Monday, 25 May 2026

गांधारी का श्राप

श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका महाभारत युद्ध के 36 वर्ष पश्चात समुद्र में डूब जाती है। द्वारिका के समुद्र में डूबने से पूर्व श्री कृष्ण सहित सारे यदुवंशी भी मारे जाते है। समस्त यदुवंशियों के मारे जाने और द्वारिका के समुद्र में विलीन होने के पीछे मुख्य रूप से दो घटनाएं जिम्मेदार है। एक माता गांधारी द्वारा श्री कृष्ण को दिया गया श्राप और दूसरा ऋषियों द्वारा श्री कृष्ण पुत्र सांब को दिया गया श्राप। आइए इस घटना पर विस्तार से जानते है।


गांधारी ने दिया था यदुवंश के नाश का श्राप - महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा


ऋषियों ने दिया था सांब को श्राप - महाभारत युद्ध के बाद जब छत्तीसवां वर्ष आरंभ हुआ तो तरह-तरह के अपशकुन होने लगे। एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व, देवर्षि नारद आदि द्वारका गए। वहां यादव कुल के कुछ नवयुवकों ने उनके साथ परिहास (मजाक) करने का सोचा। वे श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को स्त्री वेष में ऋषियों के पास ले गए और कहा कि ये स्त्री गर्भवती है। इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा?


ऋषियों ने जब देखा कि ये युवक हमारा अपमान कर रहे हैं तो क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया कि- श्रीकृष्ण का यह पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए एक लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा तुम जैसे क्रूर और क्रोधी लोग अपने समस्त कुल का संहार करोगे। उस मूसल के प्रभाव से केवल श्रीकृष्ण व बलराम ही बच पाएंगे। श्रीकृष्ण को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि ये बात अवश्य सत्य होगी।


मुनियों के श्राप के प्रभाव से दूसरे दिन ही सांब ने मूसल उत्पन्न किया। जब यह बात राजा उग्रसेन को पता चली तो उन्होंने उस मूसल को चुरा कर समुद्र में डलवा दिया। इसके बाद राजा उग्रसेन व श्रीकृष्ण ने नगर में घोषणा करवा दी कि आज से कोई भी वृष्णि व अंधकवंशी अपने घर में मदिरा तैयार नहीं करेगा। जो भी व्यक्ति छिपकर मदिरा तैयार करेगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। घोषणा सुनकर

द्वारकावासियों ने मदिरा नहीं बनाने का निश्चय किया। द्वारका में होने लगे थे भयंकर अपशकुन इसके बाद द्वारका में भयंकर अपशकुन होने लगे। प्रतिदिन आंधी चलने लगी। चूहे इतने बढ़ गए कि मार्गों पर मनुष्यों से ज्यादा दिखाई देने लगे। वे रात में सोए हुए मनुष्यों के बाल और नाखून कुतरकर खा जाया करते थे। सारस उल्लुओं की और बकरे गीदड़ों की आवाज निकालने लगे। गायों के पेट से गधे, कुत्तियों से बिलाव और नेवलियों के गर्भ से चूहे पैदा होने लगे। उस समय यदुवंशियों को पाप करते शर्म नहीं आती थी।


अंधकवंशियों के हाथों माक्रे गए थे प्रद्युम्न - जब श्रीकृष्ण ने नगर में होते इन अपशकुनों को देखा तो उन्होंने सोचा कि कौरवों की माता गांधारी का श्राप सत्य होने का समय आ गया है। इन अपशकुनों को देखकर तथा पक्ष के तेरहवें दिन अमावस्या का संयोग जानकर श्रीकृष्ण काल की अवस्था पर विचार करने लगे।


उन्होंने देखा कि इस समय वैसा ही योग बन रहा है जैसा महाभारत के युद्ध के समय बना था। गांधारी के श्राप को सत्य करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण ने यदुवंशियों को तीर्थयात्रा करने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण की आज्ञा से सभी राजवंशी समुद्र के तट पर प्रभास तीर्थ आकर निवास करने लगे।


प्रभास तीर्थ में रहते हुए एक दिन जब अंधक व वृष्णि वंशी आपस में बात कर रहे थे। तभी सात्यकि ने आवेश में आकर कृतवर्मा का उपहास और अनादर कर दिया। कृतवर्मा ने भी कुछ ऐसे शब्द कहे कि सात्यकि को क्रोध आ गया और उसने कृतवर्मा का वध कर दिया। यह देख अंधकवंशियों ने सात्यकि को घेर लिया और हमला कर दिया।


सात्यकि को अकेला देख श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न उसे बचाने दौड़े। सात्यकि और प्रद्युम्न अकेले ही अंधकवंशियों से भिड़ गए। परंतु संख्या में अधिक होने के कारण वे अंधकवंशियों को पराजित नहीं कर पाए और अंत में उनके हाथों मारे गए।

यदुवंशियों के नाश के बाद अर्जुन को बुलवाया था श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र और सात्यकि की मृत्यु से क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने एक मुट्ठी एरका घास उखाड़ ली। हाथ में आते ही वह घास वज्र के समान भयंकर लोहे का मूसल बन गई। उस मूसल से श्रीकृष्ण सभी का वध करने लगे। जो कोई भी वह घास उखाड़ता वह भयंकर मूसल में बदल जाती (ऐसा ऋषियों के श्राप के कारण हुआ था)।


उन मूसलों के एक ही प्रहार से प्राण निकल जाते थे। उस समय काल के प्रभाव से अंधक, भोज, शिनि और वृष्णि वंश के वीर मूसलों से एक-दूसरे का वध करने लगे। यदुवंशी भी आपस में लड़ते हुए मर ने लगे।


श्रीकृष्ण के देखते ही देखते सांब, चारुदेष्ण, अनिरुद्ध और गद की मृ त्यु हो गई। फिर तो श्रीकृष्ण और भी क्रोधित हो गए और उन्होंने शेष बचे सभी वीरों का संहार कर डाला। अंत में केवल दारुक (श्रीकृष्ण के सारथी) ही शेष बचे थे।


श्रीकृष्ण ने दारुक से कहा कि तुम तुरंत हस्तिनापुर जाओ और अर्जुन को पूरी घटना बता कर द्वारका ले आओ। दारुक ने ऐसा ही किया। इसके बाद श्रीकृष्ण बलराम को उसी स्थान पर रहने का कहकर द्वारका लौट आए।


बलरामजी के स्वधाम गमन के बाद ये किया श्रीकृष्ण ने – द्वारका आकर श्रीकृष्ण ने पूरी घटना अपने पिता वसुदेवजी को बता दी। यदुवंशियों के संहार की बात जान कर उन्हें भी बहुत दुख हुआ। श्रीकृष्ण ने वसुदेवजी से कहा कि आप अर्जुन के आने तक स्त्रियों की रक्षा करें। इस समय बलरामजी वन में मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनसे मिलने जा रहा हूं।


जब श्रीकृष्ण ने नगर में स्त्रियों का विलाप सुना तो उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि शीघ्र ही अर्जुन द्वारका आने वाले हैं। वे ही तुम्हारी रक्षा करेंगे। ये कहकर श्रीकृष्ण बलराम से मिलने चल पड़े।


वन में जाकर श्रीकृष्ण ने देखा कि बलरामजी समाधि में लीन हैं। देखते ही देखते उनके मुख से सफेद रंग का बहुत बड़ा सांप निकला और समुद्र की ओर चला गया। उस सांप के हजारों मस्तक थे। समुद्र ने स्वयं प्रकट होकर भगवान शेषनाग का स्वागत किया। बलरामजी द्वारा देह त्यागने के बाद श्रीकृष्ण उस सूने वन में विचार करते हुए घूमने लगे।


घूमते-घूमते वे एक स्थान पर बैठ गए और गांधारी द्वारा दिए गए श्राप के बारे में विचार करने लगे। देह त्यागने की इच्छा से श्रीकृष्ण ने अपनी इंद्रियों का संयमित किया और महायोग (समाधि) की अवस्था में पृथ्वी पर लेट गए। ऐसे त्यागी श्रीकृष्ण ने देह – जिस समय भगवान श्रीकृष्ण समाधि में लीन थे, उसी समय जरा नाम का एक शिकारी हिरणों का शिकार करने के उद्देश्य से वहां आ गया। उसने हिरण समझ कर दूर से ही श्रीकृष्ण पर बाण चला दिया। बाण चलाने के बाद जब वह अपना शिकार पकडऩे के लिए आगे बढ़ा तो योग में स्थित भगवान श्रीकृष्ण को देख कर उसे अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ।


