Thursday, 19 February 2026

तक्षक राजा कथा

"जिहाद "का जवाब "जिहाद" से देने वाला पहला हिंदू योद्धा तक्षक


मुहम्मद बिन कासिम ने सन 712 में भारत पर आक्रमण किया।


वह बेहद क्रूर और अत्याचारी था।


उसने अपने आक्रमण में एक भी युवा को जीवित नहीं छोड़ा।


कासिम के इस नरसंहार को 8 वर्ष का बालक तक्षक 

चुपचाप देख रहा था। वही इस कथा का मुख्य पात्र है।


तक्षक के पिता सिन्धु नरेश राजा दाहिर के सैनिक थे।

कासिम की सेना के साथ लड़ते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुए थे।


राजा दाहिर के मरने के बाद लूट मार करते हुए अरबी सेना तक्षक के गांव में पहुंची, तो गांव में हाहाकार मच गया।


स्त्रियों को घरों से बाहर खींच-खींच कर सरे-आम इज्ज़त लूटी जाने लगी।

भय के कारण तक्षक के घर में सब चिल्ला उठे। तक्षक की दो बहनें डर से कांपने लगीं।

 तक्षक की मां सब परिस्थिति भांप चुकी थी। उसने कुछ पल अपने तीनों बच्चों की तरफ देखा। 


उन्हें गले लगा लियाऔर रो पड़ी।


अगले ही पल उस क्षत्राणी ने तलवार से दोनों बेटियों का सिर धड़ से अलग कर दिया। 


उसकी मां ने तक्षक की ओर देखा और तलवार अपनी छाती में उतार ली। 


यह सब घटना आठ वर्ष का अबोध बालक "तक्षक" देख रहा था।


वह अबोध बालक अपने घर के पिछले दरवाजे से बाहर निकल कर खेतों की तरफ भागा।

और समय के साथ बड़ा होता गया।


तक्षक भटकता हुआ कन्नौज के राजा "नागभट्ट" के पास पहुँचा। उस समय वह 25 वर्ष का हो चुका था।


वह नागभट्ट की सेना में भर्ती हो गया।


अपनी बुद्धि बल के कारण वह कुछ ही समय में राजा का अंगरक्षक बन गया। 


तक्षक के चेहरे पर कभी न खुशी न गम दिखता था।


उसकी आंखें हमेशा क्रोध से लाल रहतीं थीं। उसके पराक्रम के किस्से सेना में सुनाए जाते थे।


तक्षक इतना बहादुर था कि तलवार के एक वार से हाथी का सिर कलम कर देता था।

सिन्धु पर शासन कर रही अरब सेना कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुकी थी लेकिन हमेशा नागभट्ट की बहादुर सेना उन्हें युद्ध में हरा देती थी।और वे भाग जाते थे। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते हुए राजा नागभट्ट की सेना इन भागे हुए जेहादियों का पीछा नहीं करती थी।


इसी कारण वे मजबूत होकर बार बार कन्नौज पर आक्रमण करते रहते थे।


एक बार फिर अरब के खलीफा के आदेश से सिन्धु की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण करने आयी।  


यह खबर पता चली तो कन्नौज के राजा नागभट्ट ने अपने सेनापतियों की बैठक बुलाई।      


सब अपने अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। 


इतने में महाराजा का अंग रक्षक तक्षक खड़ा हुआ। 


उसने कहा महाराज हमें दुश्मन को उसी की भाषा में ज़बाब देना होगा।


एक पल नागभट् ने तक्षक की ओर देखा,


फिर कहा कि अपनी बात खुल कर कहो तक्षक क्या कहना चाहते हो।


तक्षक ने महाराजा नागभट्ट से कहा कि अरब सैनिक महा बरबर, जालिम, अत्याचारी, जेहादी मानसिकता के लोग हैं। उनके साथ सनातन नियमों के अनुसार युद्ध करना अपनी प्रजा के साथ अन्याय होगा।


