Friday, 8 May 2026

बाबा वेंगा - एलियन की भविष्यवाणी

 रहस्यमय चैतसिक शक्ति रखने वाली भविष्यवेत्ता ।


दुनिया की प्रसिद्ध भविष्यवेत्ता व्यक्तियों में बाबा वंगा ( वेंगा ) का नाम अग्रगण्य है । बाबा वंगा ( वांगा ) बुल्गारिया की नेत्रहीन महिला थीं ।

The future is hidden in symbols, waiting for those who can see. ‘भविष्य प्रतीकों में छिपा हुआ है, वह उन लोगों की प्रतीक्षा करता है जो उसे देख सकते हैं ।’ – Nostradamus ( नोस्ट्राडेमस ) ।


‘I see what is coming, but I cannot change what people choose.’


‘मैं जो आने वाला है ( होने वाला है ) उसे देखती हूँ, पर मैं लोगों के निर्णय को बदल नहीं सकती ।’


My sight is a gift, not a power. I only relay what i see.


‘मेरी दृष्टि एक ( ईश्वर द्वारा दी गई ) भेंट है, शक्ति नहीं । मैं केवल वही बताती हूँ जो मैं देखती हूँ ।’


I do not predict to frighten, I predict to warn and help.


‘मैं किसी को डराने के लिए भविष्यवाणी नहीं करती, मैं उन्हें चेतावनी देने और सहायता करने के लिए भविष्यवाणी करती हूँ ।’


‘Those who ignore warnings often suffer the consequences.’


‘जो चेतावनियों को नजरअंदाज करते हैं, उन्हें प्रायः उसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं ।’


Do not fear the future, fear ignorance and inaction.


‘भविष्य से मत डरो, अज्ञान और निष्क्रियता से डरो ।’


 


महर्षि पतंजलि के पातंजल योग सूत्र में एक सूत्र है – ‘परिणामत्रयसयंमात् अतीत अनागत ज्ञानम्, ( ३.१८ ) अर्थात तीन प्रकार के परिवर्तन पर संयम रखने से भूतकाल ( बीता हुआ समय ) और भविष्यकाल ( आने वाला समय ) का ज्ञान होता है । मानव मन अनंत शक्तियों का भंडार है । उसकी अगाध शक्तियों में से एक भविष्य ज्ञान से संबंधित है । कुछ लोगों में भविष्य ज्ञान की शक्ति जन्मजात होती है तो कुछ में दुर्घटनावश, अनायास, अचानक प्रकट हो जाती है, कुछ ध्यान-योग जैसी प्रक्रिया से ऐसी शक्ति विकसित कर लेते हैं ।


दुनिया की प्रसिद्ध भविष्यवेत्ता व्यक्तियों में बाबा वंगा ( वेंगा ) का नाम अग्रगण्य है । बाबा वंगा ( वांगा ) बुल्गारिया की नेत्रहीन महिला थीं जिन्हें ‘बाल्कन की नोस्ट्राडेमस’ कहा जाता है । उनका जन्म नाम वंगेलिया पांडेवा सुरचेवा (Vangeliya Pandeva Surcheva) था । बाद में वह विशेष रूप से वंगा दिमित्रोवा के रूप में जानी गईं । भविष्यवेत्ता होने के कारण आज लोग उन्हें विशेष रूप से बाबा वंगा (वेंगा) के नाम से जानते हैं । ३ अक्टूबर १९११ को ओटोमन साम्राज्य (वर्तमान में उत्तरी मैसेडोनिया) के सैलानिका प्रांत के स्ट्रूमिका में उनका जन्म हुआ था । ११ अगस्त १९९६ को ८५ वर्ष की आयु में सोफिया, बुल्गारिया में उनका निधन हुआ था । वह रहस्यवादी, चिकित्सक, उपचारक और भविष्यवेत्ता थीं ।


‘स्टोयानोवा’ के अनुसार जब वह १३ वर्ष की थीं तब एक चक्रवाती तूफान में हवा में उठकर पास के खेत में जा गिरी थीं । उनकी आंखें रेत, धूल और पत्थरों से ढक गई थीं । दर्द के कारण वह आंखें खोल नहीं पा रही थीं । उनकी आंखों को नुकसान हुआ था । उन पर दो ऑपरेशन किए गए लेकिन वे सफल नहीं हुए । तीसरा ऑपरेशन पूरा नहीं हो सका क्योंकि उनके पिता के पास उसके लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे । इसके परिणामस्वरूप उनकी दृष्टि धीरे-धीरे कम होती गई और अंततः वह पूरी तरह अंधी हो गईं लेकिन उसके बाद उनमें ऐसी दिव्य शक्ति प्रकट हुई जिससे उन्हें भविष्य की घटनाएं आंतरिक दृष्टि से दिखाई देने लगीं और उसके आधार पर वह भविष्यवाणी करती थीं जो अधिकांशतः सही सिद्ध होती थीं ।