तब श्रीकृष्ण को उसे आश्वासन दिया और अपने परमधाम चले गए। अंतरिक्ष में पहुंचने पर इंद्र, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, वसु, मुनि आदि सभी ने भगवान का स्वागत किया। इधर दारुक ने हस्तिनापुर जाकर यदुवंशियों के संहार की पूरी घटना पांडवों को बता दी। यह सुनकर पांडवों को बहुत शोक हुआ। अर्जुन तुरंत ही अपने मामा वसुदेव से मिलने के लिए द्वारका चल दिए। अर्जुन जब द्वारका पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर उन्हें बहुत शोक हुआ। श्रीकृष्ण की रानियां उन्हें देखकर रोने लगी।


उन्हें रोता देखकर अर्जुन भी रोने लगे और श्रीकृष्ण को याद करने लगे। इसके बाद अर्जुन वसुदेवजी से मिले। अर्जुन को देखकर वसुदेवजी बिलख-बिलख रोने लगे। वसुदेवजी ने अर्जुन को श्रीकृष्ण का संदेश सुनाते हुए कहा कि द्वारका शीघ्र ही समुद्र में डूबने वाली है अत: तुम सभी नगरवासियों को अपने साथ ले जाओ।


उन्हें रोता देखकर अर्जुन भी रोने लगे और श्रीकृष्ण को याद करने लगे। इसके बाद अर्जुन वसुदेवजी से मिले। अर्जुन को देखकर वसुदेवजी बिलख-बिलख रोने लगे। वसुदेवजी ने अर्जुन को श्रीकृष्ण का संदेश सुनाते हुए कहा कि द्वारका शीघ्र ही समुद्र में डूबने वाली है अत: तुम सभी नगरवासियों को अपने साथ ले जाओ।


अर्जुन अपने साथ ले गए श्रीकृष्ण के परिजनों को – वसुदेवजी की बात सुनकर अर्जुन ने दारुक से सभी मंत्रियों को बुलाने के लिए कहा। मंत्रियों के आते ही अर्जुन ने कहा कि मैं सभी नगरवासियों को यहां से इंद्रप्रस्थ ले जाऊंगा, क्योंकि शीघ्र ही इस नगर को समुद्र डूबा देगा।


अर्जुन अपने साथ ले गए श्रीकृष्ण के परिजनों को – वसुदेवजी की बात सुनकर अर्जुन ने दारुक से सभी मंत्रियों को बुलाने के लिए कहा। मंत्रियों के आते ही अर्जुन ने कहा कि मैं सभी नगरवासियों को यहां से इंद्रप्रस्थ ले जाऊंगा, क्योंकि शीघ्र ही इस नगर को समुद्र डूबा देगा।


अर्जुन ने मंत्रियों से कहा कि आज से सातवे दिन सभी लोग इंद्रप्रस्थ के लिए प्रस्थान करेंगे इसलिए आप शीघ्र ही इसके लिए तैयारियां शुरू कर दें। सभी मंत्री तुरंत अर्जुन की आज्ञा के पालन में जुट गए। अर्जुन ने वह रात श्रीकृष्ण के महल में ही बिताई।


गली सुबह श्रीकृष्ण के पिता वसुदेवजी ने प्राण त्याग दिए। अर्जुन ने विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार किया। वसुदेवजी की पत्नी देवकी, भद्रा, रोहिणी व मदिरा भी चिता पर बैठकर सती हो गईं। इसके बाद अर्जुन ने प्रभास तीर्थ में मारे गए समस्त यदुवंशियों का भी अंतिम संस्कार किया।


सातवे दिन अर्जुन श्रीकृष्ण के परिजनों तथा सभी नगरवासियों को साथ लेकर इंद्रप्रस्थ की ओर चल दिए। उन सभी के जाते ही द्वारका नगरी समुद्र में डूब गई। ये दृश्य देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। 

Tuesday, 19 May 2026

द्वापर युग अंत

 यह कथा द्वापर युग के अंत और कलयुग के प्रारंभ की संधि की है, जब कुरुक्षेत्र का मैदान रक्त से लाल हो चुका था।


महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद पांडवों ने राजपाट तो संभाल लिया, लेकिन उनके अंतर्मन में शांति नहीं थी। अपने ही बंधु-बांधवों और गुरुओं के वध के कारण उन पर 'गोत्र-हत्या' और 'ब्रह्म-हत्या' का दोष था। भगवान श्री कृष्ण के परामर्श पर, पांडव महादेव से क्षमा याचना करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए निकल पड़े।


पांडव सर्वप्रथम काशी पहुँचे, लेकिन भगवान शिव पांडवों द्वारा किए गए विनाश से रुष्ट थे। वे उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे गुप्त रूप से हिमालय चले गए। पांडव भी हार मानने वाले नहीं थे; वे उन्हें खोजते हुए केदारखंड (वर्तमान उत्तराखंड) की ऊँचाइयों तक पहुँच गए।

भगवान शिव ने पांडवों को आते देख एक बैल (वृषभ) का रूप धारण कर लिया और गुप्तकाशी के पास चर रहे पशुओं के झुंड में शामिल हो गए।


पांडवों को आभास हो गया कि महादेव इसी झुंड में छिपे हैं। तब भीम ने एक युक्ति अपनाई:


भीम ने अपना शरीर अत्यंत विशाल किया और दो पर्वतों पर अपने पैर फैला दिए।


सारे पशु भीम के पैरों के नीचे से निकल गए, लेकिन महादेव (बैल रूपी) ने एक वीर पांडव के चरणों के नीचे से निकलना स्वीकार नहीं किया।


जैसे ही भीम ने बैल को पकड़ने का प्रयास किया, महादेव भूमि में समाने लगे।


तभी भीम ने फुर्ती दिखाते हुए बैल की कूबड़ (पीठ का भाग) को कसकर पकड़ लिया। पांडवों की इस अडिग श्रद्धा को देखकर महादेव का हृदय पिघल गया और वे अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर उन्हें पापमुक्त कर दिया।


जब महादेव बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके शरीर के अंग पाँच अलग-अलग स्थानों पर ज्योतिर्मय रूप में प्रकट हुए। इन पाँचों स्थानों को पांडवों ने मंदिरों के रूप में स्थापित किया


1.केदारनाथ - यहाँ बैल की पीठ के आकार की शिला पूजी जाती है।


2.तुंगनाथ - यह विश्व का सबसे ऊँचा शिव मंदिर है।


3.रुद्रनाथ - यहाँ महादेव के 'नीलकंठ' मुख के दर्शन होते हैं।


4.मध्यमहेश्वर - यहाँ शिवजी के मध्य भाग की पूजा होती है।


5.कल्पेश्वर - यहाँ महादेव की जटाओं की पूजा होती है; यह वर्षभर खुला रहता है।


कहा जाता है कि जब शिव जी बैल रूप में धरती में समाए, तो उनका ऊपरी भाग (सिर) नेपाल की राजधानी काठमांडू में प्रकट हुआ, जिसे आज हम पशुपतिनाथ के नाम से जानते हैं। केदारनाथ और पशुपतिनाथ को एक ही स्वरूप का हिस्सा माना जाता है।


पांडवों द्वारा निर्मित ये मंदिर आज भी भक्तों के लिए मोक्ष का द्वार हैं। मान्यता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन के बाद अन्य चार केदारों की यात्रा करता है, उसके पितर तृप्त हो जाते हैं और उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है।

हर हर महादेव! 🙏

Friday, 8 May 2026

बाबा वेंगा - एलियन की भविष्यवाणी

 रहस्यमय चैतसिक शक्ति रखने वाली भविष्यवेत्ता ।


दुनिया की प्रसिद्ध भविष्यवेत्ता व्यक्तियों में बाबा वंगा ( वेंगा ) का नाम अग्रगण्य है । बाबा वंगा ( वांगा ) बुल्गारिया की नेत्रहीन महिला थीं ।

The future is hidden in symbols, waiting for those who can see. ‘भविष्य प्रतीकों में छिपा हुआ है, वह उन लोगों की प्रतीक्षा करता है जो उसे देख सकते हैं ।’ – Nostradamus ( नोस्ट्राडेमस ) ।


‘I see what is coming, but I cannot change what people choose.’


