Monday, 6 April 2026

સ્વસ્થ હૃદય

૩૦૦૦ વર્ષ પહેલાં ભારતમાં એક મહાન ઋષિ હતા. તેમનું નામ #મહર્ષિ વાગ્વતજી હતું. તેમણે અષ્ટાંગ હૃદયમ્ નામનો ગ્રંથ લખ્યો હતો.


➡️આ ગ્રંથમાં તેમણે રોગોના ઉપચાર માટે ૭૦૦૦ સૂત્રો લખ્યા હતા. આ તે સૂત્રોમાંથી એક છે.


➡️વાગ્વતજી લખે છે કે જો હૃદય પર હુમલો થઈ રહ્યો હોય, એટલે કે હૃદયની નળીઓમાં અવરોધ થવા લાગ્યો હોય, તો તેનો અર્થ એ છે કે લોહીમાં એસિડિટી વધી ગઈ છે. તમે એસિડિટી સમજો છો, જેને અંગ્રેજીમાં એસિડિટી કહેવાય છે.


➡️એસીડીટી બે પ્રકારની હોય છે, એક પેટની એસિડિટી અને બીજી બ્લડ એસિડિટી. જ્યારે તમારા પેટમાં એસિડિટી વધે છે, ત્યારે તમને પેટમાં બળતરા, ખાટા ફોલ્લા, મોઢામાંથી પાણી નીકળવાનો અનુભવ થશે અને જો આ એસિડિટી વધુ વધે છે તો તે હાઇપરએસીડીટી તરફ દોરી જશે અને જ્યારે આ પેટની એસિડિટી વધે છે અને લોહી સુધી પહોંચે છે ત્યારે તે લોહીની એસિડિટી બની જાય છે અને જ્યારે લોહીમાં એસિડિટી વધે છે ત્યારે આ એસિડિક લોહી હૃદયની નળીઓમાંથી પસાર થઈ શકતું નથી અને નળીઓમાં અવરોધ પેદા કરે છે, ત્યારે જ હાર્ટ એટેક આવે છે. આ વિના હાર્ટ એટેક આવતો નથી અને આ આયુર્વેદનું આ સૌથી મોટું સત્ય છે જે કોઈ ડૉક્ટર તમને કહેતું નથી કારણ કે તેની સારવાર સૌથી સરળ છે!


➡️ સારવાર શું છે 👉 વાગ્વત જી લખે છે કે જ્યારે લોહીમાં એસિડિટી વધી જાય છે ત્યારે તમારે એવી વસ્તુઓનો ઉપયોગ કરવો જોઈએ જે આલ્કલાઇન હોય. તમે જાણો છો કે એસિડિક અને આલ્કલાઇન બે પ્રકારની વસ્તુઓ હોય છે! એસિડિક અને આલ્કલાઇન હવે, જો તમે એસિડ અને આલ્કલાઇન ભેળવો છો તો શું થાય છે?

જો તમે એસિડ અને આલ્કલાઇન ભેળવો છો તો શું થાય છે?… બધા જાણે છે કે તે તટસ્થ છે. તો વાગ્વત જી લખે છે કે જો લોહીની એસિડિટી વધારે હોય, તો આલ્કલાઇન વસ્તુઓ ખાઓ! પછી લોહીની એસિડિટી તટસ્થ થઈ જશે! અને એકવાર લોહીમાં એસિડિટી ન્યુટ્રલ થઈ જાય, તો જીવનમાં હાર્ટ એટેક આવવાની શક્યતા રહેતી નથી!


➡️આ આખી વાર્તા છે! હવે તમે પૂછશો કે, એવી કઈ વસ્તુઓ છે જે આલ્કલાઇન છે અને આપણે ખાવી જોઈએ?


➡️તમારા રસોડામાં ઘણી બધી એવી વસ્તુઓ છે જે આલ્કલાઇન છે, જો તમે તે ખાશો, તો તમને ક્યારેય હાર્ટ એટેક નહીં આવે, અને જો તમને પહેલાથી જ હાર્ટ એટેક આવી ગયો હોય, તો તે ફરી નહીં થાય. આપણે બધા જાણીએ છીએ કે સૌથી આલ્કલાઇન વસ્તુ શું છે?


➡️આ વસ્તુ દરેક ઘરમાં સરળતાથી ઉપલબ્ધ છે, તેથી તે દૂધી છે જેને દૂધી પણ કહેવામાં આવે છે. દૂધીને અંગ્રેજીમાં દૂધી પણ કહેવામાં આવે છે જેને તમે શાકભાજી તરીકે ખાઓ છો! આનાથી વધુ આલ્કલાઇન વસ્તુ બીજી કોઈ નથી! તો તમારે દરરોજ દૂધીનો રસ પીવો જોઈએ અથવા કાચો દૂધી ખાવો જોઈએ.


