो? वानर। हनुमान ने शांत लेकिन अक स्वर में उत्तर दिया। मैं समय को नहीं रोक रहा। मैं अपने प्रभु की सेवा कर रहा हूं। अब बात केवल संवाद तक सीमित नहीं रही। यमराज ने अपना भयानक यमदंड उठा लिया। आकाश में गर्जना गूंज उठी और उसी क्षण युद्ध आरंभ हो गया। यमराज ने प्रचंड गर्जना की और पूरे बल से हनुमान जी की ओर प्रहार किया। लेकिन हनुमान जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपनी गदा घुमाई और यमराज के वार को रोक लिया। दोनों दिव्य अस्त्र आपस में टकराए तो ऐसी भयानक ध्वनि हुई कि दिशाएं गूंज उठी मानो पूरा ब्रह्मांड एक पल के लिए थम गया हो। यमराज ने दूसरा वार किया। इस बार अपनी विशाल गदा से वो वार प्रलय के समान था। पर हनुमान ने उसे भी रोक लिया। जब दोनों गदाएं टकराई तो यमराज की गदा टूट कर बिखर गई। क्षण भर के लिए यमराज भी चौंक गए। उन्हें ऐसी प्रतिरोध की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने तुरंत अपनी तलवार निकाली और पूरी शक्ति से हनुमान की ओर फेंक दी। तलवार बिजली की तरह चमकती हुई हनुमान की ओर बढ़ी। लेकिन जो हुआ वो किसी ने सोचा भी नहीं था। हनुमान जी ने हवा में ही उस तलवार को पकड़ लिया। फिर उन्होंने अपनी मुट्ठी कस ली। अगले ही पल वो तलवार टुकड़ों में टूट कर नीचे गिर पड़ी। अब यमराज के मन में पहली बार चिंता की लहर उठी। क्रोध, अपमान और चुनौती तीनों भाव उनके भीतर उमड़ रहे थे। उन्होंने अपना सबसे शक्तिशाली अस्त्र उठाया। यमदंड यह वही दंड था जिसके सामने देवता भी कांपते थे। यमराज ने पूरी शक्ति से उसे हनुमान की ओर चलाया। यमदंड आग की लपटों की तरह आगे बढ़ रहा था। उसे अपनी ओर आता देख हनुमान जी के नेत्र अग्नि के समान चमक उठे। उन्होंने तुरंत अपना स्वरूप बढ़ाना शुरू कर दिया। क्षण भर में उनका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया। उनके सामने यमराज छोटे प्रतीत होने लगे और जैसे ही यमदंड उनके समीप पहुंचा हनुमान जी ने अपना विशाल मुख खोला और उस दंड को उसी प्रकार निगल लिया जैसे कोई साधारण वस्तु हो। पूरा आकाश स्तब्ध रह गया। यमराज की आंखों में अविश्वास था। उनका सबसे शक्तिशाली अस्त्र निष्फल हो चुका था। अब हनुमान जी आगे बढ़े। उन्होंने अपनी गदा उठाई और ऐसा प्रहार किया कि यमराज पीछे हटने को विवश हो गए। वह प्रहार घातक नहीं था पर चेतावनी था। यमराज घायल हुए। पहली बार मृत्यु स्वयं पराजय का अनुभव कर रही थी। अपनी स्थिति समझते हुए यमराज युद्धभूमि से पीछे हट गए और कुछ ही क्षणों बाद वे यमलोक लौट गए। जब यमराज घायल अवस्था में यमलोक पहुंचे तो वहां सन्नाटा छा गया। यमदूत स्तब्ध खड़े थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी प्रश्न पूछने की। पर सबके मन में एक ही सवाल था। जिसके नाम से काल भी कांपता है उसे किसने पराजित किया? यमराज मौन थे। पर उनके भीतर एक अग्नि जल रही थी। यह केवल हार नहीं थी। यह उनके अधिकार को चुनौती थी। उन्होंने मन ही मन निश्चय किया। वे फिर लौटेंगे। उधर कुछ समय बीत गया। एक दिन हनुमान जी प्रभु श्री राम के चरण