‘मैं जो आने वाला है ( होने वाला है ) उसे देखती हूँ, पर मैं लोगों के निर्णय को बदल नहीं सकती ।’


My sight is a gift, not a power. I only relay what i see.


‘मेरी दृष्टि एक ( ईश्वर द्वारा दी गई ) भेंट है, शक्ति नहीं । मैं केवल वही बताती हूँ जो मैं देखती हूँ ।’


I do not predict to frighten, I predict to warn and help.


‘मैं किसी को डराने के लिए भविष्यवाणी नहीं करती, मैं उन्हें चेतावनी देने और सहायता करने के लिए भविष्यवाणी करती हूँ ।’


‘Those who ignore warnings often suffer the consequences.’


‘जो चेतावनियों को नजरअंदाज करते हैं, उन्हें प्रायः उसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं ।’


Do not fear the future, fear ignorance and inaction.


‘भविष्य से मत डरो, अज्ञान और निष्क्रियता से डरो ।’


 


महर्षि पतंजलि के पातंजल योग सूत्र में एक सूत्र है – ‘परिणामत्रयसयंमात् अतीत अनागत ज्ञानम्, ( ३.१८ ) अर्थात तीन प्रकार के परिवर्तन पर संयम रखने से भूतकाल ( बीता हुआ समय ) और भविष्यकाल ( आने वाला समय ) का ज्ञान होता है । मानव मन अनंत शक्तियों का भंडार है । उसकी अगाध शक्तियों में से एक भविष्य ज्ञान से संबंधित है । कुछ लोगों में भविष्य ज्ञान की शक्ति जन्मजात होती है तो कुछ में दुर्घटनावश, अनायास, अचानक प्रकट हो जाती है, कुछ ध्यान-योग जैसी प्रक्रिया से ऐसी शक्ति विकसित कर लेते हैं ।


दुनिया की प्रसिद्ध भविष्यवेत्ता व्यक्तियों में बाबा वंगा ( वेंगा ) का नाम अग्रगण्य है । बाबा वंगा ( वांगा ) बुल्गारिया की नेत्रहीन महिला थीं जिन्हें ‘बाल्कन की नोस्ट्राडेमस’ कहा जाता है । उनका जन्म नाम वंगेलिया पांडेवा सुरचेवा (Vangeliya Pandeva Surcheva) था । बाद में वह विशेष रूप से वंगा दिमित्रोवा के रूप में जानी गईं । भविष्यवेत्ता होने के कारण आज लोग उन्हें विशेष रूप से बाबा वंगा (वेंगा) के नाम से जानते हैं । ३ अक्टूबर १९११ को ओटोमन साम्राज्य (वर्तमान में उत्तरी मैसेडोनिया) के सैलानिका प्रांत के स्ट्रूमिका में उनका जन्म हुआ था । ११ अगस्त १९९६ को ८५ वर्ष की आयु में सोफिया, बुल्गारिया में उनका निधन हुआ था । वह रहस्यवादी, चिकित्सक, उपचारक और भविष्यवेत्ता थीं ।


‘स्टोयानोवा’ के अनुसार जब वह १३ वर्ष की थीं तब एक चक्रवाती तूफान में हवा में उठकर पास के खेत में जा गिरी थीं । उनकी आंखें रेत, धूल और पत्थरों से ढक गई थीं । दर्द के कारण वह आंखें खोल नहीं पा रही थीं । उनकी आंखों को नुकसान हुआ था । उन पर दो ऑपरेशन किए गए लेकिन वे सफल नहीं हुए । तीसरा ऑपरेशन पूरा नहीं हो सका क्योंकि उनके पिता के पास उसके लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे । इसके परिणामस्वरूप उनकी दृष्टि धीरे-धीरे कम होती गई और अंततः वह पूरी तरह अंधी हो गईं लेकिन उसके बाद उनमें ऐसी दिव्य शक्ति प्रकट हुई जिससे उन्हें भविष्य की घटनाएं आंतरिक दृष्टि से दिखाई देने लगीं और उसके आधार पर वह भविष्यवाणी करती थीं जो अधिकांशतः सही सिद्ध होती थीं ।


बचपन में एक दिन उन्होंने अपनी बहन से कहा – मुझे अत्यंत दुख होता है कि हमारे पिता से हमारा वियोग होने वाला है । वे कुछ ही दिनों के मेहमान हैं । मुझे उनका मृत्यु दिखाई दे रही है । उन्होंने अपने पिता की मृत्यु की तारीख भी बताई । किसी ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया । लेकिन उन्होंने जो तारीख बताई थी उसी दिन उनका निधन हो गया । एक दिन उन्होंने अपनी बहन से कहा – ‘दूसरे देश का एक युवा और सुंदर सैनिक हमारे यहाँ आएगा और कुछ समय बाद मेरा विवाह उसी के साथ होगा । पेट्रिय के पास स्थित क्रांसझिलित्सा गाँव का बुल्गारियाई सैनिक गुश्तेरोव अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए हत्यारे का पता लगाने वंगा के पास आया था । १० मई १९४२ को दिमितार गुश्तेरोव ने वंगा से विवाह कर लिया था । वंगा को अपने पति की आयु कम होने का भी आभास हो गया था । उन्होंने इसके बारे में लिखा था – ‘मेरे पति युवा हैं फिर भी १ अप्रैल १९६२ को उनका निधन होगा । वास्तव में ऐसा ही हुआ । बीमारी और शराब की लत के कारण उसी दिन उनका निधन हो गया ।


१९६० के दशक में पेट्रिय नगरपालिका और इंस्टिट्यूट ऑफ सजेस्टोलॉजी ने वंगा की चैतसिक शक्तियों और भविष्यवाणियों का समर्थन किया था । वंगा पर १९७० की पुस्तक ‘साइकिक डिस्कवरीज बिहाइंड आयरन कर्टन’ में चर्चा की गई थी । बुल्गारियन कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्यों ने भी उनकी सलाह ली थी । सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव लियोनिद ब्रेझनेव ने भी उनकी सलाह ली थी । बुल्गारिया के जार बोरिस तृतीय ने भी उनसे मिलकर भविष्य जानने का प्रयास किया था ।


भविष्यवेत्ता के रूप में उनकी ख्याति चारों ओर फैल गई थी । उनके घर के बाहर असंख्य लोगों की भविष्य जानने के लिए लंबी कतारें लगती थीं । बुल्गारियाई लोगों से वह मात्र पाँच डॉलर शुल्क लेती थीं और विदेश से आए लोगों से लगभग तीस डॉलर लेती थीं । वह सारा धन देश के विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लिए सरकार को दे देती थीं और अपनी थोड़ी बहुत आवश्यकताओं के लिए सरकार से केवल लगभग ३०० डॉलर लेती थीं ।


वंगा दिमित्रोवा की अनेक भविष्यवाणियाँ बिल्कुल सत्य सिद्ध हुई हैं । उनके पिता, पति और स्वयं के निधन की जो तिथियाँ उन्होंने बताई थीं उन्हीं तिथियों पर उनका निधन हुआ था । उन्होंने १९८० में भविष्यवाणी की थी कि २००० में रूसी न्यूक्लियर सबमरीन कुर्स्क डूब जाएगी । अंतरराष्ट्रीय बचाव कर्मियों ने कई दिनों तक उस सबमरीन को समुद्र की गहराई से निकालने के प्रयास किए लेकिन वे असफल रहे और उसमें मौजूद लोगों की मृत्यु हो गई ।