➡️વાગવતજી કહે છે કે દૂધીમાં લોહીની એસિડિટી ઘટાડવાની મહત્તમ શક્તિ હોય છે, તેથી તમારે દૂધીનો રસ પીવો જોઈએ, તમારે કેટલું ખાવું જોઈએ? દરરોજ 200 થી 300 મિલિગ્રામ પીવો. તમારે તે ક્યારે પીવું જોઈએ? તમે તેને સવારે ખાલી પેટે (ટોઇલેટ ગયા પછી) અથવા નાસ્તાના અડધા કલાક પછી પી શકો છો. તમે આ દૂધીના રસમાં 7 થી 10 તુલસીના પાન ઉમેરીને તેને વધુ આલ્કલાઇન બનાવી શકો છો. તુલસી ખૂબ જ આલ્કલાઇન છે. તમે તેની સાથે 7 થી 10 ફુદીનાના પાન ઉમેરી શકો છો. ફુદીનો પણ ખૂબ જ આલ્કલાઇન છે. તમારે તેની સાથે કાળું મીઠું અથવા સિંધવ મીઠું ઉમેરવું જોઈએ, તે ખૂબ જ આલ્કલાઇન પણ છે.


➡️પરંતુ યાદ રાખો કે ફક્ત કાળા અથવા સિંધવ મીઠાનો ઉપયોગ કરો અને ક્યારેય અન્ય કોઈ આયોડાઇઝ્ડ મીઠું નહીં. આ આયોડાઇઝ્ડ મીઠું એસિડિક છે, તેથી તમારે આ દૂધીના રસનું સેવન કરવું જોઈએ. તે 2 થી 3 મહિનામાં તમારા હૃદયના બધા અવરોધોને મટાડી દેશે. તમને 21મા દિવસે જ સારા પરિણામો દેખાવા લાગશે. તમારે કોઈ ઓપરેશનની જરૂર નહીં પડે. આપણા ભારતના આયુર્વેદની મદદથી ઘરે જ તેની સારવાર કરવામાં આવશે અને તમારા કિંમતી શરીર અને લાખો રૂપિયા ઓપરેશનથી બચી જશે.

સનાતન ધર્મ શ્રેષ્ઠ છે.