बचपन में एक दिन उन्होंने अपनी बहन से कहा – मुझे अत्यंत दुख होता है कि हमारे पिता से हमारा वियोग होने वाला है । वे कुछ ही दिनों के मेहमान हैं । मुझे उनका मृत्यु दिखाई दे रही है । उन्होंने अपने पिता की मृत्यु की तारीख भी बताई । किसी ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया । लेकिन उन्होंने जो तारीख बताई थी उसी दिन उनका निधन हो गया । एक दिन उन्होंने अपनी बहन से कहा – ‘दूसरे देश का एक युवा और सुंदर सैनिक हमारे यहाँ आएगा और कुछ समय बाद मेरा विवाह उसी के साथ होगा । पेट्रिय के पास स्थित क्रांसझिलित्सा गाँव का बुल्गारियाई सैनिक गुश्तेरोव अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए हत्यारे का पता लगाने वंगा के पास आया था । १० मई १९४२ को दिमितार गुश्तेरोव ने वंगा से विवाह कर लिया था । वंगा को अपने पति की आयु कम होने का भी आभास हो गया था । उन्होंने इसके बारे में लिखा था – ‘मेरे पति युवा हैं फिर भी १ अप्रैल १९६२ को उनका निधन होगा । वास्तव में ऐसा ही हुआ । बीमारी और शराब की लत के कारण उसी दिन उनका निधन हो गया ।


१९६० के दशक में पेट्रिय नगरपालिका और इंस्टिट्यूट ऑफ सजेस्टोलॉजी ने वंगा की चैतसिक शक्तियों और भविष्यवाणियों का समर्थन किया था । वंगा पर १९७० की पुस्तक ‘साइकिक डिस्कवरीज बिहाइंड आयरन कर्टन’ में चर्चा की गई थी । बुल्गारियन कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्यों ने भी उनकी सलाह ली थी । सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव लियोनिद ब्रेझनेव ने भी उनकी सलाह ली थी । बुल्गारिया के जार बोरिस तृतीय ने भी उनसे मिलकर भविष्य जानने का प्रयास किया था ।


भविष्यवेत्ता के रूप में उनकी ख्याति चारों ओर फैल गई थी । उनके घर के बाहर असंख्य लोगों की भविष्य जानने के लिए लंबी कतारें लगती थीं । बुल्गारियाई लोगों से वह मात्र पाँच डॉलर शुल्क लेती थीं और विदेश से आए लोगों से लगभग तीस डॉलर लेती थीं । वह सारा धन देश के विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लिए सरकार को दे देती थीं और अपनी थोड़ी बहुत आवश्यकताओं के लिए सरकार से केवल लगभग ३०० डॉलर लेती थीं ।


वंगा दिमित्रोवा की अनेक भविष्यवाणियाँ बिल्कुल सत्य सिद्ध हुई हैं । उनके पिता, पति और स्वयं के निधन की जो तिथियाँ उन्होंने बताई थीं उन्हीं तिथियों पर उनका निधन हुआ था । उन्होंने १९८० में भविष्यवाणी की थी कि २००० में रूसी न्यूक्लियर सबमरीन कुर्स्क डूब जाएगी । अंतरराष्ट्रीय बचाव कर्मियों ने कई दिनों तक उस सबमरीन को समुद्र की गहराई से निकालने के प्रयास किए लेकिन वे असफल रहे और उसमें मौजूद लोगों की मृत्यु हो गई ।