११ सितंबर २००१ को न्यूयॉर्क के ट्विन टावर पर आतंकी हमला होने की भविष्यवाणी उन्होंने १९८९ में ही कर दी थी जो सत्य सिद्ध हुई । ट्विन टावर पर दो अपहृत विमानों से हमला कर निर्दोष लोगों की हत्या की गई थी । अमेरिका के ४४वें राष्ट्रपति अफ्रीकी-अमेरिकी होंगे यह भी उन्होंने कहा था और बराक ओबामा उसी प्रकार राष्ट्रपति बने । उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत कब होगी और उसका क्या परिणाम होगा इसकी भी भविष्यवाणी की थी । बुल्गारिया के राजा जार बोरिस-३ की मृत्यु की तिथि भी उन्होंने सही बताई थी । इसी प्रकार उन्होंने चेकोस्लोवाकिया के विभाजन, लेबनान में अशांति, निकारागुआ में युद्ध, साइप्रस में विवाद, इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने और उनकी हत्या, सोवियत संघ के विघटन, यूगोस्लाविया के टूटने, पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के एकीकरण, चेरनोबिल की परमाणु दुर्घटना, स्टालिन की मृत्यु, सीरिया के गृह युद्ध, क्रीमिया के अलग होने जैसी घटनाओं की भी सही भविष्यवाणियाँ की थीं । २००४ में हिंद महासागर में आई सुनामी की भविष्यवाणी भी उन्होंने १९५० में ही कर दी थी । वंगा दिमित्रोवा ने अपनी भविष्यवाणी में प्रिंसेस डायना की मृत्यु का भी उल्लेख किया था । २०१९/२० में फैली कोरोना महामारी के बारे में भी उन्होंने संकेत दिए थे । न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार वंगा ने २०२६ में तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत और मानव जाति का परग्रही जीवों ( Aliens ) से पहला संपर्क होने की भविष्यवाणी की थी ।


उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था – ‘Humanity will make contact with extraterrestrial life, possibly leading to a global crisis or apocalypse. मानवता का संपर्क परग्रही जीवनधारियों से होगा जिससे संभवतः वैश्विक संकट या प्रलय उत्पन्न हो सकता है । २०२६ में कुछ देशों के बीच युद्ध होने की भी भविष्यवाणी की गई थी । वंगा ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ( AI ) के उपयोग में वृद्धि के बारे में भी भविष्यवाणी की थी ।

Thursday, 30 April 2026

बुद्ध पूर्णिमा

 बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं ।💐💐    


 -1 मई 2026

कपिलवस्तु के पड़ौसी राजा दंडपाणि की कन्या गोपा के साथ सिद्धार्थ का विवाह हुआ था। दस वर्ष तक गोपा ने अपने पति सिद्धार्थ के साथ, जो बाद में बुद्ध हुए, सुखमय जीवन व्यतीत किया। ग्यारहवें वर्ष में वह गर्भवती हुई और सगर्भावस्था के दौरान उसे अलग-अलग दिनों में तीन स्वप्न आये।

एक दिन पहला स्वप्न आया कि श्वेत सांड है जिसके मस्तक पर मणि है और वह सांड नगर के द्वार की ओर मदमस्त हुआ जा रहा है। इन्द्र मंदिर से गोपा को ध्वनि मिली और वह घबराई हुई स्वप्न में ही सिद्धार्थ के गले लिपट गई। वह सांड वापस निकल गया और कहता गया कि मैं जा रहा हूँ। गोपा को स्वप्न में ही अनुभूति हुई कि ऐश्वर्य और यश मानो चला गया हो।

गोपा ने दूसरा स्वप्न देखा कि चार महापुरूष गणों के साथ नगर में आ रहे हैं। चाँदी के तार और मणि से गूँथी हुई सुनहरी पताका है लेकिन वह पताका गिर पड़ी है। नभ से सुमन की वृष्टि हो रही है।

गोपा ने तीसरा स्वप्न देखा कि सिद्धार्थ अचानक गायब हो गये हैं। अपनी माला अब साँप बन गई है। उफ ! पैरों से पायल निकल पड़ी है, स्वर्ण कंगन गिर पड़े हैं, केश के सुमन धूलि में समा गये हैं।

श्वेत सांड, पताका आदि सब लक्षण इस बात का आभास करा रहे हैं कि सिद्धार्थ गायब हो गये हैं, पलायन हो गये हैं। गोपा घबराई।

सिद्धार्थ जब प्रातः उठे तो उनके सम्मुख गोपा ने स्वप्न की बात कही। सिद्धार्थ पूर्वजन्म के अभ्यासी थे। भोग तो उन्हें ऐसे ही मुफ्त में मिले थे। पिछले जन्मों का पुण्य था इसलिए इस जन्म में भी भोग सुख जन्म से ही मिला लेकिन भगवान सदा अपने भक्तों को भोगों में पड़ा रहने देना नहीं चाहते हैं बल्कि उन्हें ऊपर उठाकर सत्संग और साधना की तरफ ले जाते हैं।

सिद्धार्थ ने अपनी पत्नी को सांत्वना दी लेकिन सुषुप्त वैराग्य जागृत हुआ और सिद्धार्थ चल पड़े। पति के जाने के बाद गोपा भी तपस्या में लग गई और प्रार्थना करने लगी किः "हे प्रभु ! मेरे पतिदेव तपस्या करने गये हैं। उनकी तपस्या में अप्सराएँ दुविधा उत्पन्न न करें.... कामिनियाँ उनकी तपस्या में विघ्न पैदा न करें। मैंने उनके साथ पाणिग्रहण किया है। मैं उनकी अर्द्धांगिनी हूँ। उनके विकास में मेरा भी विकास है।"

पति की भलाई के लिये इस प्रकार के संकल्प करती हुई गोपा भी तपस्या में लग गई।

सिद्धार्थ के पास जितना वैभव था, आपके पास तो उससे आधा भी नहीं होगा। वे जब घर छोड़कर गये तब अपने एक मंत्री को साथ ले गये थे जिसका नाम था छन्न। छन्न देखता है कि सिद्धार्थ वैराग्यवान हैं, वस्त्रालंकार उतारकर अब फकीरी वेश में जाना चाहते हैं, तब छन्न कहता हैः "आप स्वामी हैं, मैं सेवक हूँ। उपदेश देना मेरा अधिकार नहीं है फिर भी उम्र में आपसे बड़ा होने के कारण मैं आपके हितार्थ निवेदन कर रहा हूँ कि राजकुमार ! आप जल्दी कर रहे हैं। इन महलों-अट्टालिकाओं, इन हीरे जवाहरातों व राज-वैभव की तमाम सुख-सुविधाओं को छोड़कर नंगे पैर आप कहाँ जा रहे हैं राजकुमार ! क्या होगा इससे ? गोपा जैसी सुन्दर, सेवाभावी तथा परछाई की नाईं तुम्हारे साथ चलने वाली पत्नी, राजमहल, यश आदि सुख-सामग्रियों को छोड़कर तुम फकीरी ले रहे हो ! कहीं तुम जल्दी तो नहीं कर रहे हो ? अगर एक बार तुम सब छोड़कर फकीर हो गये तो दोबारा सुख-साधन की ये वस्तुएँ जुटाना मुश्किल हो जायेगा। तुम बहुत जल्दी कर रहे हो राजकुमार ! ऐसा वैभव सभी को नहीं मिलता है। ये तुम्हारे भाग्य की चीजें हैं। तुम इन्हें क्यों ठुकरा रहे हो ?"

सिद्धार्थ कहते हैं- "छन्न ! ये महल, यह पत्नी, ये हीरे-मोती, ये जवाहरात, तूने दूर से देखे हैं जबकि मैं इन्हें नजदीक से देख चुका हूँ और अधिकारपूर्ण उनका उपयोग भी कर चुका हूँ। तूने यशोधरा (गोपा) को दूर से देखा है और मैं उसके साथ 10-11 वर्ष तक जीवन व्यतीत कर चुका हूँ, लेकिन छन्न ! इन चीजों को हम कितना सम्हाल पाएँगे। ये चीजें अपने शरीर के साथ कितनी भी जोड़ दो लेकिन जब शरीर ही अपना नहीं तो ये चीजें कब तक रहेंगी ? मैं जल्दी नहीं कर रहा हूँ अपितु सचमुच मुझे जल्दी करनी चाहिए थी। दस वर्षों तक गृहस्थ धर्म में रहकर ग्यारहवें वर्ष में बाप बन गया हूँ। फिर ससुर बनूँगा, समधी बनूँगा और ये सब बनते-बनते एक दिन बिगड़ जाऊँगा और मर जाऊँगा। अनाथ होकर मर जाऊँ उसके पहले मुझे जीवन की सच्चाई का दर्शन करने के लिए भिक्षुक होना जरूरी है।"

छन्न को समझाकर सिद्धार्थ निकल पड़े।

सात वर्षों तक सिद्धार्थ निरंतर लगे रहे तो बुद्धत्व को प्राप्त हुए। जब बोध प्राप्त हुआ तो बुद्ध कहलाये छन्न जिस रास्ते से छोड़ गया था उससे नहीं, दूसरे रास्ते से बुद्ध वापस अपने घर आये।

पिता कहते हैं- "हमारे खानदान में ऐसा कोई बच्चा पैदा नहीं हुआ जो भीख माँगकर खाय और तू राजपाट होते हुए भी साधु बनकर भिक्षा माँगकर खाता है !"