Saturday, 4 April 2026

यमदूत का अयोध्या प्रवेश

 उस दिन जब मृत्यु ने अयोध्या की दहलीज पर कदम रखा। एक वानर के तेज ने काल को भी झुका दिया और एक अंगूठी ने काल और समय का रहस्य खोल दिया। जब यमराज को यह खबर मिली कि उनके यमदूत अयोध्या की सीमा के अंदर कदम ही नहीं रख पा रहे हैं, तो वे चिंतित हो गए। यह कोई साधारण बात नहीं थी। जिन यमदूतों को पूरे संसार में कोई रोक नहीं सकता वे अयोध्या के पास पहुंचते ही वापस क्यों लौट रहे थे? यमराज ने तुरंत यमदूतों को बुलवाया और पूछा सच-सच बताओ आखिर वहां हो क्या रहा है? यमदूत कांपती आवाज में बोले प्रभु जैसे ही हम अयोध्या के द्वार के पास पहुंचते हैं वहां खड़े एक वानर के शरीर से ऐसा तेज निकलता है कि वो हमें जला देता है। उस प्रकाश को सहवाना हमारे लिए असंभव हो जाता है। हम आगे बढ़ ही नहीं पाते। यह सुनकर यमराज की आंखों में आश्चर्य और क्रोध दोनों आ गए। एक वानर और तुम सब उससे डर कर लौट आते हो। चित्रगुप्त ने आगे बढ़कर धीमे लेकिन गंभीर स्वर में कहा प्रभु वो कोई साधारण वानर नहीं है। वो स्वयं पवन पुत्र हनुमान हैं। कई वर्षों से अयोध्या में किसी की मृत्यु नहीं हो पाई है क्योंकि आपके दूत भीतर जा ही नहीं पा रहे। अब बात यमराज के सम्मान की थी। उन्होंने बिना एक पल गवाए अपने महेश्वर बैठकर अयोध्या की ओर प्रस्थान किया और कुछ ही क्षणों में वे अयोध्या के मुख्य द्वार पर पहुंच गए और वहां उनके सामने वही वानर खड़ा था शांत स्थिर तेजस्वी वो थे प्रभु श्री राम के परम भक्त हनुमान हनुमान जी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और विनम्र स्वर में कहा हे धर्मराज आपका इस पवित्र नगरी में स्वागत है। कृपया बताइए किस कार्य से पधारे हैं? मैं श्री राम से मिलने आया हूं। उनकी पृथ्वी लीला की अवधि पूर्ण हो चुकी है। समय किसी के लिए नहीं रुकता। हनुमान जी का चेहरा शांत ही रहा। पर उनकी आवाज अब पहले से अधिक दृढ़ थी। हे यमदेव, मेरे प्रभु की अनुमति के बिना कोई भी अयोध्या में प्रवेश नहीं कर सकता। यह सुनकर यमराज के चेहरे पर कठोरता आ गई। क्या तुम समय और काल को रोकने की कोशिश कर रहे हो? वानर। हनुमान ने शांत लेकिन अक स्वर में उत्तर दिया। मैं समय को नहीं रोक रहा। मैं अपने प्रभु की सेवा कर रहा हूं। अब बात केवल संवाद तक सीमित नहीं रही। यमराज ने अपना भयानक यमदंड उठा लिया। आकाश में गर्जना गूंज उठी और उसी क्षण युद्ध आरंभ हो गया। यमराज ने प्रचंड गर्जना की और पूरे बल से हनुमान जी की ओर प्रहार किया। लेकिन हनुमान जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपनी गदा घुमाई और यमराज के वार को रोक लिया। दोनों दिव्य अस्त्र आपस में टकराए तो ऐसी भयानक ध्वनि हुई कि दिशाएं गूंज उठी मानो पूरा ब्रह्मांड एक पल के लिए थम गया हो। यमराज ने दूसरा वार किया। इस बार अपनी विशाल गदा से वो वार प्रलय के समान था। पर हनुमान ने उसे भी रोक लिया। जब दोनों गदाएं टकराई तो यमराज की गदा टूट कर बिखर गई। क्षण भर के लिए यमराज भी चौंक गए। उन्हें ऐसी प्रतिरोध की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने तुरंत अपनी तलवार निकाली और पूरी शक्ति से हनुमान की ओर फेंक दी। तलवार बिजली की तरह चमकती हुई हनुमान की ओर बढ़ी। लेकिन जो हुआ वो किसी ने सोचा भी नहीं था। हनुमान जी ने हवा में ही उस तलवार को पकड़ लिया। फिर उन्होंने अपनी मुट्ठी कस ली। अगले ही पल वो तलवार टुकड़ों में टूट कर नीचे गिर पड़ी। अब यमराज के मन में पहली बार चिंता की लहर उठी। क्रोध, अपमान और चुनौती तीनों भाव उनके भीतर उमड़ रहे थे। उन्होंने अपना सबसे शक्तिशाली अस्त्र उठाया। यमदंड यह वही दंड था जिसके सामने देवता भी कांपते थे। यमराज ने पूरी शक्ति से उसे हनुमान की ओर चलाया। यमदंड आग की लपटों की तरह आगे बढ़ रहा था। उसे अपनी ओर आता देख हनुमान जी के नेत्र अग्नि के समान चमक उठे। उन्होंने तुरंत अपना स्वरूप बढ़ाना शुरू कर दिया। क्षण भर में उनका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया। उनके सामने यमराज छोटे प्रतीत होने लगे और जैसे ही यमदंड उनके समीप पहुंचा हनुमान जी ने अपना विशाल मुख खोला और उस दंड को उसी प्रकार निगल लिया जैसे कोई साधारण वस्तु हो। पूरा आकाश स्तब्ध रह गया। यमराज की आंखों में अविश्वास था। उनका सबसे शक्तिशाली अस्त्र निष्फल हो चुका था। अब हनुमान जी आगे बढ़े। उन्होंने अपनी गदा उठाई और ऐसा प्रहार किया कि यमराज पीछे हटने को विवश हो गए। वह प्रहार घातक नहीं था पर चेतावनी था। यमराज घायल हुए। पहली बार मृत्यु स्वयं पराजय का अनुभव कर रही थी। अपनी स्थिति समझते हुए यमराज युद्धभूमि से पीछे हट गए और कुछ ही क्षणों बाद वे यमलोक लौट गए। जब यमराज घायल अवस्था में यमलोक पहुंचे तो वहां सन्नाटा छा गया। यमदूत स्तब्ध खड़े थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी प्रश्न पूछने की। पर सबके मन में एक ही सवाल था। जिसके नाम से काल भी कांपता है उसे किसने पराजित किया? यमराज मौन थे। पर उनके भीतर एक अग्नि जल रही थी। यह केवल हार नहीं थी। यह उनके अधिकार को चुनौती थी। उन्होंने मन ही मन निश्चय किया। वे फिर लौटेंगे। उधर कुछ समय बीत गया। एक दिन हनुमान जी प्रभु श्री राम के चरण दबा रहे थे। अयोध्या का राजमहल शांत था। श्री राम सिंहासन पर विराजमान थे और गहरे विचार में डूबे हुए थे। उनकी उंगलियों में पहनी अंगूठी पर उनकी दृष्टि टिकी हुई थी। अचानक वो अंगूठी उनकी उंगली से फिसल गई। सबके सामने वो अंगूठी भूमि में बने एक छोटे से छिद्र में समा गई। श्री राम ने तुरंत कहा, हनुमान मेरी अंगूठी नीचे गिर गई है। उसे शीघ्र लेकर आओ। आदेश मिलते ही हनुमान