दबा रहे थे। अयोध्या का राजमहल शांत था। श्री राम सिंहासन पर विराजमान थे और गहरे विचार में डूबे हुए थे। उनकी उंगलियों में पहनी अंगूठी पर उनकी दृष्टि टिकी हुई थी। अचानक वो अंगूठी उनकी उंगली से फिसल गई। सबके सामने वो अंगूठी भूमि में बने एक छोटे से छिद्र में समा गई। श्री राम ने तुरंत कहा, हनुमान मेरी अंगूठी नीचे गिर गई है। उसे शीघ्र लेकर आओ। आदेश मिलते ही हनुमान जी ने एक पल भी देर नहीं की। उन्होंने तुरंत अपना सूक्ष्म रूप धारण किया और उस छिद्र के भीतर प्रवेश कर गए। हनुमान जी तेजी से नीचे की ओर बढ़ने लगे। पर यह क्या? अंगूठी उनसे आगे-आगे जा रही थी। वे पूरी शक्ति से दौड़ रहे थे। पर अंगूठी उनसे दूर होती जा रही थी। उन्होंने अपनी गति और बढ़ा दी। वे पृथ्वी के अनेक भागों से गुजरे। ऐसा लगा मानो वे पूरी धरती का चक्कर लगा रहे हो। फिर भी अंगूठी की गति उनसे अधिक थी। हनुमान जी के मन में प्रश्न उठने लगे। यह कैसी लीला है? क्या यह कोई परीक्षा है? क्या प्रभु कुछ संकेत देना चाहते हैं? उधर इसी समय यमराज ने दूसरी बार अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। अंततः हनुमान जी ने देखा कि वो अंगूठी सुमेरू पर्वत के भीतर स्थित एक गहरी गुफा में जा गिरी। वे तुरंत वहां पहुंचे। गुफा के बाहर एक वानर बैठा था। उसने हनुमान को रोकते हुए पूछा, "कौन हो तुम?" हनुमान जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "मैं हनुमान हूं।" यह सुनते ही वो वानर हंस पड़ा। इतने छोटे और दुर्बल तुम हनुमान हो। असली हनुमान तो भीतर हैं। यह सुनकर हनुमान जी स्वयं चकित रह गए। उन्होंने भीतर जाने की अनुमति मांगी। अनुमति मिलते ही वे गुफा के अंदर प्रवेश कर गए। जैसे ही वे अंदर पहुंचे, उन्होंने एक दिव्य प्रकाश से भरा वातावरण देखा। वहां एक विशाल अत्यंत तेजस्वी हनुमान विराजमान थे। उनका स्वरूप पर्वत के समान था। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, स्वागत है पवनपुत्र। तुम किस कार्य से आए हो? आप कौन हैं? और हम दोनों हनुमान कैसे हो सकते हैं? उस विराट स्वरूप ने उत्तर दिया, "मैं पिछले कल्प का हनुमान हूं। तुम इस कल्प के हनुमान हो। हनुमान जी स्तब्ध रह गए। मैं अपने प्रभु की अंगूठी लेने आया हूं। वो यहीं गिरी है। विराट हनुमान ने एक ओर संकेत किया। हनुमान जी ने देखा वहां अंगूठियों का एक विशाल ढेर पड़ा था। असंख्य अंगूठियां। जितनी दृष्टि जाए उतनी अंगूठियां। विराट हनुमान बोले जबजब पृथ्वी पर श्री राम अवतरित होते हैं। लीला पूर्ण होने के समय वे अपने हनुमान को अंगूठी लेने भेजते हैं। एक अंगूठी इस लोक में आती है और फिर दो हो जाती हैं। एक हनुमान अपने साथ ले जाते हैं। दूसरी यहीं रह जाती है। हनुमान जी ने विस्मय से पूछा। तो क्या यह सब बार-बार होता रहा है? उत्तर मिला। समय अनंत है। रामावतार भी अनंत है। तुम केवल एक चक्र के साक्षी हो। हनुमान जी की आंखें भर आई। उन्हें समझ आने लगा यह केवल अंगूठी की खोज नहीं थी। यह समय के अनंत चक्र का बोध था। उधर अयोध्या के द्वार पर यमराज दूसरी बार पहुंच