बुद्ध बोलेः "राजन ! तुम्हारा रास्ता अलग है और मेरा रास्ता अलग है। मैं तुम्हारे कुटुम्ब से गुजरा अवश्य हूँ लेकिन हकीकत में मैं तो अनंत जन्मों से यात्रा करने वाला पथिक हूँ। प्रत्येक जीव अपने कर्मों की यात्रा लेकर चलता है। कुटुम्बी बीच में मिल जाते हैं और अन्त में फिर छूट जाते हैं लेकिन फिर जो नहीं छूटता वह परमात्मा ही सार है, बाकी सब खिलवाड़ है।"

बहुत सारे लोग बुद्ध के दर्शन करने आये लेकिन गोपा नहीं आई। उसने संदेशा भिजवाया कि मैं आपको छोड़कर नहीं गई जो मैं आपसे मिलने आऊँ। आप मुझे छोड़कर गये हैं। भले ही आप लोगों की दृष्टि में चाहे भगवान बन गये, बुद्ध बन गये लेकिन मैं तो अभी भी आपको अपने पति की दृष्टि से देखते हुए आपकी पत्नी ही हूँ इसलिए आप स्वयं ही मुझसे मिलने आइये।"

गोपा की तपस्या व शुभकामना से प्रसन्न होकर बुद्ध भिक्षुक-साधु होने के बाद भी अपनी पत्नी से वार्तालाप करने, मिलने गये लेकिन संसारी पति-पत्नी की तरह मिलने नहीं, ज्ञानयुक्त वार्तालाप करने गये।

पुत्र राहुल को गोपा कहती हैः "पिता से अपनी विरासत माँगो।"

राहुल कहता हैः "पिता जी ! मेरी विरासत ?"

बुद्ध कहते हैः "तेरी विरासत ! ले यह भिक्षापात्र। इससे बड़ी विरासत क्या हो सकती है ?" उस बच्चे को भी बुद्ध ने दीक्षा दे दी।

बुद्ध जानते हैं फकीरी का माहात्म्य। बुद्ध जानते हैं आत्मा का माहात्म्य। बुद्ध जानते हैं क्षमा, करूणा व दया का माहात्म्य। शरीर को कितना ही खिलाया..... पिलाया.... घुमाया..... अंत में क्या ? सारी जिन्दगी इसके पीछे लग गई फिर भी बेवफा रहा। कभी सिर में दर्द है तो कभी पेट में दर्द है। कभी बुढ़ापे की कमजोरी है तो कभी मेले की धक्का-मुक्की की थकान है।

तन धरिया कोई न सुखिया देखा।

जो देखा सो दुखिया रे।।

यह शरीर कितनी भी सुविधाओं में रहा, अंत में तो इसका परिणाम राख है। यह शरीर राख में जल जाय उसके पहले जीव अगर अपने नाथ से मिल जाय तो उसका नाम है पुरूषार्थ। ऐसा पुरूषार्थ करने वाला भगवन्नाम से अपना मंगल कर सकता है।


 :- पूज्य बापूजी

Wednesday, 29 April 2026

शनिदेव कथा

 श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।

  एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-

नारद- बालक तुम कौन हो ?

बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।

नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?

बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।

   तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।

बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?

नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।

बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?

नारद- शनिदेव की महादशा।

  इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।

नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वर्य मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर्य मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-


1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।


2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

 

  ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।

       सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है l

Monday, 27 April 2026

जोक्स

 अकबर: बीरबल मुझे बताओ! अपने स्टाफ में सबसे ज्यादा काम करने वाले को कैसे पहचानोगे?


बीरबल: महाराज मैं सबको बुला लाता हूँ, फिर बताता हूँ!


(बीरबल सबको बुलाता है और एक का हाथ पकड़ के कहता है-)


बीरबल: महाराज यही है वो!!


अकबर: तुमने कैसे पहचाना इसको?


बीरबल: महाराज! मैंने इसका मोबाईल चेक किया है, इसके मोबाईल की बैटरी 98% है!!😆😂

जोक्स

 पत्नी जी ने बड़े प्यार से कहा कि आइये आपके सर में तेल डाल देती हूं। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा और खुशी-खुशी बैठ गया।


हद तो तब हो गयी जब वो सर पर तेल डालकर चली गयी और दूसरे काम में लग गयी।


मैंने पूछा: "ये क्या है? जल्दी से आओ न, तेल टपक रहा है।"


पत्नी जी का सनसनाता जवाब सुनकर मैं बेहोश होते-होते बचा-


"आज शनिवार है, पंडित जी ने बताया है कि शादी के दिन से ही तुम पर शनि चढ़ा हुआ है! अपने प्रिय देवता पर तेल चढ़ाओ। अब 'तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो...' वाला गाना याद आ गया? बस!!!! चढ़ा दिया!!!"


अच्छा हुआ.. ससुरे ने नारियल फोड़ने का नहीं बोला....

Friday, 24 April 2026

सीता नवमी

 श्री सीता नवमी की हार्दिक शुभकामनाएं।


माँ सीता की सतीत्व-भावना


भगवान श्रीराम के वियोग तथा रावण और राक्षसियों के द्वारा किये जानेवाले अत्याचारों के कारण माँ सीता अशोक वाटिका में बड़ी दुःखी थीं । न तो वे भोजन करतीं न ही नींद । दिन-रात केवल श्रीराम-नाम के जप में ही तल्लीन रहतीं । उनका विषादग्रस्त मुखमंडल देखकर हनुमानजी ने पर्वताकार शरीर धारण करके उनसे कहा : ‘‘माँ ! आपकी कृपा से मेरे पास इतना बल है कि मैं पर्वत, वन, महल और रावणसहित पूरी लंका को उठाकर ले जा सकता हूँ । आप कृपा करके मेरे साथ चलें और भगवान श्रीराम व लक्ष्मण का शोक दूर करके स्वयं भी इस भयानक दुःख से मुक्ति पा लें ।’’

भगवान श्रीराम में ही एकनिष्ठ रहनेवाली जनकनंदिनी माँ सीता ने हनुमानजी से कहा : ‘‘हे महाकपि ! मैं तुम्हारी शक्ति और पराक्रम को जानती हूँ, साथ ही तुम्हारे हृदय के शुद्ध भाव एवं तुम्हारी स्वामीभक्ति को भी जानती हूँ । किंतु मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकती । पतिपरायणता की दृष्टि से मैं एकमात्र भगवान श्रीराम के सिवाय किसी परपुरुष का स्पर्श नहीं कर सकती । जब रावण ने मेरा हरण किया था तब मैं असमर्थ, असहाय और विवश थी । वह मुझे बलपूर्वक उठा लाया था । अब तो करुणानिधान भगवान श्रीराम ही स्वयं आकर, रावण का वध करके मुझे यहाँ से ले जायेंगे ।’’

(‘नारी तू नारायणी’ पुस्तक से)

Monday, 20 April 2026

बाली- हनुमान युद्ध

 मित्रों,,,आज आपको एक ऐसे कथा के बारे में बताने जा रहा हूँ,,जिसका विवरण संसार के किसी भी पुस्तक में आपको नही मिलेगा,, और ये कथा सत प्रतिशत सत्य कथा है,,


कथा का आरंभ तब का है ,, जब बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ,,की जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा,,उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी,, और इससे बाली हर युद्ध मे अजेय रहेगा,,