जी ने एक पल भी देर नहीं की। उन्होंने तुरंत अपना सूक्ष्म रूप धारण किया और उस छिद्र के भीतर प्रवेश कर गए। हनुमान जी तेजी से नीचे की ओर बढ़ने लगे। पर यह क्या? अंगूठी उनसे आगे-आगे जा रही थी। वे पूरी शक्ति से दौड़ रहे थे। पर अंगूठी उनसे दूर होती जा रही थी। उन्होंने अपनी गति और बढ़ा दी। वे पृथ्वी के अनेक भागों से गुजरे। ऐसा लगा मानो वे पूरी धरती का चक्कर लगा रहे हो। फिर भी अंगूठी की गति उनसे अधिक थी। हनुमान जी के मन में प्रश्न उठने लगे। यह कैसी लीला है? क्या यह कोई परीक्षा है? क्या प्रभु कुछ संकेत देना चाहते हैं? उधर इसी समय यमराज ने दूसरी बार अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। अंततः हनुमान जी ने देखा कि वो अंगूठी सुमेरू पर्वत के भीतर स्थित एक गहरी गुफा में जा गिरी। वे तुरंत वहां पहुंचे। गुफा के बाहर एक वानर बैठा था। उसने हनुमान को रोकते हुए पूछा, "कौन हो तुम?" हनुमान जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "मैं हनुमान हूं।" यह सुनते ही वो वानर हंस पड़ा। इतने छोटे और दुर्बल तुम हनुमान हो। असली हनुमान तो भीतर हैं। यह सुनकर हनुमान जी स्वयं चकित रह गए। उन्होंने भीतर जाने की अनुमति मांगी। अनुमति मिलते ही वे गुफा के अंदर प्रवेश कर गए। जैसे ही वे अंदर पहुंचे, उन्होंने एक दिव्य प्रकाश से भरा वातावरण देखा। वहां एक विशाल अत्यंत तेजस्वी हनुमान विराजमान थे। उनका स्वरूप पर्वत के समान था। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, स्वागत है पवनपुत्र। तुम किस कार्य से आए हो? आप कौन हैं? और हम दोनों हनुमान कैसे हो सकते हैं? उस विराट स्वरूप ने उत्तर दिया, "मैं पिछले कल्प का हनुमान हूं। तुम इस कल्प के हनुमान हो। हनुमान जी स्तब्ध रह गए। मैं अपने प्रभु की अंगूठी लेने आया हूं। वो यहीं गिरी है। विराट हनुमान ने एक ओर संकेत किया। हनुमान जी ने देखा वहां अंगूठियों का एक विशाल ढेर पड़ा था। असंख्य अंगूठियां। जितनी दृष्टि जाए उतनी अंगूठियां। विराट हनुमान बोले जबजब पृथ्वी पर श्री राम अवतरित होते हैं। लीला पूर्ण होने के समय वे अपने हनुमान को अंगूठी लेने भेजते हैं। एक अंगूठी इस लोक में आती है और फिर दो हो जाती हैं। एक हनुमान अपने साथ ले जाते हैं। दूसरी यहीं रह जाती है। हनुमान जी ने विस्मय से पूछा। तो क्या यह सब बार-बार होता रहा है? उत्तर मिला। समय अनंत है। रामावतार भी अनंत है। तुम केवल एक चक्र के साक्षी हो। हनुमान जी की आंखें भर आई। उन्हें समझ आने लगा यह केवल अंगूठी की खोज नहीं थी। यह समय के अनंत चक्र का बोध था। उधर अयोध्या के द्वार पर यमराज दूसरी बार पहुंच चुके थे। इस बार वातावरण पहले जैसा नहीं था। जैसे ही वे हनुमान को पुकारने वाले थे। उसी क्षण आकाश से दिव्य वाणी गूंजी। हे धर्मराज प्रभु श्री राम आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हनुमान के लौटने से पहले आप महल में प्रवेश करें। श्री राम ने उन्हें सम्मान पूर्वक आसन दिया। दोनों आमने-सामने बैठे यमराज ने गंभीर स्वर में कहा प्रभु हमारा संवाद अत्यंत गोपनीय है। कोई इसे ना सुने यदि कोई सुन ले तो उसे मृत्युदंड देना होगा। श्री राम ने शांत भाव से सहमति दी। उन्होंने लक्ष्मण जी को बुलाया और कहा जब तक मैं स्वयं ना बुलाऊं कोई भीतर ना आए यदि कोई नियम तोड़े तो दंड अवश्य होगा। लक्ष्मण जी द्वार पर पहरा देने लगे। अंदर श्री राम और यमराज अवतार कार्य की पूर्णता और धाम गमन पर चर्चा कर रहे थे। उसी समय महल के द्वार पर एक तेजस्वी ऋषि पहुंचे। वह थे महर्षि दुर्वासा। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "मुझे तुरंत श्री राम से मिलना है।" लक्ष्मण जी ने विनम्रता से उत्तर दिया। इस समय प्रभु किसी से नहीं मिल सकते। यह सुनते ही दुर्वासा का क्रोध भड़क उठा। उन्होंने चेतावनी दी। यदि मुझे रोका गया तो मैं पूरी अयोध्या को श्राप दे दूंगा। अब लक्ष्मण जी धर्म संकट में पड़ गए। एक ओर प्रभु का आदेश। दूसरी ओर पूरी अयोध्या का विनाश। क्षण भर में उन्होंने निर्णय लिया। वे भीतर चले गए। जैसे ही लक्ष्मण भीतर पहुंचे, यमराज तुरंत अदृश्य हो गए। नियम भंग हो चुका था। श्री राम सब समझ गए। अब धर्म की मर्यादा निभानी थी। लक्ष्मण जी ने बिना एक शब्द बोले दंड स्वीकार कर लिया। उन्होंने अयोध्या को प्रणाम किया और सरयू नदी के तट पर जाकर जल में प्रवेश कर लिया। इस प्रकार उन्होंने देह त्याग दी। उधर गुफा में समय का रहस्य जानकर हनुमान जी अपनी अंगूठी लेकर लौटे। पर जब वे अयोध्या पहुंचे वातावरण बदल चुका था। श्री राम सरयू तट पर खड़े थे। सभी अनुयाई उपस्थित थे। धाम गमन का समय आ चुका था। हनुमान जी ने सब कुछ जान लिया। क्षण भर के लिए उनके हृदय में यमराज के प्रति रोष उठा। पर अगले ही पल वे शांत हो गए। उन्हें समझ आ गया यह सब प्रभु की योजना थी। श्री राम ने हनुमान को अपने पास बुलाया। मधुर स्वर में कहा हनुमान तुम पृथ्वी पर रहो। जब तक मेरा नाम रहेगा तुम जीवित रहोगे। जहां राम कथा होगी वहां तुम उपस्थित रहोगे। हनुमान जी ने प्रभु के चरण पकड़ लिए। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। श्री राम सरयू में प्रवेश कर गए। अवतार पूर्ण हुआ। कहते हैं उस दिन मृत्यु भी समझ गई कि भक्ति के सामने उसका अधिकार सीमित है। काल सबको ले जाता है पर सच्ची भक्ति को नहीं। इसीलिए हनुमान आज भी जीवित हैं। जहां-जहां राम का नाम वहांवहां हनुमान। अगर आपको यह प्रसंग मूल्यवान लगा हो तो इस वीडियो को लाइक करें और अपने परिवार के साथ जरूर शेयर करें। ऐसी ही और आध्यात्मिक गहराइयों को जानने के लिए पेज को फॉलो करें और कमेंट्स में जय बजरंग बली जरूर लिखें।