उन्हें उन्हीं की भाषा में ज़बाब देना होगा।


महाराजा ने कहा किन्तु हम धर्म और मर्यादा को कैसे छोड़ सकते हैं "तक्षक"।

तक्षक ने कहा कि मर्यादा और धर्म का पालन उनके साथ किया जाता है जो मर्यादा और धर्म का मर्म समझें। इन राक्षसों का धर्म हत्या और बलात्कार है। इनके साथ वैसा ही व्यवहार करके युद्ध जीता जा सकता है ।


राजा का मात्र एक ही धर्म होता है - प्रजा की रक्षा। राजन: आप देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें। मुहम्मद बिन कासिम ने युद्ध जीता, दाहिर को पराजित किया और उसके पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया।


यदि हम पराजित हुए तो हमारी स्त्रियों और बच्चों के साथ वे वैसा ही व्यवहार करेंगे।

महाराज: आप जानते ही हैं कि भारतीय नारियों को किस तरह खुले बाजार में राजा दाहिर के हारने के बाद बेचा गया । उनका एक वस्तु की तरह भोग किया गया।


महाराजा ने देखा कि तक्षक की बात से सभा में उपस्थित सारे सेनापति सहमत हैं।

महाराजा नागभट्ट गुप्त कक्ष की ओर तक्षक के साथ बढ़े और गुप्तचरों के साथ बैठक की।


 तक्षक के नेतृत्व में युद्ध लड़ने का फैसला हुआ। अगले ही दिन कन्नौज की सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चुका था। आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।


आधी रात बीत चुकी थी। अरब की सेना अपने शिविर में सो रही थी। 


अचानक ही तक्षक के नेतृत्व में एक चौथाई सेना अरब के सैनिकों पर टूट पड़ी।

जब तक अरब सैनिक संभलते तब तक मूली गाजर की तरह हजारों अरबी सैनिकों को तक्षक की सेना मार चुकी थी। किसी हिंदू शासक से रात्री युद्ध की आशा अरब सैनिकों को न थी। सुबह से पहले ही अरबी सैनिकों की एक चौथाई सेना मारी जा चुकी थी। बाकी सेना भाग खड़ी हुई। 


जिस रास्ते से अरब की सेना भागी थी उधर राजा नागभट्ट अपनी बाकी सेना के साथ खड़े थे। सारे अरबी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। एक भी सैनिक नहीं बचा। युद्ध समाप्त होने के बाद राजा नागभट्ट वीर तक्षक को ढूंढने लगे।

वीर तक्षक वीरगति को प्राप्त हो चुका था। उसने अकेले हजारों जेहादियों को मौत की नींद सुला दिया था।


राजा नागभट ने वीर तक्षक की भव्य प्रतिमा बनवायी।


 कन्नौज में आज भी उस बहादुर तक्षक की प्रतिमा विद्यमान है।


यह युद्ध सन् 733 में हुआ था। उसके बाद लगभग 300 वर्ष तक अरब से दूसरे किसी आक्रमणकारी को आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हुई।


यह इतिहास की घटना है जो सत्य पर आधारित है।


जागो हिन्दू जागो अपनी मातृभूमि की रक्षा करो।


राजेन्द्र सिंह आर्य

Sunday, 15 February 2026

शिवलिंग पर क्या चढ़ाए

 1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।

1. बुखार होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जल द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिला दूध भगवान शिव को चढ़ाएं।

3. शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है।

4. शिव को गंगा जल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

5. शहद से भगवान शिव का अभिषेक करने से टीबी रोग में आराम मिलता है।

6. यदि शारीरिक रूप से कमजोर कोई व्यक्ति भगवान शिव का अभिषेक गाय के शुद्ध घी से करे तो उसकी कमजोरी दूर हो सकती है।

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. भगवान शिव की पूजा चमेली के फूल से करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूलों से शिव की पूजा करने पर मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी वृक्ष के पत्तों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजा करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है।