सुग्रीव, बाली दोनों ब्रम्हा के औरस ( वरदान द्वारा प्राप्त ) पुत्र हैं,,और ब्रम्हा जी की कृपा बाली पर सदैव बनी रहती है,,


बाली को अपने बल पर बड़ा घमंड था,,उसका घमंड तब ओर भी बढ़ गया,,जब उसने करीब करीब तीनों लोकों पर विजय पाए हुए रावण से युद्ध किया और रावण को अपनी पूँछ से बांध कर छह महीने तक पूरी दुनिया घूमी,,


रावण जैसे योद्धा को इस प्रकार हरा कर बाली के घमंड का कोई सीमा न रहा,,अब वो अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था,,और यही उसकी सबसे बड़ी भूल हुई,,


अपने ताकत के मद में चूर एक दिन एक जंगल मे पेड़ पौधों को तिनके के समान उखाड़ फेंक रहा था,,हरे भरे वृक्षों को तहस नहस कर दे रहा था,, अमृत समान जल के सरोवरों को मिट्टी से मिला कर कीचड़ कर दे रहा था,,


एक तरह से अपने ताक़त के नशे में बाली पूरे जंगल को उजाड़ कर रख देना चाहता था,,और बार बार अपने से युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था- है कोई जो बाली सेयुद्ध करने की हिम्मत रखता हो,,है कोई जो अपने माँ का दूध पिया हो,,जो बाली से युद्ध करके बाली को हरा दे,,


इस तरह की गर्जना करते हुए बाली उस जंगल को तहस नहस कर रहा था,, संयोग वश उसी जंगल के बीच मे हनुमान जी,, राम नाम का जाप करते हुए तपस्या में बैठे थे,,बाली की इस हरकत से हनुमान जी को राम नाम का जप करने में विघ्न लगा,,


और हनुमान जी बाली के सामने जाकर बोले- हे वीरों के वीर,, हे ब्रम्ह अंश,, हे राजकुमार बाली,,

( तब बाली किष्किंधा के युवराज थे) क्यों इस शांत जंगल को अपने बल की बलि दे रहे हो,,


हरे भरे पेड़ों को उखाड़ फेंक रहे हो,फलों से लदे वृक्षों को मसल दे रहे हो,,अमृत समान सरोवरों को दूषित मलिन मिट्टी से मिला कर उन्हें नष्ट कर रहे हो,,इससे तुम्हे क्या मिलेगा,,


तुम्हारे औरस पिता ब्रम्हा के वरदान स्वरूप कोई तुहे युद्ध मे नही हरा सकता,, क्योंकि जो कोई तुमसे युद्ध करने आएगा,, उसकी आधी शक्ति तुममे समाहित हो जाएगी,,


इसलिए हे कपि राजकुमार अपने बल के घमंड को शांत कर,,और राम नाम का जाप कर,,इससे तेरे मन में अपने बल का भान नही होगा,, और राम नाम का जाप करने से ये लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाएंगे,,


इतना सुनते ही बाली अपने बल के मद चूर हनुमान जी से बोला- ए तुच्छ वानर,, तू हमें शिक्षा दे रहा है, राजकुमार बाली को,,जिसने विश्व के सभी योद्धाओं को धूल चटाई है,, और जिसके एक हुंकार से बड़े से बड़ा पर्वत भी खंड खंड हो जाता है,, जा तुच्छ वानर, जा और तू ही भक्ति कर अपने राम वाम के,,


और जिस राम की तू बात कर रहा है,वो है कौन, और केवल तू ही जानता है राम के बारे में, मैंने आजतक किसी के मुँह से ये नाम नही सुना, और तू मुझे राम नाम जपने की शिक्षा दे रहा है,,


हनुमान जी ने कहा- प्रभु श्री राम, तीनो लोकों के स्वामी है,,उनकी महिमा अपरंपार है, ये वो सागर है जिसकी एक बूंद भी जिसे मिले वो भवसागर को पार कर जाए,,


बाली- इतना ही महान है राम तो बुला ज़रा,,मैं भी तो देखूं कितना बल है उसकी भुजाओं में,,


बाली को भगवान राम के विरुद्ध ऐसे कटु वचन हनुमान जो को क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त थे,,हनुमान- ए बल के मद में चूर बाली,, तू क्या प्रभु राम को युद्ध मे हराएगा,,

पहले उनके इस तुच्छ सेवक को युद्ध में हरा कर दिखा,,


बाली- तब ठीक है कल के कल नगर के बीचों बीच तेरा और मेरा युद्ध होगा,, हनुमान जी ने बाली की बात मान ली,,


बाली ने नगर में जाकर घोषणा करवा दिया कि कल नगर के बीच हनुमान और बाली का युद्ध होगा,, अगले दिन तय समय पर जब हनुमान जी बाली से युद्ध करने अपने घर से निकलने वाले थे,, तभी उनके सामने ब्रम्हा जी प्रकट हुए,,


हनुमान जी ने ब्रम्हा जी को प्रणाम किया और बोले- हे जगत पिता आज मुझ जैसे एक वानर के घर आपका पधारने का कारण अवश्य ही कुछ विशेष होगा,,


ब्रम्हा जी बोले- हे अंजनीसुत, हे शिवांश, हे पवनपुत्र, हे राम भक्त हनुमान,, मेरे पुत्र बाली को उसकी उद्दंडता के लिए क्षमा कर दो,, और युद्ध के लिए न जाओ,


हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु,,बाली ने मेरे बारे में कहा होता तो मैं उसे क्षमा कर देता,, परन्तु उसने मेरे आराध्य श्री राम के बारे में कहा है जिसे मैं सहन नही कर सकता,,और मुझे युद्ध के लिए चुनौती दिया है,,जिसे मुझे स्वीकार करना ही होगा,,अन्यथा सारी विश्व मे ये बात कही जाएगी कि हनुमान कायर है जो ललकारने पर युद्ध करने इसलिए नही जाता है क्योंकि एक बलवान योद्धा उसे ललकार रहा है,,


तब कुछ सोंच कर ब्रम्हा जी ने कहा- ठीक है हनुमान जी,,

पर आप अपने साथ अपनी समस्त सक्तियों को साथ न लेकर जाएं,,केवल दसवां भाग का बल लेकर जाएं,,

बाकी बल को योग द्वारा अपने आराध्य के चरणों में रख दे,,युद्ध से आने के उपरांत फिर से उन्हें ग्रहण कर लें,,


हनुमान जी ने ब्रम्हा जी का मान रखते हुए वैसे ही किया और बाली से युद्ध करने घर से निकले,, उधर बाली नगर के बीच मे एक जगह को अखाड़े में बदल दिया था,,और हनुमान जी से युद्ध करने को व्याकुल होकर बार बार हनुमान जी को ललकार रहा था,,


पूरा नगर इस अदभुत और दो महायोद्धाओं के युद्ध को देखने के लिए जमा था,,हनुमान जी जैसे ही युद्ध स्थल पर पहुँचे,, बाली ने हनुमान को अखाड़े में आने के लिए ललकारा,, ललकार सुन कर जैसे ही हनुमान जी ने एक पावँ अखाड़े में रखा,,


उनकी आधी शक्ति बाली में चली गई,,बाली में जैसे ही हनुमान जी की आधी शक्ति समाई,,बाली के शरीर मे बदलाव आने लगे,उसके शरीर मे ताकत का सैलाब आ गया,बाली का शरीर बल के प्रभाव में फूलने लगा,,

उसके शरीर फट कर खून निकलने लगा,,


बाली को कुछ समझ नही आ रहा था,,तभी ब्रम्हा जी बाली के पास प्रकट हुए और बाली को कहा- पुत्र जितना जल्दी हो सके यहां से दूर अति दूर चले जाओ,


बाली को इस समय कुछ समझ नही आ रहा रहा,,वो सिर्फ ब्रम्हा जी की बात को सुना और सरपट दौड़ लगा दिया,,सौ मील से ज्यादा दौड़ने के बाद बाली थक कर गिर गया,, कुछ देर बाद जब होश आया तो अपने सामने ब्रम्हा जी को देख कर बोला- ये सब क्या है।


हनुमान से युद्ध करने से पहले मेरा शरीर का फटने की हद तक फूलना,,फिर आपका वहां अचानक आना और ये कहना कि वहां से जितना दूर हो सके चले जाओ,मुझे कुछ समझ नही आया,,