Wednesday, 1 April 2026

हनुमान जयंती विशेष

 *श्री हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं।* 💐💐 


‘रामजी तुम्हें प्रेम करेंगे’..... 




श्री हनुमान जयंती, - 2 अप्रैल


हनुमानजी माता सीता की खोज में अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए लंका पहुँचे । अशोक वाटिका में माता सीता के दर्शन कर उन्हें भगवान राम का संदेश दिया । माता सीता हनुमानजी पर बहुत प्रसन्न हुईं तथा उनको आशीर्वाद दिया ।


कितनी कसौटियों से गुजरने के बाद हनुमानजी को माता सीता का आशीर्वाद प्राप्त होता है । सीताजी ने हनुमानजी को आशीर्वाद दिया कि ‘‘अजर बनो ।’’ लेकिन अजर होने (कभी वृद्ध न होने) का आशीर्वाद सुनकर हनुमानजी खामोश ही खड़े रहे, तनिक भी नहीं हिले-डुले । सीताजी को लगा कि शायद अजर होने का वरदान इसे कम पड़ता है, इसलिए उन्होंने दूसरा वरदान दिया कि ‘‘तुम अमर बनोगे ।’’ परंतु हनुमानजी इससे भी प्रभावित नहीं हुए । जब माता को लगा कि इसे अजर-अमर होने में रस नहीं है, तब तो उन्होंने तीसरा आशीर्वाद दिया कि ‘‘...गुननिधि सुत होहू । तुम गुणों की निधि होओगे ।’’


हनुमानजी को इससे भी आनंद न मिला तब माताजी समझ गयीं कि इसको किस बात की भूख है । उन्होंने कहा : ‘‘अजर, अमर और गुणनिधि तो ठीक लेकिन जाओ, मेरा आशीर्वाद है कि श्रीराम तुमसे बहुत प्रेम करेंगे ।


करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ।।’’


‘प्रेम करेंगे’- इतना सुनते ही हनुमानजी को मानो समाधि लग गयी । कुछ समय बाद वे बोले : ‘‘बस माँ ! मुझे यही चाहिए । मुझे अजर-अमरवाला वरदान नहीं, मुझे तो ‘मेरे भगवान मुझसे प्रेम करें’- यही चाहिए ।’’


सीता माता ने पूछा : ‘‘हनुमंत ! इतने सारे आशीर्वाद मिले फिर भी तुम खुश न हुए लेकिन ‘रामजी तुम्हें प्रेम करेंगे’ यह सुनकर तुम शरीर की सुध-बुध भी खो बैठे, इसका क्या कारण है ?’’


हनुमानजी ने वंदन कर कहा : ‘‘माता ! आप तो सर्वज्ञ हैं, सब जानती हैं । श्रीराम जिससे प्रेम करें, उसके लिए तो क्या कहना ! उसके वर्णन के लिए तो मेरे पास शब्द ही नहीं हैं ।’’


फिर लंका में अपनी पूँछ का चमत्कार दिखाकर प्रभु के पास लौटने से पहले हनुमानजी पुनः अशोक वाटिका में माता से आज्ञा माँगने पहुँचे तो हनुमानजी की सच्ची निष्ठा से माता बहुत प्रसन्न हुईं । सीता माता ने उन्हें भगवान श्रीराम के लिए संदेश दिया और आशीर्वाद देकर हनुमानजी को जाने की आज्ञा प्रदान की । हनुमानजी की अनन्य निष्ठा का ही तो यह फल है कि जहाँ भी ‘राम-लक्ष्मण-जानकी’ को याद किया जाता है, वहाँ हनुमानजी का जयघोष अवश्य होता है । 


राम लक्ष्मण जानकी । जय बोलो हनुमान की ।। 


(लोक कल्याण सेतु : मार्च 2013)

Thursday, 19 March 2026

Amway कंपनी का क्या हुआ

 AMWAY નામની માર્કેટિંગ કંપની શરૂ થઈ હતી. જેમાં ખૂબ પૈસા કમાઈ શકાશે. પછી શું થયું? કોઈ પૈસાદાર થયું?

AMWAY (એમવે) એક સમયે ભારતમાં ઘરે-ઘરે જાણીતું નામ બની ગયું હતું. "તમારા પોતાના બોસ બનો" અને "ઘરે બેઠા લાખો કમાઓ" જેવી વાતોને કારણે લાખો લોકો તેમાં જોડાયા હતા.