6. जूही के फूल से भगवान शिव की पूजा करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से भगवान शिव की पूजा करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है।

10.लाल डंठलवाला धतूरा शिव पूजा में शुभ माना गया है।

अगर किसी व्यक्ति की शादी में बाधाएं आ रही हैं तो शिवलिंग पर केसर मिला कर दूध चढ़ाएं। माता पार्वती की भी पूजा करें।*

Monday, 9 February 2026

ભીષ્મ અને કર્ણ ના પાપ



























 મહાભારતના યુદ્ધ પછી જ્યારે ભગવાન કૃષ્ણ પાછા ફર્યા ત્યારે ક્રોધિત રુક્મિણીએ તેમને પૂછ્યું."બીજું બધું બરાબર છે, પણ તમે દ્રોણાચાર્ય અને ભીષ્મ પિતામહ જેવા ધર્મનિષ્ઠ લોકોની હત્યામાં કેમ સહકાર આપ્યો?"શ્રી કૃષ્ણએ જવાબ આપ્યો, "તે સાચું છે કે બંનેએ જીવનભર ધર્મનું પાલન કર્યું, પરંતુ તેઓએ કરેલા એક પાપે તેમના તમામ પુણ્ય છીનવી લીધા."

"તે પાપો શું હતા?"શ્રી કૃષ્ણએ કહ્યું, "જ્યારે સભામાં દ્રૌપદીનું વસ્ત્રાહરણ કરવામાં આવ્યું હતું, ત્યારે તે બંને હાજર હતા અને વડીલો તરીકે દુશાસનનો આદેશ આપી શક્યા હોત, પરંતુ તેઓએ તેમ ન કર્યું.

તેમના આ એક પાપને કારણે તેમની બિનસાંપ્રદાયિકતા ઓછી થઈ ગઈ."રુક્મિણીએ પૂછ્યું,

"અને કર્ણ? તે તેની ધર્માદા માટે પ્રખ્યાત હતો, તેના દરવાજેથી કોઈ ખાલી હાથે પસાર થયું ન હતું, તેમાં ખોટું શું છે?શ્રી કૃષ્ણએ કહ્યું, "તે સાચું છે કે તેઓ તેમના દાન માટે પ્રખ્યાત હતા અને ક્યારેય કોઈને નારાજ કરતા નહોતા. પરંતુ જ્યારે અભિમન્યુ યુદ્ધના મેદાનમાં ઘાયલ થયો, તેણે કર્ણ પાસે પાણી માંગ્યું, જે તેની પડખે ઊભો હતો. જ્યાં કર્ણ ઊભો હતો ત્યાં પાણીનો કૂવો હતો, પણ કર્ણએ મૃત્યુશૈયા પર ઘાયલ અભિમન્યુને પાણી ન આપ્યું.એટલે જીવનભર દાન દ્વારા મેળવેલ યોગ્યતા નષ્ટ પામ્યો હતો. પાછળથી તેના રથનું પૈડું એ જ ખાઈમાં ફસાઈ ગયું અને તેનું મૃત્યુ થયું."ઘણીવાર એવું બને છે કે આપણી આસપાસ કંઈક ખોટું થઈ રહ્યું છે અને આપણે કંઈ કરતા નથી. અમને લાગે છે કે અમે આ પાપનો ભાગ નથી, પરંતુ કંઈ ન કરીને, મદદ કરવાની સ્થિતિમાં પણ, અમે તેના સમાન ભાગ છીએ.જો આપણે કોઈ સ્ત્રી, વૃદ્ધ, નિર્દોષ કે નિર્બળને જુલમ થતો જોતા હોઈએ તો પણ જો આપણે તેમને મદદ ન કરીએ તો આપણે પણ તે પાપમાં ભાગીદાર હોઈએ છીએ. લોકો માર્ગ અકસ્માતમાં ઘાયલ વ્યક્તિને મદદ કરતા નથી કારણ કે તેઓ વિચારે છે કે તેઓ પોલીસ દ્વારા પકડાઈ જશે.તમારા અધર્મની એક ક્ષણ જીવનભરના ધર્મને નષ્ટ કરી શકે છે.