ब्रम्हा जी बोले-, पुत्र जब तुम्हारे सामने हनुमान जी आये, तो उनका आधा बल तममे समा गया, तब तुम्हे कैसा लगा,,बाली- मुझे ऐसा लग जैसे मेरे शरीर में शक्ति की सागर लहरें ले रही है,, ऐसे लगा जैसे इस समस्त संसार मे मेरे तेज़ का सामना कोई नही कर सकता,, पर साथ ही साथ ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर अभी फट पड़ेगा,,,


ब्रम्हा जो बोले- हे बाली,मैंने हनुमान जी को उनके बल का केवल दसवां भाग ही लेकर तुमसे युद्ध करने को कहा,,

पर तुम तो उनके दसवें भाग के आधे बल को भी नही संभाल सके,, सोचो, यदि हनुमान जी अपने समस्त बल के साथ तुमसे युद्ध करने आते तो उनके आधे बल से तुम उसी समय फट जाते जब वो तुमसे युद्ध करने को घर से निकलते,,


इतना सुन कर बाली पसीना पसीना हो गया,,और कुछ देर सोच कर बोला- प्रभु, यदि हनुमान जी के पास इतनी शक्तियां है तो वो इसका उपयोग कहाँ करेंगे,,


ब्रम्हा- हनुमान जी कभी भी अपने पूरे बल का प्रयोग नही कर पाएंगे,,क्योंकि ये पूरी सृष्टि भी उनके बल के दसवें भाग को नही सह सकती,,


ये सुन कर बाली ने वही हनुमान जी को दंडवत प्रणाम किया और बोला,, जो हनुमान जी जिनके पास अथाह बल होते हुए भी शांत और रामभजन गाते रहते है और एक मैं हूँ जो उनके एक बाल के बराबर भी नही हूँ और उनको ललकार रहा था,,मुझे क्षमा करें,,


और आत्मग्लानि से भर कर बाली ने राम भगवान का तप किया और अपने मोक्ष का मार्ग उन्ही से प्राप्त किया,,


तो बोलो,

पवनपुत्र हनुमान की जय,

जय श्री राम जय श्री राम,,

Monday, 6 April 2026

સ્વસ્થ હૃદય

૩૦૦૦ વર્ષ પહેલાં ભારતમાં એક મહાન ઋષિ હતા. તેમનું નામ #મહર્ષિ વાગ્વતજી હતું. તેમણે અષ્ટાંગ હૃદયમ્ નામનો ગ્રંથ લખ્યો હતો.


➡️આ ગ્રંથમાં તેમણે રોગોના ઉપચાર માટે ૭૦૦૦ સૂત્રો લખ્યા હતા. આ તે સૂત્રોમાંથી એક છે.


➡️વાગ્વતજી લખે છે કે જો હૃદય પર હુમલો થઈ રહ્યો હોય, એટલે કે હૃદયની નળીઓમાં અવરોધ થવા લાગ્યો હોય, તો તેનો અર્થ એ છે કે લોહીમાં એસિડિટી વધી ગઈ છે. તમે એસિડિટી સમજો છો, જેને અંગ્રેજીમાં એસિડિટી કહેવાય છે.


➡️એસીડીટી બે પ્રકારની હોય છે, એક પેટની એસિડિટી અને બીજી બ્લડ એસિડિટી. જ્યારે તમારા પેટમાં એસિડિટી વધે છે, ત્યારે તમને પેટમાં બળતરા, ખાટા ફોલ્લા, મોઢામાંથી પાણી નીકળવાનો અનુભવ થશે અને જો આ એસિડિટી વધુ વધે છે તો તે હાઇપરએસીડીટી તરફ દોરી જશે અને જ્યારે આ પેટની એસિડિટી વધે છે અને લોહી સુધી પહોંચે છે ત્યારે તે લોહીની એસિડિટી બની જાય છે અને જ્યારે લોહીમાં એસિડિટી વધે છે ત્યારે આ એસિડિક લોહી હૃદયની નળીઓમાંથી પસાર થઈ શકતું નથી અને નળીઓમાં અવરોધ પેદા કરે છે, ત્યારે જ હાર્ટ એટેક આવે છે. આ વિના હાર્ટ એટેક આવતો નથી અને આ આયુર્વેદનું આ સૌથી મોટું સત્ય છે જે કોઈ ડૉક્ટર તમને કહેતું નથી કારણ કે તેની સારવાર સૌથી સરળ છે!


➡️ સારવાર શું છે 👉 વાગ્વત જી લખે છે કે જ્યારે લોહીમાં એસિડિટી વધી જાય છે ત્યારે તમારે એવી વસ્તુઓનો ઉપયોગ કરવો જોઈએ જે આલ્કલાઇન હોય. તમે જાણો છો કે એસિડિક અને આલ્કલાઇન બે પ્રકારની વસ્તુઓ હોય છે! એસિડિક અને આલ્કલાઇન હવે, જો તમે એસિડ અને આલ્કલાઇન ભેળવો છો તો શું થાય છે?

જો તમે એસિડ અને આલ્કલાઇન ભેળવો છો તો શું થાય છે?… બધા જાણે છે કે તે તટસ્થ છે. તો વાગ્વત જી લખે છે કે જો લોહીની એસિડિટી વધારે હોય, તો આલ્કલાઇન વસ્તુઓ ખાઓ! પછી લોહીની એસિડિટી તટસ્થ થઈ જશે! અને એકવાર લોહીમાં એસિડિટી ન્યુટ્રલ થઈ જાય, તો જીવનમાં હાર્ટ એટેક આવવાની શક્યતા રહેતી નથી!


➡️આ આખી વાર્તા છે! હવે તમે પૂછશો કે, એવી કઈ વસ્તુઓ છે જે આલ્કલાઇન છે અને આપણે ખાવી જોઈએ?


➡️તમારા રસોડામાં ઘણી બધી એવી વસ્તુઓ છે જે આલ્કલાઇન છે, જો તમે તે ખાશો, તો તમને ક્યારેય હાર્ટ એટેક નહીં આવે, અને જો તમને પહેલાથી જ હાર્ટ એટેક આવી ગયો હોય, તો તે ફરી નહીં થાય. આપણે બધા જાણીએ છીએ કે સૌથી આલ્કલાઇન વસ્તુ શું છે?


➡️આ વસ્તુ દરેક ઘરમાં સરળતાથી ઉપલબ્ધ છે, તેથી તે દૂધી છે જેને દૂધી પણ કહેવામાં આવે છે. દૂધીને અંગ્રેજીમાં દૂધી પણ કહેવામાં આવે છે જેને તમે શાકભાજી તરીકે ખાઓ છો! આનાથી વધુ આલ્કલાઇન વસ્તુ બીજી કોઈ નથી! તો તમારે દરરોજ દૂધીનો રસ પીવો જોઈએ અથવા કાચો દૂધી ખાવો જોઈએ.


➡️વાગવતજી કહે છે કે દૂધીમાં લોહીની એસિડિટી ઘટાડવાની મહત્તમ શક્તિ હોય છે, તેથી તમારે દૂધીનો રસ પીવો જોઈએ, તમારે કેટલું ખાવું જોઈએ? દરરોજ 200 થી 300 મિલિગ્રામ પીવો. તમારે તે ક્યારે પીવું જોઈએ? તમે તેને સવારે ખાલી પેટે (ટોઇલેટ ગયા પછી) અથવા નાસ્તાના અડધા કલાક પછી પી શકો છો. તમે આ દૂધીના રસમાં 7 થી 10 તુલસીના પાન ઉમેરીને તેને વધુ આલ્કલાઇન બનાવી શકો છો. તુલસી ખૂબ જ આલ્કલાઇન છે. તમે તેની સાથે 7 થી 10 ફુદીનાના પાન ઉમેરી શકો છો. ફુદીનો પણ ખૂબ જ આલ્કલાઇન છે. તમારે તેની સાથે કાળું મીઠું અથવા સિંધવ મીઠું ઉમેરવું જોઈએ, તે ખૂબ જ આલ્કલાઇન પણ છે.