११ सितंबर २००१ को न्यूयॉर्क के ट्विन टावर पर आतंकी हमला होने की भविष्यवाणी उन्होंने १९८९ में ही कर दी थी जो सत्य सिद्ध हुई । ट्विन टावर पर दो अपहृत विमानों से हमला कर निर्दोष लोगों की हत्या की गई थी । अमेरिका के ४४वें राष्ट्रपति अफ्रीकी-अमेरिकी होंगे यह भी उन्होंने कहा था और बराक ओबामा उसी प्रकार राष्ट्रपति बने । उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत कब होगी और उसका क्या परिणाम होगा इसकी भी भविष्यवाणी की थी । बुल्गारिया के राजा जार बोरिस-३ की मृत्यु की तिथि भी उन्होंने सही बताई थी । इसी प्रकार उन्होंने चेकोस्लोवाकिया के विभाजन, लेबनान में अशांति, निकारागुआ में युद्ध, साइप्रस में विवाद, इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने और उनकी हत्या, सोवियत संघ के विघटन, यूगोस्लाविया के टूटने, पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के एकीकरण, चेरनोबिल की परमाणु दुर्घटना, स्टालिन की मृत्यु, सीरिया के गृह युद्ध, क्रीमिया के अलग होने जैसी घटनाओं की भी सही भविष्यवाणियाँ की थीं । २००४ में हिंद महासागर में आई सुनामी की भविष्यवाणी भी उन्होंने १९५० में ही कर दी थी । वंगा दिमित्रोवा ने अपनी भविष्यवाणी में प्रिंसेस डायना की मृत्यु का भी उल्लेख किया था । २०१९/२० में फैली कोरोना महामारी के बारे में भी उन्होंने संकेत दिए थे । न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार वंगा ने २०२६ में तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत और मानव जाति का परग्रही जीवों ( Aliens ) से पहला संपर्क होने की भविष्यवाणी की थी ।


उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था – ‘Humanity will make contact with extraterrestrial life, possibly leading to a global crisis or apocalypse. मानवता का संपर्क परग्रही जीवनधारियों से होगा जिससे संभवतः वैश्विक संकट या प्रलय उत्पन्न हो सकता है । २०२६ में कुछ देशों के बीच युद्ध होने की भी भविष्यवाणी की गई थी । वंगा ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ( AI ) के उपयोग में वृद्धि के बारे में भी भविष्यवाणी की थी ।

Thursday, 30 April 2026

बुद्ध पूर्णिमा

 बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं ।💐💐    


 -1 मई 2026

कपिलवस्तु के पड़ौसी राजा दंडपाणि की कन्या गोपा के साथ सिद्धार्थ का विवाह हुआ था। दस वर्ष तक गोपा ने अपने पति सिद्धार्थ के साथ, जो बाद में बुद्ध हुए, सुखमय जीवन व्यतीत किया। ग्यारहवें वर्ष में वह गर्भवती हुई और सगर्भावस्था के दौरान उसे अलग-अलग दिनों में तीन स्वप्न आये।

एक दिन पहला स्वप्न आया कि श्वेत सांड है जिसके मस्तक पर मणि है और वह सांड नगर के द्वार की ओर मदमस्त हुआ जा रहा है। इन्द्र मंदिर से गोपा को ध्वनि मिली और वह घबराई हुई स्वप्न में ही सिद्धार्थ के गले लिपट गई। वह सांड वापस निकल गया और कहता गया कि मैं जा रहा हूँ। गोपा को स्वप्न में ही अनुभूति हुई कि ऐश्वर्य और यश मानो चला गया हो।

गोपा ने दूसरा स्वप्न देखा कि चार महापुरूष गणों के साथ नगर में आ रहे हैं। चाँदी के तार और मणि से गूँथी हुई सुनहरी पताका है लेकिन वह पताका गिर पड़ी है। नभ से सुमन की वृष्टि हो रही है।

गोपा ने तीसरा स्वप्न देखा कि सिद्धार्थ अचानक गायब हो गये हैं। अपनी माला अब साँप बन गई है। उफ ! पैरों से पायल निकल पड़ी है, स्वर्ण कंगन गिर पड़े हैं, केश के सुमन धूलि में समा गये हैं।

श्वेत सांड, पताका आदि सब लक्षण इस बात का आभास करा रहे हैं कि सिद्धार्थ गायब हो गये हैं, पलायन हो गये हैं। गोपा घबराई।

सिद्धार्थ जब प्रातः उठे तो उनके सम्मुख गोपा ने स्वप्न की बात कही। सिद्धार्थ पूर्वजन्म के अभ्यासी थे। भोग तो उन्हें ऐसे ही मुफ्त में मिले थे। पिछले जन्मों का पुण्य था इसलिए इस जन्म में भी भोग सुख जन्म से ही मिला लेकिन भगवान सदा अपने भक्तों को भोगों में पड़ा रहने देना नहीं चाहते हैं बल्कि उन्हें ऊपर उठाकर सत्संग और साधना की तरफ ले जाते हैं।