Friday, 19 December 2025

बरमूडा ट्राय एंगल

बरमूडा ट्रायएंगल समंदर का एक ऐसा रहस्यमय जाल है, जिसके बारे में सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि अटलांटिक महासागर में एक ऐसा इलाका है जहाँ जहाज़ और हवाई जहाज़ अचानक गायब हो जाते हैं। इस जगह को बरमूडा ट्रायएंगल कहा जाता है, जो फ्लोरिडा, बरमूडा और प्यूर्टो रिको के बीच स्थित है।


पिछले कई सालों से यहाँ ऐसी घटनाएं हुई हैं जो किसी जासूसी या थ्रिलर फिल्म से कम नहीं लगतीं। कोई जहाज़ निकला और फिर उसका कभी कोई पता नहीं चला। कोई हवाई जहाज़ उड़ा और फिर हमेशा के लिए इतिहास बन गया।


लेकिन सवाल वही है। आखिर क्यों।


कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे हैं रोग वेव्स, यानी अचानक उठने वाली बेहद विशाल समुद्री लहरें। ये लहरें इतनी ऊँची होती हैं कि पूरे जहाज़ को एक ही झटके में निगल सकती हैं, और वो भी बिना कोई निशान छोड़े।


काफी समय तक ऐसा माना जाता था कि ये लहरें सिर्फ कल्पना हैं। लेकिन बाद में सेटेलाइट से मिले सबूतों ने साबित कर दिया कि रोग वेव्स सच में होती हैं। और बरमूडा ट्रायएंगल, जहाँ मौसम अक्सर खराब रहता है और समुद्री धाराएं आपस में टकराती हैं, वहाँ ऐसी लहरों का बनना पूरी तरह संभव है।


तो हो सकता है कि ये रहस्यमय गायबियाँ किसी भूत प्रेत या एलियन की वजह से नहीं, बल्कि प्रकृति की बेरहम ताकत की वजह से हो रही हों। फिर भी कुछ सवाल आज भी अनसुलझे हैं।


बरमूडा ट्रायएंगल वो समंदर का रहस्यमयी जाल है जो सदियों से इंसानों को अपनी गिरफ्त में जकड़ता आ रहा है। अटलांटिक महासागर में फ्लोरिडा, बरमूडा द्वीप और प्यूर्टो रिको के बीच फैला ये त्रिकोणीय इलाका, जहाँ जहाज़ और हवाई जहाज़ ऐसे गायब होते हैं जैसे कोई अदृश्य ताकत उन्हें निगल गई हो।


बरमूडा ट्रायएंगल का नाम खास तौर पर 1950 से 1960 के दशक में मशहूर हुआ, जब लेखकों और मीडिया ने इसे डेविल्स ट्रायएंगल कहना शुरू किया। लेकिन इसकी कहानियां इससे भी कहीं पुरानी हैं।


1492 में क्रिस्टोफर कोलंबस ने अपनी समुद्री यात्रा के दौरान यहाँ अजीब घटनाएं दर्ज की थीं। उन्होंने लिखा कि कम्पास अजीब तरह से घूम रहा था और समंदर में रहस्यमयी चमकती रोशनियाँ दिखाई दे रही थीं।


20वीं सदी में ये रहस्य और भी गहरा हो गया।


1945 में फ्लाइट 19 नाम का अमेरिकी नेवी का ट्रेनिंग मिशन निकला। 5 बॉम्बर प्लेन आसमान में थे। रेडियो पर पायलट की आवाज़ आई कि हमारा कम्पास खराब हो गया है और सब कुछ अजीब लग रहा है। इसके बाद वो कभी नहीं मिले।


अगले दिन उन्हें खोजने गया सर्च प्लेन भी गायब हो गया। कुल 14 क्रू मेंबर्स और 13 सर्चर्स। कुल 27 लोग। जैसे हवा में विलीन हो गए।