चुके थे। इस बार वातावरण पहले जैसा नहीं था। जैसे ही वे हनुमान को पुकारने वाले थे। उसी क्षण आकाश से दिव्य वाणी गूंजी। हे धर्मराज प्रभु श्री राम आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हनुमान के लौटने से पहले आप महल में प्रवेश करें। श्री राम ने उन्हें सम्मान पूर्वक आसन दिया। दोनों आमने-सामने बैठे यमराज ने गंभीर स्वर में कहा प्रभु हमारा संवाद अत्यंत गोपनीय है। कोई इसे ना सुने यदि कोई सुन ले तो उसे मृत्युदंड देना होगा। श्री राम ने शांत भाव से सहमति दी। उन्होंने लक्ष्मण जी को बुलाया और कहा जब तक मैं स्वयं ना बुलाऊं कोई भीतर ना आए यदि कोई नियम तोड़े तो दंड अवश्य होगा। लक्ष्मण जी द्वार पर पहरा देने लगे। अंदर श्री राम और यमराज अवतार कार्य की पूर्णता और धाम गमन पर चर्चा कर रहे थे। उसी समय महल के द्वार पर एक तेजस्वी ऋषि पहुंचे। वह थे महर्षि दुर्वासा। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "मुझे तुरंत श्री राम से मिलना है।" लक्ष्मण जी ने विनम्रता से उत्तर दिया। इस समय प्रभु किसी से नहीं मिल सकते। यह सुनते ही दुर्वासा का क्रोध भड़क उठा। उन्होंने चेतावनी दी। यदि मुझे रोका गया तो मैं पूरी अयोध्या को श्राप दे दूंगा। अब लक्ष्मण जी धर्म संकट में पड़ गए। एक ओर प्रभु का आदेश। दूसरी ओर पूरी अयोध्या का विनाश। क्षण भर में उन्होंने निर्णय लिया। वे भीतर चले गए। जैसे ही लक्ष्मण भीतर पहुंचे, यमराज तुरंत अदृश्य हो गए। नियम भंग हो चुका था। श्री राम सब समझ गए। अब धर्म की मर्यादा निभानी थी। लक्ष्मण जी ने बिना एक शब्द बोले दंड स्वीकार कर लिया। उन्होंने अयोध्या को प्रणाम किया और सरयू नदी के तट पर जाकर जल में प्रवेश कर लिया। इस प्रकार उन्होंने देह त्याग दी। उधर गुफा में समय का रहस्य जानकर हनुमान जी अपनी अंगूठी लेकर लौटे। पर जब वे अयोध्या पहुंचे वातावरण बदल चुका था। श्री राम सरयू तट पर खड़े थे। सभी अनुयाई उपस्थित थे। धाम गमन का समय आ चुका था। हनुमान जी ने सब कुछ जान लिया। क्षण भर के लिए उनके हृदय में यमराज के प्रति रोष उठा। पर अगले ही पल वे शांत हो गए। उन्हें समझ आ गया यह सब प्रभु की योजना थी। श्री राम ने हनुमान को अपने पास बुलाया। मधुर स्वर में कहा हनुमान तुम पृथ्वी पर रहो। जब तक मेरा नाम रहेगा तुम जीवित रहोगे। जहां राम कथा होगी वहां तुम उपस्थित रहोगे। हनुमान जी ने प्रभु के चरण पकड़ लिए। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। श्री राम सरयू में प्रवेश कर गए। अवतार पूर्ण हुआ। कहते हैं उस दिन मृत्यु भी समझ गई कि भक्ति के सामने उसका अधिकार सीमित है। काल सबको ले जाता है पर सच्ची भक्ति को नहीं। इसीलिए हनुमान आज भी जीवित हैं। जहां-जहां राम का नाम वहांवहां हनुमान। अगर आपको यह प्रसंग मूल्यवान लगा हो तो इस वीडियो को लाइक करें और अपने परिवार के साथ जरूर शेयर करें। ऐसी ही और आध्यात्मिक गहराइयों को जानने के लिए पेज को फॉलो करें और कमेंट्स में जय बजरंग बली जरूर लिखें।

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