सिद्धार्थ ने अपनी पत्नी को सांत्वना दी लेकिन सुषुप्त वैराग्य जागृत हुआ और सिद्धार्थ चल पड़े। पति के जाने के बाद गोपा भी तपस्या में लग गई और प्रार्थना करने लगी किः "हे प्रभु ! मेरे पतिदेव तपस्या करने गये हैं। उनकी तपस्या में अप्सराएँ दुविधा उत्पन्न न करें.... कामिनियाँ उनकी तपस्या में विघ्न पैदा न करें। मैंने उनके साथ पाणिग्रहण किया है। मैं उनकी अर्द्धांगिनी हूँ। उनके विकास में मेरा भी विकास है।"

पति की भलाई के लिये इस प्रकार के संकल्प करती हुई गोपा भी तपस्या में लग गई।

सिद्धार्थ के पास जितना वैभव था, आपके पास तो उससे आधा भी नहीं होगा। वे जब घर छोड़कर गये तब अपने एक मंत्री को साथ ले गये थे जिसका नाम था छन्न। छन्न देखता है कि सिद्धार्थ वैराग्यवान हैं, वस्त्रालंकार उतारकर अब फकीरी वेश में जाना चाहते हैं, तब छन्न कहता हैः "आप स्वामी हैं, मैं सेवक हूँ। उपदेश देना मेरा अधिकार नहीं है फिर भी उम्र में आपसे बड़ा होने के कारण मैं आपके हितार्थ निवेदन कर रहा हूँ कि राजकुमार ! आप जल्दी कर रहे हैं। इन महलों-अट्टालिकाओं, इन हीरे जवाहरातों व राज-वैभव की तमाम सुख-सुविधाओं को छोड़कर नंगे पैर आप कहाँ जा रहे हैं राजकुमार ! क्या होगा इससे ? गोपा जैसी सुन्दर, सेवाभावी तथा परछाई की नाईं तुम्हारे साथ चलने वाली पत्नी, राजमहल, यश आदि सुख-सामग्रियों को छोड़कर तुम फकीरी ले रहे हो ! कहीं तुम जल्दी तो नहीं कर रहे हो ? अगर एक बार तुम सब छोड़कर फकीर हो गये तो दोबारा सुख-साधन की ये वस्तुएँ जुटाना मुश्किल हो जायेगा। तुम बहुत जल्दी कर रहे हो राजकुमार ! ऐसा वैभव सभी को नहीं मिलता है। ये तुम्हारे भाग्य की चीजें हैं। तुम इन्हें क्यों ठुकरा रहे हो ?"

सिद्धार्थ कहते हैं- "छन्न ! ये महल, यह पत्नी, ये हीरे-मोती, ये जवाहरात, तूने दूर से देखे हैं जबकि मैं इन्हें नजदीक से देख चुका हूँ और अधिकारपूर्ण उनका उपयोग भी कर चुका हूँ। तूने यशोधरा (गोपा) को दूर से देखा है और मैं उसके साथ 10-11 वर्ष तक जीवन व्यतीत कर चुका हूँ, लेकिन छन्न ! इन चीजों को हम कितना सम्हाल पाएँगे। ये चीजें अपने शरीर के साथ कितनी भी जोड़ दो लेकिन जब शरीर ही अपना नहीं तो ये चीजें कब तक रहेंगी ? मैं जल्दी नहीं कर रहा हूँ अपितु सचमुच मुझे जल्दी करनी चाहिए थी। दस वर्षों तक गृहस्थ धर्म में रहकर ग्यारहवें वर्ष में बाप बन गया हूँ। फिर ससुर बनूँगा, समधी बनूँगा और ये सब बनते-बनते एक दिन बिगड़ जाऊँगा और मर जाऊँगा। अनाथ होकर मर जाऊँ उसके पहले मुझे जीवन की सच्चाई का दर्शन करने के लिए भिक्षुक होना जरूरी है।"

छन्न को समझाकर सिद्धार्थ निकल पड़े।

सात वर्षों तक सिद्धार्थ निरंतर लगे रहे तो बुद्धत्व को प्राप्त हुए। जब बोध प्राप्त हुआ तो बुद्ध कहलाये छन्न जिस रास्ते से छोड़ गया था उससे नहीं, दूसरे रास्ते से बुद्ध वापस अपने घर आये।

पिता कहते हैं- "हमारे खानदान में ऐसा कोई बच्चा पैदा नहीं हुआ जो भीख माँगकर खाय और तू राजपाट होते हुए भी साधु बनकर भिक्षा माँगकर खाता है !"