1918 में USS साइक्लॉप्स नाम का विशाल जहाज़ 306 लोगों के साथ कोयला लेकर निकला। ना कोई SOS सिग्नल मिला, ना कोई मलबा। ये बरमूडा ट्रायएंगल की सबसे बड़ी और रहस्यमयी गुमशुदगी मानी जाती है।


1800 से अब तक 50 से ज्यादा जहाज़ और 20 से ज्यादा हवाई जहाज़ों के गायब होने की बातें दर्ज की जा चुकी हैं। 1967 में विचक्राफ्ट नाम की एक यॉट का सिर्फ 1 लाइफ जैकेट मिला। 1991 में एक इटालियन जहाज़ ने रेडियो पर कहा कि हमारे साथ कुछ भयानक हो रहा है, और फिर सब शांत हो गया।


इसके पीछे सिर्फ रोग वेव्स ही नहीं, और भी कारण बताए जाते हैं।


समंदर की गहराई में मौजूद मीथेन गैस के बुलबुले जब अचानक बाहर निकलते हैं, तो पानी का घनत्व कम हो जाता है। ऐसे में जहाज़ ऐसे डूब जाते हैं जैसे किसी दलदल में फंस गए हों। ये गैस हवाई जहाज़ के इंजन को भी प्रभावित कर सकती है। ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने इसे प्रयोगशाला में सिमुलेट करके भी दिखाया है।


इस इलाके में मैग्नेटिक गड़बड़ी की भी बातें सामने आई हैं। कम्पास कई बार सही दिशा नहीं दिखाते। यहाँ पृथ्वी की एक खास मैग्नेटिक लाइन गुजरती है, जिसे एगॉनिक लाइन कहा जाता है। अगर पायलट या कैप्टन सतर्क न हो, तो रास्ता भटकना तय है।


इसके अलावा तेज तूफान, घना कोहरा, गल्फ स्ट्रीम जैसी शक्तिशाली समुद्री धाराएं और इंसानी गलतियां भी हादसों की बड़ी वजह मानी जाती हैं। ये इलाका दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री और हवाई रास्तों में से एक है।


कुछ लोग अब भी एटलांटिस, रहस्यमयी ऊर्जा या UFO किडनैपिंग जैसी थ्योरीज़ पर यकीन करते हैं। चार्ल्स बर्लिट्ज की किताब ने इन कहानियों को और मशहूर किया। लेकिन ज़्यादातर वैज्ञानिक इन्हें कल्पना मानते हैं।


US कोस्ट गार्ड और इंश्योरेंस कंपनियों के मुताबिक, इस इलाके में हादसों की दर दुनिया के दूसरे समुद्री इलाकों से ज्यादा नहीं है। 2020 में SS Cotopaxi का मलबा मिला, जो 1925 में गायब हुआ था, लेकिन वो बरमूडा ट्रायएंगल के बाहर था।


तो शायद बरमूडा ट्रायएंगल कोई भूतिया जगह नहीं, बल्कि प्रकृति का एक खौफनाक लेकिन असली खेल है।


फिर भी समंदर का ये इलाका आज भी इंसान को सोचने पर मजबूर कर देता है।


रहस्य कुछ हद तक सुलझा है।

लेकिन रोमांच अब भी ज़िंदा है।

Friday, 12 December 2025

दीप जलाने की अनुमति पर बात

 

कैसे अदालतें हमें न्याय देंगी…?

कौन-सा जज हमारे पक्ष में खड़ा होगा…?


हम इतने कमजोर कब हो गए कि हिंदुओं को दीप जलाने की अनुमति देने वाले जज के खिलाफ महाभियोग लाया जा रहा है, और हम चुप बैठे हैं?