તમારા પ્રશ્નનો સીધો જવાબ એ છે કે: ખૂબ ઓછા લોકો (માત્ર 1% થી પણ ઓછા) આમાંથી પૈસાદાર થયા, જ્યારે મોટાભાગના લોકોએ માત્ર પૈસા અને સમય ગુમાવ્યો.


હાલમાં કંપનીની સ્થિતિ અને શું થયું તેની વિગતવાર હકીકત નીચે મુજબ છે:


૧. શું કોઈ ખરેખર પૈસાદાર થયું?


હા, પણ માત્ર ગણતરીના લોકો.


વાસ્તવિકતા: આ બિઝનેસ મોડેલ (Pyramid structure) એવું છે કે જેમાં માત્ર ટોચ પર બેઠેલા 1% લોકો જ મોટી કમાણી કરે છે.

નીચલા સ્તરના લોકો: 90% થી વધુ લોકો જેઓ ડિસ્ટ્રીબ્યુટર તરીકે જોડાયા હતા, તેઓને કોઈ ખાસ નફો થયો નથી. ઉલટાનું, મોંઘી પ્રોડક્ટ્સ ખરીદવી, સેમિનારની ફી અને આવવા-જવાનો ખર્ચ કાઢતા ઘણા લોકો ખોટમાં રહ્યા.

મોટાભાગના લોકો થોડા સમય પછી કંટાળીને અથવા નુકસાન કરીને નીકળી ગયા.

૨. કાયદાકીય મુસીબતો (સરકારી તપાસ)


સરકારને જ્યારે સમજાયું કે આ સ્કીમમાં નવા લોકોને જોડવાથી જ પૈસા ફરે છે (Money Circulation Scheme), ત્યારે કડક પગલાં લેવાયા:


ED (Enforcement Directorate) ની કાર્યવાહી: વર્ષ 2023-24 ની આસપાસ ED એ Amway India સામે મની લોન્ડરિંગનો કેસ કર્યો અને લગભગ 750 કરોડ રૂપિયાથી વધુની સંપત્તિ જપ્ત (Attach) કરી લીધી.

આરોપ: એજન્સીનું કહેવું હતું કે કંપની પ્રોડક્ટ વેચવા પર ધ્યાન આપવાને બદલે લોકોને "સભ્યો બનાવવા" પર વધુ ભાર આપે છે, જે એક પ્રકારનું પિરામિડ ફ્રોડ છે.

૩. અત્યારે શું સ્થિતિ છે? (Current Status 2025)


કંપની બંધ નથી થઈ, પણ તેનો વ્યાપ અને ક્રેઝ ઘણો ઘટી ગયો છે:


નુકસાન: તાજેતરના રિપોર્ટ્સ (2024-25) મુજબ, Amway India હવે નફાને બદલે ખોટ (Loss) કરી રહી છે.

નવો રસ્તો: કાયદાકીય ભીંસ વધતા કંપનીએ હવે પોતાની સ્ટ્રેટેજી બદલી છે. હવે તેઓ લોકોને "મેમ્બર" બનાવવાને બદલે સીધા "સ્ટોર" ખોલવા અને હેલ્થ/વેલનેસ પ્રોડક્ટ્સ વેચવા પર ધ્યાન આપી રહ્યા છે.

કંપનીના CEO એ તાજેતરમાં ભારતમાં નવું રોકાણ કરવાની જાહેરાત કરી છે, પણ હવે તે પહેલા જેવી "સ્કીમ" રહી નથી.

નિષ્કર્ષ


જે લોકો શરૂઆતમાં જોડાયા હતા (15-20 વર્ષ પહેલાં) તેઓ કદાચ પૈસાદાર થયા હશે, પરંતુ અત્યારે સામાન્ય માણસ માટે આમાં જોડાઈને પૈસાદાર થવું લગભગ અશક્ય છે. હવે લોકો પણ જાગૃત થઈ ગયા છે કે માત્ર મહેનત અને સ્કિલથી જ પૈસા કમાઈ 

શકાય છે, લોકોને જોડીને નહીં.


Thursday, 19 February 2026

तक्षक राजा कथा

"जिहाद "का जवाब "जिहाद" से देने वाला पहला हिंदू योद्धा तक्षक


मुहम्मद बिन कासिम ने सन 712 में भारत पर आक्रमण किया।


वह बेहद क्रूर और अत्याचारी था।


उसने अपने आक्रमण में एक भी युवा को जीवित नहीं छोड़ा।


कासिम के इस नरसंहार को 8 वर्ष का बालक तक्षक 

चुपचाप देख रहा था। वही इस कथा का मुख्य पात्र है।


तक्षक के पिता सिन्धु नरेश राजा दाहिर के सैनिक थे।

कासिम की सेना के साथ लड़ते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुए थे।


राजा दाहिर के मरने के बाद लूट मार करते हुए अरबी सेना तक्षक के गांव में पहुंची, तो गांव में हाहाकार मच गया।


स्त्रियों को घरों से बाहर खींच-खींच कर सरे-आम इज्ज़त लूटी जाने लगी।

भय के कारण तक्षक के घर में सब चिल्ला उठे। तक्षक की दो बहनें डर से कांपने लगीं।

 तक्षक की मां सब परिस्थिति भांप चुकी थी। उसने कुछ पल अपने तीनों बच्चों की तरफ देखा। 