बुद्ध बोलेः "राजन ! तुम्हारा रास्ता अलग है और मेरा रास्ता अलग है। मैं तुम्हारे कुटुम्ब से गुजरा अवश्य हूँ लेकिन हकीकत में मैं तो अनंत जन्मों से यात्रा करने वाला पथिक हूँ। प्रत्येक जीव अपने कर्मों की यात्रा लेकर चलता है। कुटुम्बी बीच में मिल जाते हैं और अन्त में फिर छूट जाते हैं लेकिन फिर जो नहीं छूटता वह परमात्मा ही सार है, बाकी सब खिलवाड़ है।"

बहुत सारे लोग बुद्ध के दर्शन करने आये लेकिन गोपा नहीं आई। उसने संदेशा भिजवाया कि मैं आपको छोड़कर नहीं गई जो मैं आपसे मिलने आऊँ। आप मुझे छोड़कर गये हैं। भले ही आप लोगों की दृष्टि में चाहे भगवान बन गये, बुद्ध बन गये लेकिन मैं तो अभी भी आपको अपने पति की दृष्टि से देखते हुए आपकी पत्नी ही हूँ इसलिए आप स्वयं ही मुझसे मिलने आइये।"

गोपा की तपस्या व शुभकामना से प्रसन्न होकर बुद्ध भिक्षुक-साधु होने के बाद भी अपनी पत्नी से वार्तालाप करने, मिलने गये लेकिन संसारी पति-पत्नी की तरह मिलने नहीं, ज्ञानयुक्त वार्तालाप करने गये।

पुत्र राहुल को गोपा कहती हैः "पिता से अपनी विरासत माँगो।"

राहुल कहता हैः "पिता जी ! मेरी विरासत ?"

बुद्ध कहते हैः "तेरी विरासत ! ले यह भिक्षापात्र। इससे बड़ी विरासत क्या हो सकती है ?" उस बच्चे को भी बुद्ध ने दीक्षा दे दी।

बुद्ध जानते हैं फकीरी का माहात्म्य। बुद्ध जानते हैं आत्मा का माहात्म्य। बुद्ध जानते हैं क्षमा, करूणा व दया का माहात्म्य। शरीर को कितना ही खिलाया..... पिलाया.... घुमाया..... अंत में क्या ? सारी जिन्दगी इसके पीछे लग गई फिर भी बेवफा रहा। कभी सिर में दर्द है तो कभी पेट में दर्द है। कभी बुढ़ापे की कमजोरी है तो कभी मेले की धक्का-मुक्की की थकान है।

तन धरिया कोई न सुखिया देखा।

जो देखा सो दुखिया रे।।

यह शरीर कितनी भी सुविधाओं में रहा, अंत में तो इसका परिणाम राख है। यह शरीर राख में जल जाय उसके पहले जीव अगर अपने नाथ से मिल जाय तो उसका नाम है पुरूषार्थ। ऐसा पुरूषार्थ करने वाला भगवन्नाम से अपना मंगल कर सकता है।


 :- पूज्य बापूजी

Wednesday, 29 April 2026

शनिदेव कथा

 श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।

  एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-

नारद- बालक तुम कौन हो ?

बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।

नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?

बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।

   तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।

बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?

नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।

बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?

नारद- शनिदेव की महादशा।

  इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।

नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वर्य मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर्य मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-


1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।


2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

 

  ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।

       सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है l

Monday, 27 April 2026

जोक्स

 अकबर: बीरबल मुझे बताओ! अपने स्टाफ में सबसे ज्यादा काम करने वाले को कैसे पहचानोगे?


बीरबल: महाराज मैं सबको बुला लाता हूँ, फिर बताता हूँ!


(बीरबल सबको बुलाता है और एक का हाथ पकड़ के कहता है-)


बीरबल: महाराज यही है वो!!


अकबर: तुमने कैसे पहचाना इसको?


बीरबल: महाराज! मैंने इसका मोबाईल चेक किया है, इसके मोबाईल की बैटरी 98% है!!😆😂

जोक्स

 पत्नी जी ने बड़े प्यार से कहा कि आइये आपके सर में तेल डाल देती हूं। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा और खुशी-खुशी बैठ गया।


हद तो तब हो गयी जब वो सर पर तेल डालकर चली गयी और दूसरे काम में लग गयी।


मैंने पूछा: "ये क्या है? जल्दी से आओ न, तेल टपक रहा है।"


पत्नी जी का सनसनाता जवाब सुनकर मैं बेहोश होते-होते बचा-


"आज शनिवार है, पंडित जी ने बताया है कि शादी के दिन से ही तुम पर शनि चढ़ा हुआ है! अपने प्रिय देवता पर तेल चढ़ाओ। अब 'तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो...' वाला गाना याद आ गया? बस!!!! चढ़ा दिया!!!"