ना शोसल मिडिया पर पोस्ट कर रहे हैं…

ना किसी की पोस्ट को लाइक-रीट्वीट-कमेंट करके उसका साथ दे पा रहे हैं।


आवाज़ भी नहीं उठा पा रहे,

और जो उठा रहे हैं, हम उनके साथ भी खड़े नहीं हो पा रहे।


न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन पर विपक्ष का महाभियोग प्रस्ताव कई गंभीर सवाल खड़ा करता है।


सिर्फ सात साल में 64,700 से अधिक फैसले देने वाले, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहे गए न्यायाधीश पर अचानक “विचारधारा-प्रेरित” होने का आरोप, क्या यह सिर्फ संयोग है? या फिर विपक्ष की नीयत में ही खोट है?


असल विवाद थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति को लेकर था। सरकार और अदालत का मतभेद, पर विपक्ष ने इसे राजनीतिक लड़ाई में बदल दियाक्या एक धार्मिक परंपरा को निभाने की अनुमति देना इतना बड़ा अपराध है कि जज को संसद में घसीटा जाए?


या फिर विपक्ष अपनी कमजोर होती राजनीतिक ज़मीन को बचाने के लिए न्यायपालिका पर दबाव बनाने में लगा है?

Sunday, 23 November 2025

नल दमयंती प्रेम कथा

 *_नल-दमयंती कथा (Nal Damyanti Katha)_*

   

महाभारत महाकाव्य, में एक प्रसंग के अनुसार नल और दमयन्ती की कथा महाराज युधिष्ठिर को सुनाई गई थी।युधिष्ठिर को जुए में अपना सब-कुछ गँवा कर अपने भाइयों के साथ 12 वर्ष के वनवास तथा एक वर्ष के अग्यातवास पर जाना पड़ा। इस वनवास के समय धर्मराज युधिष्ठिर के आग्रह करने पर महर्षि बृहदश्व ने नल-दमयन्ती की कथा सुनाई।


निषाद देश में वीरसेन के पुत्र नल नाम के एक राजा हो चुके हैं। वे बड़े गुणवान्, परम सुन्दर, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, सबके प्रिय, वेदज्ञ एवं ब्राह्मणभक्त थे, उनकी सेना बहुत बड़ी थी।। वे स्वयं अस्त्रविद्या में बहुत निपुण थे। वे वीर, योद्धा, उदार और प्रबल पराक्रमी भी थे।


उन्हीं दिनों विदर्भ देश में भीष्मक नाम के एक राजा राज्य करते थे। उन्होंने दमन ऋषि को प्रसन्न करके उनके वरदान से चार संतानें प्राप्त की, तीन पुत्र दम, दान्त, और दमन एवं एक दमयन्ती नाम की कन्या। दमयन्ती लक्ष्मी के समान रूपवती थी।


निषध देश से जो लोग विदर्भ देश में आते थे, वे महाराज नल के गुणों की प्रशंसा करते थे। यह प्रशंसा दमयन्ती के कानों तक भी पहुँची थी। इसी तरह विदर्भ देश से आने वाले लोग राजकुमारी के रूप और गुणों की चर्चा महाराज नल के समक्ष करते। इसका परिणाम यह हुआ कि नल और दमयन्ती एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते गये।


दमयन्ती का स्वयंवर हुआ। जिसमें न केवल धरती के राजा, बल्कि देवता भी आ गए। नल भी स्वयंवर में जा रहा था। देवताओं ने उसे रोककर कहा कि वो स्वयंवर में न जाए। उन्हें यह बात पहले से पता थी कि दमयंती नल को ही चुनेगी।


सभी देवताओं ने भी नल का रूप धर लिया। स्वयंवर में एक साथ कई नल खड़े थे। सभी परेशान थे कि असली नल कौन होगा। लेकिन दमयंती जरा भी विचलित नहीं हुई, उसने आंखों से ही असली नल को पहचान लिया। सारे देवताओं ने भी उनका अभिवादन किया। इस तरह आंखों में झलकते भावों से ही दमयंती ने असली नल को पहचानकर अपना जीवनसाथी चुन लिया।