उन्हें गले लगा लियाऔर रो पड़ी।


अगले ही पल उस क्षत्राणी ने तलवार से दोनों बेटियों का सिर धड़ से अलग कर दिया। 


उसकी मां ने तक्षक की ओर देखा और तलवार अपनी छाती में उतार ली। 


यह सब घटना आठ वर्ष का अबोध बालक "तक्षक" देख रहा था।


वह अबोध बालक अपने घर के पिछले दरवाजे से बाहर निकल कर खेतों की तरफ भागा।

और समय के साथ बड़ा होता गया।


तक्षक भटकता हुआ कन्नौज के राजा "नागभट्ट" के पास पहुँचा। उस समय वह 25 वर्ष का हो चुका था।


वह नागभट्ट की सेना में भर्ती हो गया।


अपनी बुद्धि बल के कारण वह कुछ ही समय में राजा का अंगरक्षक बन गया। 


तक्षक के चेहरे पर कभी न खुशी न गम दिखता था।


उसकी आंखें हमेशा क्रोध से लाल रहतीं थीं। उसके पराक्रम के किस्से सेना में सुनाए जाते थे।


तक्षक इतना बहादुर था कि तलवार के एक वार से हाथी का सिर कलम कर देता था।

सिन्धु पर शासन कर रही अरब सेना कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुकी थी लेकिन हमेशा नागभट्ट की बहादुर सेना उन्हें युद्ध में हरा देती थी।और वे भाग जाते थे। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते हुए राजा नागभट्ट की सेना इन भागे हुए जेहादियों का पीछा नहीं करती थी।


इसी कारण वे मजबूत होकर बार बार कन्नौज पर आक्रमण करते रहते थे।


एक बार फिर अरब के खलीफा के आदेश से सिन्धु की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण करने आयी।  


यह खबर पता चली तो कन्नौज के राजा नागभट्ट ने अपने सेनापतियों की बैठक बुलाई।      


सब अपने अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। 


इतने में महाराजा का अंग रक्षक तक्षक खड़ा हुआ। 


उसने कहा महाराज हमें दुश्मन को उसी की भाषा में ज़बाब देना होगा।


एक पल नागभट् ने तक्षक की ओर देखा,


फिर कहा कि अपनी बात खुल कर कहो तक्षक क्या कहना चाहते हो।


तक्षक ने महाराजा नागभट्ट से कहा कि अरब सैनिक महा बरबर, जालिम, अत्याचारी, जेहादी मानसिकता के लोग हैं। उनके साथ सनातन नियमों के अनुसार युद्ध करना अपनी प्रजा के साथ अन्याय होगा।


उन्हें उन्हीं की भाषा में ज़बाब देना होगा।


महाराजा ने कहा किन्तु हम धर्म और मर्यादा को कैसे छोड़ सकते हैं "तक्षक"।

तक्षक ने कहा कि मर्यादा और धर्म का पालन उनके साथ किया जाता है जो मर्यादा और धर्म का मर्म समझें। इन राक्षसों का धर्म हत्या और बलात्कार है। इनके साथ वैसा ही व्यवहार करके युद्ध जीता जा सकता है ।


राजा का मात्र एक ही धर्म होता है - प्रजा की रक्षा। राजन: आप देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें। मुहम्मद बिन कासिम ने युद्ध जीता, दाहिर को पराजित किया और उसके पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया।


यदि हम पराजित हुए तो हमारी स्त्रियों और बच्चों के साथ वे वैसा ही व्यवहार करेंगे।

महाराज: आप जानते ही हैं कि भारतीय नारियों को किस तरह खुले बाजार में राजा दाहिर के हारने के बाद बेचा गया । उनका एक वस्तु की तरह भोग किया गया।


महाराजा ने देखा कि तक्षक की बात से सभा में उपस्थित सारे सेनापति सहमत हैं।

महाराजा नागभट्ट गुप्त कक्ष की ओर तक्षक के साथ बढ़े और गुप्तचरों के साथ बैठक की।


 तक्षक के नेतृत्व में युद्ध लड़ने का फैसला हुआ। अगले ही दिन कन्नौज की सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चुका था। आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।


आधी रात बीत चुकी थी। अरब की सेना अपने शिविर में सो रही थी। 


अचानक ही तक्षक के नेतृत्व में एक चौथाई सेना अरब के सैनिकों पर टूट पड़ी।

जब तक अरब सैनिक संभलते तब तक मूली गाजर की तरह हजारों अरबी सैनिकों को तक्षक की सेना मार चुकी थी। किसी हिंदू शासक से रात्री युद्ध की आशा अरब सैनिकों को न थी। सुबह से पहले ही अरबी सैनिकों की एक चौथाई सेना मारी जा चुकी थी। बाकी सेना भाग खड़ी हुई। 


जिस रास्ते से अरब की सेना भागी थी उधर राजा नागभट्ट अपनी बाकी सेना के साथ खड़े थे। सारे अरबी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। एक भी सैनिक नहीं बचा। युद्ध समाप्त होने के बाद राजा नागभट्ट वीर तक्षक को ढूंढने लगे।

वीर तक्षक वीरगति को प्राप्त हो चुका था। उसने अकेले हजारों जेहादियों को मौत की नींद सुला दिया था।