अच्छा हुआ.. ससुरे ने नारियल फोड़ने का नहीं बोला....

Friday, 24 April 2026

सीता नवमी

 श्री सीता नवमी की हार्दिक शुभकामनाएं।


माँ सीता की सतीत्व-भावना


भगवान श्रीराम के वियोग तथा रावण और राक्षसियों के द्वारा किये जानेवाले अत्याचारों के कारण माँ सीता अशोक वाटिका में बड़ी दुःखी थीं । न तो वे भोजन करतीं न ही नींद । दिन-रात केवल श्रीराम-नाम के जप में ही तल्लीन रहतीं । उनका विषादग्रस्त मुखमंडल देखकर हनुमानजी ने पर्वताकार शरीर धारण करके उनसे कहा : ‘‘माँ ! आपकी कृपा से मेरे पास इतना बल है कि मैं पर्वत, वन, महल और रावणसहित पूरी लंका को उठाकर ले जा सकता हूँ । आप कृपा करके मेरे साथ चलें और भगवान श्रीराम व लक्ष्मण का शोक दूर करके स्वयं भी इस भयानक दुःख से मुक्ति पा लें ।’’

भगवान श्रीराम में ही एकनिष्ठ रहनेवाली जनकनंदिनी माँ सीता ने हनुमानजी से कहा : ‘‘हे महाकपि ! मैं तुम्हारी शक्ति और पराक्रम को जानती हूँ, साथ ही तुम्हारे हृदय के शुद्ध भाव एवं तुम्हारी स्वामीभक्ति को भी जानती हूँ । किंतु मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकती । पतिपरायणता की दृष्टि से मैं एकमात्र भगवान श्रीराम के सिवाय किसी परपुरुष का स्पर्श नहीं कर सकती । जब रावण ने मेरा हरण किया था तब मैं असमर्थ, असहाय और विवश थी । वह मुझे बलपूर्वक उठा लाया था । अब तो करुणानिधान भगवान श्रीराम ही स्वयं आकर, रावण का वध करके मुझे यहाँ से ले जायेंगे ।’’

(‘नारी तू नारायणी’ पुस्तक से)

Monday, 20 April 2026

बाली- हनुमान युद्ध

 मित्रों,,,आज आपको एक ऐसे कथा के बारे में बताने जा रहा हूँ,,जिसका विवरण संसार के किसी भी पुस्तक में आपको नही मिलेगा,, और ये कथा सत प्रतिशत सत्य कथा है,,


कथा का आरंभ तब का है ,, जब बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ,,की जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा,,उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी,, और इससे बाली हर युद्ध मे अजेय रहेगा,,


सुग्रीव, बाली दोनों ब्रम्हा के औरस ( वरदान द्वारा प्राप्त ) पुत्र हैं,,और ब्रम्हा जी की कृपा बाली पर सदैव बनी रहती है,,


बाली को अपने बल पर बड़ा घमंड था,,उसका घमंड तब ओर भी बढ़ गया,,जब उसने करीब करीब तीनों लोकों पर विजय पाए हुए रावण से युद्ध किया और रावण को अपनी पूँछ से बांध कर छह महीने तक पूरी दुनिया घूमी,,


रावण जैसे योद्धा को इस प्रकार हरा कर बाली के घमंड का कोई सीमा न रहा,,अब वो अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था,,और यही उसकी सबसे बड़ी भूल हुई,,


अपने ताकत के मद में चूर एक दिन एक जंगल मे पेड़ पौधों को तिनके के समान उखाड़ फेंक रहा था,,हरे भरे वृक्षों को तहस नहस कर दे रहा था,, अमृत समान जल के सरोवरों को मिट्टी से मिला कर कीचड़ कर दे रहा था,,


एक तरह से अपने ताक़त के नशे में बाली पूरे जंगल को उजाड़ कर रख देना चाहता था,,और बार बार अपने से युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था- है कोई जो बाली सेयुद्ध करने की हिम्मत रखता हो,,है कोई जो अपने माँ का दूध पिया हो,,जो बाली से युद्ध करके बाली को हरा दे,,