नव-दम्पत्ति को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हु्आ। दमयन्ती निषध-नरेश राजा नल की महारानी बनी। दोनों बड़े सुख से समय बिताने लगे। दमयन्ती पतिव्रताओं में शिरोमणि थी। अभिमान तो उसे कभी छू भी न सकता था। समयानुसार दमयन्ती के गर्भ से एक पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ। दोनों बच्चे माता-पिता के अनुरूप ही सुन्दर रूप और गुणसे सम्पन्न थे समय सदा एक सा नहीं रहता, दुःख-सुख का चक्र निरन्तर चलता ही रहता है।


वैसे तो महाराज नल गुणवान्, धर्मात्मा तथा पुण्यस्लोक थे, किन्तु उनमें एक दोष था, जुए का व्यसन। नल के एक भाई का नाम पुष्कर था। वह नल से अलग रहता था। उसने उन्हें जुए के लिए आमन्त्रित किया। खेल आरम्भ हुआ। भाग्य प्रतिकूल था। नल हारने लगे, सोना, चाँदी, रथ, राजपाट सब हाथ से निकल गया। महारानी दमयन्ती ने प्रतिकूल समय जानकर अपने दोनों बच्चों को विदर्भ देशकी राजधानी कुण्डिनपुर भेज दिया।


इधर नल जुए में अपना सर्वस्व हार गये।। उन्होंने अपने शरीर के सारे वस्त्राभूषण उतार दिये। केवल एक वस्त्र पहनकर नगर से बाहर निकले। दमयन्ती ने भी मात्र एक साड़ी में पति का अनुसरण किया।


एक दिन राजा नल ने सोने के पंख वाले कुछ पक्षी देखे। राजा नल ने सोचा, यदि इन्हें पकड़ लिया जाय तो इनको बेचकर निर्वाह करने के लिए कुछ धन कमाया जा सकता है। ऐसा विचारकर उन्होंने अपने पहनने का वस्त्र खोलकर पक्षियों पर फेंका। पक्षी वह वस्त्र लेकर उड़ गये।


अब राजा नल के पास तन ढकने के लिए भी कोई वस्त्र न रह गया। नल अपनी अपेक्षा दमयन्ती के दुःख से अधिक व्याकुल थे। एक दिन दोनों जंगल में एक वृक्ष के नीचे एक ही वस्त्र से तन छिपाये पड़े थे। दमयन्ती को थकावट के कारण नींद आ गयी। राजा नल ने सोचा, दमयन्ती को मेरे कारण बड़ा दुःख सहन करना पड़ रहा है। यदि मैं इसे इसी अवस्था में यहीं छोड़कर चल दूँ तो यह किसी तरह अपने पिताके पास पहुँच जायगी।


यह विचारकर उन्होंने तलवार से उसकी आधी साड़ी को काट लिया और उसी से अपना तन ढककर तथा दमयन्ती को उसी अवस्था में छोड़ कर वे चल दिये।


जब दमयन्ती की नींद टूटी तो बेचारी अपने को अकेला पाकर करुण विलाप करने लगी। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह अचानक अजगर के पास चली गयी और अजगर उसे निगलने लगा। दमयन्ती की चीख सुनकर एक व्याध ने उसे अजगर का ग्रास होने से बचाया। किंतु व्याध स्वभाव से दुष्ट था। उसने दमयन्ती के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उसे अपनी काम-पिपासा का शिकार बनाना चाहा।


दमयन्ती उसे शाप देते हुए बोली: यदि मैंने अपने पति राजा नल को छोड़कर किसी अन्य पुरुष का चिन्तन किया हो तो इस पापी व्याध के जीवन का अभी अन्त हो जाय।


दमयन्ती की बात पूरी होते ही व्याध के प्राण-पखेरू उड़ गये। दैवयोग से भटकते हुए दमयन्ती एक दिन चेदिनरेश सुबाहु के पास और उसके बाद अपने पिता के पास पहुँच गयी। अंततः दमयन्ती के सतीत्व के प्रभाव से एक दिन महाराज नल के दुःखो का भी अन्त हुआ। दोनों का पुनर्मिलन हुआ और राजा नल को उनका राज्य भी वापस मिल गया।


राजा नल किसका पुत्र था?