राजा नागभट ने वीर तक्षक की भव्य प्रतिमा बनवायी।


 कन्नौज में आज भी उस बहादुर तक्षक की प्रतिमा विद्यमान है।


यह युद्ध सन् 733 में हुआ था। उसके बाद लगभग 300 वर्ष तक अरब से दूसरे किसी आक्रमणकारी को आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हुई।


यह इतिहास की घटना है जो सत्य पर आधारित है।


जागो हिन्दू जागो अपनी मातृभूमि की रक्षा करो।


राजेन्द्र सिंह आर्य

Sunday, 15 February 2026

शिवलिंग पर क्या चढ़ाए

 1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।

1. बुखार होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जल द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिला दूध भगवान शिव को चढ़ाएं।

3. शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है।

4. शिव को गंगा जल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

5. शहद से भगवान शिव का अभिषेक करने से टीबी रोग में आराम मिलता है।

6. यदि शारीरिक रूप से कमजोर कोई व्यक्ति भगवान शिव का अभिषेक गाय के शुद्ध घी से करे तो उसकी कमजोरी दूर हो सकती है।

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. भगवान शिव की पूजा चमेली के फूल से करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूलों से शिव की पूजा करने पर मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी वृक्ष के पत्तों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजा करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है।

6. जूही के फूल से भगवान शिव की पूजा करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से भगवान शिव की पूजा करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है।

10.लाल डंठलवाला धतूरा शिव पूजा में शुभ माना गया है।

अगर किसी व्यक्ति की शादी में बाधाएं आ रही हैं तो शिवलिंग पर केसर मिला कर दूध चढ़ाएं। माता पार्वती की भी पूजा करें।*

Monday, 9 February 2026

ભીષ્મ અને કર્ણ ના પાપ



























 મહાભારતના યુદ્ધ પછી જ્યારે ભગવાન કૃષ્ણ પાછા ફર્યા ત્યારે ક્રોધિત રુક્મિણીએ તેમને પૂછ્યું."બીજું બધું બરાબર છે, પણ તમે દ્રોણાચાર્ય અને ભીષ્મ પિતામહ જેવા ધર્મનિષ્ઠ લોકોની હત્યામાં કેમ સહકાર આપ્યો?"શ્રી કૃષ્ણએ જવાબ આપ્યો, "તે સાચું છે કે બંનેએ જીવનભર ધર્મનું પાલન કર્યું, પરંતુ તેઓએ કરેલા એક પાપે તેમના તમામ પુણ્ય છીનવી લીધા."

"તે પાપો શું હતા?"શ્રી કૃષ્ણએ કહ્યું, "જ્યારે સભામાં દ્રૌપદીનું વસ્ત્રાહરણ કરવામાં આવ્યું હતું, ત્યારે તે બંને હાજર હતા અને વડીલો તરીકે દુશાસનનો આદેશ આપી શક્યા હોત, પરંતુ તેઓએ તેમ ન કર્યું.

તેમના આ એક પાપને કારણે તેમની બિનસાંપ્રદાયિકતા ઓછી થઈ ગઈ."રુક્મિણીએ પૂછ્યું,

"અને કર્ણ? તે તેની ધર્માદા માટે પ્રખ્યાત હતો, તેના દરવાજેથી કોઈ ખાલી હાથે પસાર થયું ન હતું, તેમાં ખોટું શું છે?શ્રી કૃષ્ણએ કહ્યું, "તે સાચું છે કે તેઓ તેમના દાન માટે પ્રખ્યાત હતા અને ક્યારેય કોઈને નારાજ કરતા નહોતા. પરંતુ જ્યારે અભિમન્યુ યુદ્ધના મેદાનમાં ઘાયલ થયો, તેણે કર્ણ પાસે પાણી માંગ્યું, જે તેની પડખે ઊભો હતો. જ્યાં કર્ણ ઊભો હતો ત્યાં પાણીનો કૂવો હતો, પણ કર્ણએ મૃત્યુશૈયા પર ઘાયલ અભિમન્યુને પાણી ન આપ્યું.એટલે જીવનભર દાન દ્વારા મેળવેલ યોગ્યતા નષ્ટ પામ્યો હતો. પાછળથી તેના રથનું પૈડું એ જ ખાઈમાં ફસાઈ ગયું અને તેનું મૃત્યુ થયું."ઘણીવાર એવું બને છે કે આપણી આસપાસ કંઈક ખોટું થઈ રહ્યું છે અને આપણે કંઈ કરતા નથી. અમને લાગે છે કે અમે આ પાપનો ભાગ નથી, પરંતુ કંઈ ન કરીને, મદદ કરવાની સ્થિતિમાં પણ, અમે તેના સમાન ભાગ છીએ.જો આપણે કોઈ સ્ત્રી, વૃદ્ધ, નિર્દોષ કે નિર્બળને જુલમ થતો જોતા હોઈએ તો પણ જો આપણે તેમને મદદ ન કરીએ તો આપણે પણ તે પાપમાં ભાગીદાર હોઈએ છીએ. લોકો માર્ગ અકસ્માતમાં ઘાયલ વ્યક્તિને મદદ કરતા નથી કારણ કે તેઓ વિચારે છે કે તેઓ પોલીસ દ્વારા પકડાઈ જશે.તમારા અધર્મની એક ક્ષણ જીવનભરના ધર્મને નષ્ટ કરી શકે છે.