इस तरह की गर्जना करते हुए बाली उस जंगल को तहस नहस कर रहा था,, संयोग वश उसी जंगल के बीच मे हनुमान जी,, राम नाम का जाप करते हुए तपस्या में बैठे थे,,बाली की इस हरकत से हनुमान जी को राम नाम का जप करने में विघ्न लगा,,


और हनुमान जी बाली के सामने जाकर बोले- हे वीरों के वीर,, हे ब्रम्ह अंश,, हे राजकुमार बाली,,

( तब बाली किष्किंधा के युवराज थे) क्यों इस शांत जंगल को अपने बल की बलि दे रहे हो,,


हरे भरे पेड़ों को उखाड़ फेंक रहे हो,फलों से लदे वृक्षों को मसल दे रहे हो,,अमृत समान सरोवरों को दूषित मलिन मिट्टी से मिला कर उन्हें नष्ट कर रहे हो,,इससे तुम्हे क्या मिलेगा,,


तुम्हारे औरस पिता ब्रम्हा के वरदान स्वरूप कोई तुहे युद्ध मे नही हरा सकता,, क्योंकि जो कोई तुमसे युद्ध करने आएगा,, उसकी आधी शक्ति तुममे समाहित हो जाएगी,,


इसलिए हे कपि राजकुमार अपने बल के घमंड को शांत कर,,और राम नाम का जाप कर,,इससे तेरे मन में अपने बल का भान नही होगा,, और राम नाम का जाप करने से ये लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाएंगे,,


इतना सुनते ही बाली अपने बल के मद चूर हनुमान जी से बोला- ए तुच्छ वानर,, तू हमें शिक्षा दे रहा है, राजकुमार बाली को,,जिसने विश्व के सभी योद्धाओं को धूल चटाई है,, और जिसके एक हुंकार से बड़े से बड़ा पर्वत भी खंड खंड हो जाता है,, जा तुच्छ वानर, जा और तू ही भक्ति कर अपने राम वाम के,,


और जिस राम की तू बात कर रहा है,वो है कौन, और केवल तू ही जानता है राम के बारे में, मैंने आजतक किसी के मुँह से ये नाम नही सुना, और तू मुझे राम नाम जपने की शिक्षा दे रहा है,,


हनुमान जी ने कहा- प्रभु श्री राम, तीनो लोकों के स्वामी है,,उनकी महिमा अपरंपार है, ये वो सागर है जिसकी एक बूंद भी जिसे मिले वो भवसागर को पार कर जाए,,


बाली- इतना ही महान है राम तो बुला ज़रा,,मैं भी तो देखूं कितना बल है उसकी भुजाओं में,,


बाली को भगवान राम के विरुद्ध ऐसे कटु वचन हनुमान जो को क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त थे,,हनुमान- ए बल के मद में चूर बाली,, तू क्या प्रभु राम को युद्ध मे हराएगा,,

पहले उनके इस तुच्छ सेवक को युद्ध में हरा कर दिखा,,


बाली- तब ठीक है कल के कल नगर के बीचों बीच तेरा और मेरा युद्ध होगा,, हनुमान जी ने बाली की बात मान ली,,


बाली ने नगर में जाकर घोषणा करवा दिया कि कल नगर के बीच हनुमान और बाली का युद्ध होगा,, अगले दिन तय समय पर जब हनुमान जी बाली से युद्ध करने अपने घर से निकलने वाले थे,, तभी उनके सामने ब्रम्हा जी प्रकट हुए,,


हनुमान जी ने ब्रम्हा जी को प्रणाम किया और बोले- हे जगत पिता आज मुझ जैसे एक वानर के घर आपका पधारने का कारण अवश्य ही कुछ विशेष होगा,,


ब्रम्हा जी बोले- हे अंजनीसुत, हे शिवांश, हे पवनपुत्र, हे राम भक्त हनुमान,, मेरे पुत्र बाली को उसकी उद्दंडता के लिए क्षमा कर दो,, और युद्ध के लिए न जाओ,


हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु,,बाली ने मेरे बारे में कहा होता तो मैं उसे क्षमा कर देता,, परन्तु उसने मेरे आराध्य श्री राम के बारे में कहा है जिसे मैं सहन नही कर सकता,,और मुझे युद्ध के लिए चुनौती दिया है,,जिसे मुझे स्वीकार करना ही होगा,,अन्यथा सारी विश्व मे ये बात कही जाएगी कि हनुमान कायर है जो ललकारने पर युद्ध करने इसलिए नही जाता है क्योंकि एक बलवान योद्धा उसे ललकार रहा है,,