नल निषध देश के राजा वीरसेन के पुत्र थे।


नल-दमयंती कथा कहाँ से ली गई है?

महाकाव्य महाभारत।


दमयंती के पिता का नाम क्या था?

विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री थीं..!!

   *🙏🏻🙏🏽🙏🏾जय जय श्री राधे*🙏🏿🙏🙏🏼

Sunday, 16 November 2025

कमर दर्द , सरवाइकल और चारपाई...

 कमर दर्द , सरवाइकल और चारपाई....

Radhe radhe....

सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है। हमारे पूर्वजों को क्या लकड़ी को चीरना नहीं जानते थे ? वे भी लकड़ी चीरकर उसकी पट्टियाँ बनाकर डबल बेड बना सकते थे। डबल बेड बनाना कोई रॉकेट सायंस नहीं है। लकड़ी की पट्टियों में कीलें ही ठोंकनी होती हैं। चारपाई भी भले कोई सायंस नहीं है , लेकिन एक समझदारी है कि कैसे शरीर को अधिक आराम मिल सके। चारपाई बनाना एक कला है। उसे रस्सी से बुनना पड़ता है और उसमें दिमाग और श्रम लगता है।

जब हम सोते हैं , तब सिर और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की जरूरत होती है ; क्योंकि रात हो या दोपहर में लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते हैं। पेट को पाचनक्रिया के लिए अधिक खून की जरूरत होती है। इसलिए सोते समय चारपाई की जोली ही इस स्वास्थ का लाभ पहुंचा सकती है।


दुनिया में जितनी भी आरामकुर्सियां देख लें , सभी में चारपाई की तरह जोली बनाई जाती है। बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपडे की जोली का था , लकडी का सपाट बनाकर उसे भी बिगाड़ दिया गया है। चारपाई पर सोने से कमर और पीठ का दर्द का दर्द कभी नही होता है। दर्द होने पर चारपाई पर सोने की सलाह दी जाती है।

डबलबेड के नीचे अंधेरा होता है , उसमें रोग के कीटाणु पनपते हैं , वजन में भारी होता है तो रोज-रोज सफाई नहीं हो सकती। चारपाई को रोज सुबह खड़ा कर दिया जाता है और सफाई भी हो जाती है, सूरज का प्रकाश बहुत बढ़िया कीटनाशक है। खटिये को धूप में रखने से खटमल इत्यादि भी नहीं लगते हैं।


अगर किसी को डॉक्टर Bed Rest लिख देता है तो दो तीन दिन में उसको English Bed पर लेटने से Bed -Soar शुरू हो जाता है । भारतीय चारपाई ऐसे मरीजों के बहुत काम की होती है । चारपाई पर Bed Soar नहीं होता क्योकि इसमें से हवा आर पार होती रहती है ।

गर्मियों में इंग्लिश Bed गर्म हो जाता है इसलिए AC की अधिक जरुरत पड़ती है जबकि सनातन चारपाई पर नीचे से हवा लगने के कारण गर्मी बहुत कम लगती है ।

बान की चारपाई पर सोने से सारी रात Automatically सारे शारीर का Acupressure होता रहता है ।

गर्मी में छत पर चारपाई डालकर सोने का आनद ही और है। ताज़ी हवा , बदलता मोसम , तारों की छाव ,चन्द्रमा की शीतलता जीवन में उमंग भर देती है । हर घर में एक स्वदेशी बाण की बुनी हुई (प्लास्टिक की नहीं ) चारपाई होनी चाहिए ।

सस्ते प्लास्टिक की रस्सी और पट्टी आ गयी है , लेकिन वह सही नही है। स्वदेशी चारपाई के बदले हजारों रुपये की दवा और डॉक्टर का खर्च बचाया जा सकता है....radhe radhe....