तब कुछ सोंच कर ब्रम्हा जी ने कहा- ठीक है हनुमान जी,,

पर आप अपने साथ अपनी समस्त सक्तियों को साथ न लेकर जाएं,,केवल दसवां भाग का बल लेकर जाएं,,

बाकी बल को योग द्वारा अपने आराध्य के चरणों में रख दे,,युद्ध से आने के उपरांत फिर से उन्हें ग्रहण कर लें,,


हनुमान जी ने ब्रम्हा जी का मान रखते हुए वैसे ही किया और बाली से युद्ध करने घर से निकले,, उधर बाली नगर के बीच मे एक जगह को अखाड़े में बदल दिया था,,और हनुमान जी से युद्ध करने को व्याकुल होकर बार बार हनुमान जी को ललकार रहा था,,


पूरा नगर इस अदभुत और दो महायोद्धाओं के युद्ध को देखने के लिए जमा था,,हनुमान जी जैसे ही युद्ध स्थल पर पहुँचे,, बाली ने हनुमान को अखाड़े में आने के लिए ललकारा,, ललकार सुन कर जैसे ही हनुमान जी ने एक पावँ अखाड़े में रखा,,


उनकी आधी शक्ति बाली में चली गई,,बाली में जैसे ही हनुमान जी की आधी शक्ति समाई,,बाली के शरीर मे बदलाव आने लगे,उसके शरीर मे ताकत का सैलाब आ गया,बाली का शरीर बल के प्रभाव में फूलने लगा,,

उसके शरीर फट कर खून निकलने लगा,,


बाली को कुछ समझ नही आ रहा था,,तभी ब्रम्हा जी बाली के पास प्रकट हुए और बाली को कहा- पुत्र जितना जल्दी हो सके यहां से दूर अति दूर चले जाओ,


बाली को इस समय कुछ समझ नही आ रहा रहा,,वो सिर्फ ब्रम्हा जी की बात को सुना और सरपट दौड़ लगा दिया,,सौ मील से ज्यादा दौड़ने के बाद बाली थक कर गिर गया,, कुछ देर बाद जब होश आया तो अपने सामने ब्रम्हा जी को देख कर बोला- ये सब क्या है।


हनुमान से युद्ध करने से पहले मेरा शरीर का फटने की हद तक फूलना,,फिर आपका वहां अचानक आना और ये कहना कि वहां से जितना दूर हो सके चले जाओ,मुझे कुछ समझ नही आया,,


ब्रम्हा जी बोले-, पुत्र जब तुम्हारे सामने हनुमान जी आये, तो उनका आधा बल तममे समा गया, तब तुम्हे कैसा लगा,,बाली- मुझे ऐसा लग जैसे मेरे शरीर में शक्ति की सागर लहरें ले रही है,, ऐसे लगा जैसे इस समस्त संसार मे मेरे तेज़ का सामना कोई नही कर सकता,, पर साथ ही साथ ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर अभी फट पड़ेगा,,,


ब्रम्हा जो बोले- हे बाली,मैंने हनुमान जी को उनके बल का केवल दसवां भाग ही लेकर तुमसे युद्ध करने को कहा,,

पर तुम तो उनके दसवें भाग के आधे बल को भी नही संभाल सके,, सोचो, यदि हनुमान जी अपने समस्त बल के साथ तुमसे युद्ध करने आते तो उनके आधे बल से तुम उसी समय फट जाते जब वो तुमसे युद्ध करने को घर से निकलते,,


इतना सुन कर बाली पसीना पसीना हो गया,,और कुछ देर सोच कर बोला- प्रभु, यदि हनुमान जी के पास इतनी शक्तियां है तो वो इसका उपयोग कहाँ करेंगे,,


ब्रम्हा- हनुमान जी कभी भी अपने पूरे बल का प्रयोग नही कर पाएंगे,,क्योंकि ये पूरी सृष्टि भी उनके बल के दसवें भाग को नही सह सकती,,


ये सुन कर बाली ने वही हनुमान जी को दंडवत प्रणाम किया और बोला,, जो हनुमान जी जिनके पास अथाह बल होते हुए भी शांत और रामभजन गाते रहते है और एक मैं हूँ जो उनके एक बाल के बराबर भी नही हूँ और उनको ललकार रहा था,,मुझे क्षमा करें,,


और आत्मग्लानि से भर कर बाली ने राम भगवान का तप किया और अपने मोक्ष का मार्ग उन्ही से प्राप्त किया,,


तो बोलो,

पवनपुत्र हनुमान की जय,

जय श्री राम जय श्री राम,,