➡️પરંતુ યાદ રાખો કે ફક્ત કાળા અથવા સિંધવ મીઠાનો ઉપયોગ કરો અને ક્યારેય અન્ય કોઈ આયોડાઇઝ્ડ મીઠું નહીં. આ આયોડાઇઝ્ડ મીઠું એસિડિક છે, તેથી તમારે આ દૂધીના રસનું સેવન કરવું જોઈએ. તે 2 થી 3 મહિનામાં તમારા હૃદયના બધા અવરોધોને મટાડી દેશે. તમને 21મા દિવસે જ સારા પરિણામો દેખાવા લાગશે. તમારે કોઈ ઓપરેશનની જરૂર નહીં પડે. આપણા ભારતના આયુર્વેદની મદદથી ઘરે જ તેની સારવાર કરવામાં આવશે અને તમારા કિંમતી શરીર અને લાખો રૂપિયા ઓપરેશનથી બચી જશે.

સનાતન ધર્મ શ્રેષ્ઠ છે.

Saturday, 4 April 2026

यमदूत का अयोध्या प्रवेश

 उस दिन जब मृत्यु ने अयोध्या की दहलीज पर कदम रखा। एक वानर के तेज ने काल को भी झुका दिया और एक अंगूठी ने काल और समय का रहस्य खोल दिया। जब यमराज को यह खबर मिली कि उनके यमदूत अयोध्या की सीमा के अंदर कदम ही नहीं रख पा रहे हैं, तो वे चिंतित हो गए। यह कोई साधारण बात नहीं थी। जिन यमदूतों को पूरे संसार में कोई रोक नहीं सकता वे अयोध्या के पास पहुंचते ही वापस क्यों लौट रहे थे? यमराज ने तुरंत यमदूतों को बुलवाया और पूछा सच-सच बताओ आखिर वहां हो क्या रहा है? यमदूत कांपती आवाज में बोले प्रभु जैसे ही हम अयोध्या के द्वार के पास पहुंचते हैं वहां खड़े एक वानर के शरीर से ऐसा तेज निकलता है कि वो हमें जला देता है। उस प्रकाश को सहवाना हमारे लिए असंभव हो जाता है। हम आगे बढ़ ही नहीं पाते। यह सुनकर यमराज की आंखों में आश्चर्य और क्रोध दोनों आ गए। एक वानर और तुम सब उससे डर कर लौट आते हो। चित्रगुप्त ने आगे बढ़कर धीमे लेकिन गंभीर स्वर में कहा प्रभु वो कोई साधारण वानर नहीं है। वो स्वयं पवन पुत्र हनुमान हैं। कई वर्षों से अयोध्या में किसी की मृत्यु नहीं हो पाई है क्योंकि आपके दूत भीतर जा ही नहीं पा रहे। अब बात यमराज के सम्मान की थी। उन्होंने बिना एक पल गवाए अपने महेश्वर बैठकर अयोध्या की ओर प्रस्थान किया और कुछ ही क्षणों में वे अयोध्या के मुख्य द्वार पर पहुंच गए और वहां उनके सामने वही वानर खड़ा था शांत स्थिर तेजस्वी वो थे प्रभु श्री राम के परम भक्त हनुमान हनुमान जी ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और विनम्र स्वर में कहा हे धर्मराज आपका इस पवित्र नगरी में स्वागत है। कृपया बताइए किस कार्य से पधारे हैं? मैं श्री राम से मिलने आया हूं। उनकी पृथ्वी लीला की अवधि पूर्ण हो चुकी है। समय किसी के लिए नहीं रुकता। हनुमान जी का चेहरा शांत ही रहा। पर उनकी आवाज अब पहले से अधिक दृढ़ थी। हे यमदेव, मेरे प्रभु की अनुमति के बिना कोई भी अयोध्या में प्रवेश नहीं कर सकता। यह सुनकर यमराज के चेहरे पर कठोरता आ गई। क्या तुम समय और काल को रोकने की कोशिश कर रहे हो? वानर। हनुमान ने शांत लेकिन अक स्वर में उत्तर दिया। मैं समय को नहीं रोक रहा। मैं अपने प्रभु की सेवा कर रहा हूं। अब बात केवल संवाद तक सीमित नहीं रही। यमराज ने अपना भयानक यमदंड उठा लिया। आकाश में गर्जना गूंज उठी और उसी क्षण युद्ध आरंभ हो गया। यमराज ने प्रचंड गर्जना की और पूरे बल से हनुमान जी की ओर प्रहार किया। लेकिन हनुमान जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपनी गदा घुमाई और यमराज के वार को रोक लिया। दोनों दिव्य अस्त्र आपस में टकराए तो ऐसी भयानक ध्वनि हुई कि दिशाएं गूंज उठी मानो पूरा ब्रह्मांड एक पल के लिए थम गया हो। यमराज ने दूसरा वार किया। इस बार अपनी विशाल गदा से वो वार प्रलय के समान था। पर हनुमान ने उसे भी रोक लिया। जब दोनों गदाएं टकराई तो यमराज की गदा टूट कर बिखर गई। क्षण भर के लिए यमराज भी चौंक गए। उन्हें ऐसी प्रतिरोध की उम्मीद नहीं थी। उन्होंने तुरंत अपनी तलवार निकाली और पूरी शक्ति से हनुमान की ओर फेंक दी। तलवार बिजली की तरह चमकती हुई हनुमान की ओर बढ़ी। लेकिन जो हुआ वो किसी ने सोचा भी नहीं था। हनुमान जी ने हवा में ही उस तलवार को पकड़ लिया। फिर उन्होंने अपनी मुट्ठी कस ली। अगले ही पल वो तलवार टुकड़ों में टूट कर नीचे गिर पड़ी। अब यमराज के मन में पहली बार चिंता की लहर उठी। क्रोध, अपमान और चुनौती तीनों भाव उनके भीतर उमड़ रहे थे। उन्होंने अपना सबसे शक्तिशाली अस्त्र उठाया। यमदंड यह वही दंड था जिसके सामने देवता भी कांपते थे। यमराज ने पूरी शक्ति से उसे हनुमान की ओर चलाया। यमदंड आग की लपटों की तरह आगे बढ़ रहा था। उसे अपनी ओर आता देख हनुमान जी के नेत्र अग्नि के समान चमक उठे। उन्होंने तुरंत अपना स्वरूप बढ़ाना शुरू कर दिया। क्षण भर में उनका शरीर पर्वत के समान विशाल हो गया। उनके सामने यमराज छोटे प्रतीत होने लगे और जैसे ही यमदंड उनके समीप पहुंचा हनुमान जी ने अपना विशाल मुख खोला और उस दंड को उसी प्रकार निगल लिया जैसे कोई साधारण वस्तु हो। पूरा आकाश स्तब्ध रह गया। यमराज की आंखों में अविश्वास था। उनका सबसे शक्तिशाली अस्त्र निष्फल हो चुका था। अब हनुमान जी आगे बढ़े। उन्होंने अपनी गदा उठाई और ऐसा प्रहार किया कि यमराज पीछे हटने को विवश हो गए। वह प्रहार घातक नहीं था पर चेतावनी था। यमराज घायल हुए। पहली बार मृत्यु स्वयं पराजय का अनुभव कर रही थी। अपनी स्थिति समझते हुए यमराज युद्धभूमि से पीछे हट गए और कुछ ही क्षणों बाद वे यमलोक लौट गए। जब यमराज घायल अवस्था में यमलोक पहुंचे तो वहां सन्नाटा छा गया। यमदूत स्तब्ध खड़े थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी प्रश्न पूछने की। पर सबके मन में एक ही सवाल था। जिसके नाम से काल भी कांपता है उसे किसने पराजित किया? यमराज मौन थे। पर उनके भीतर एक अग्नि जल रही थी। यह केवल हार नहीं थी। यह उनके अधिकार को चुनौती थी। उन्होंने मन ही मन निश्चय किया। वे फिर लौटेंगे। उधर कुछ समय बीत गया। एक दिन हनुमान जी प्रभु श्री राम के चरण दबा रहे थे। अयोध्या का राजमहल शांत था। श्री राम सिंहासन पर विराजमान थे और गहरे विचार में डूबे हुए थे। उनकी उंगलियों में पहनी अंगूठी पर उनकी दृष्टि टिकी हुई थी। अचानक वो अंगूठी उनकी उंगली से फिसल गई। सबके सामने वो अंगूठी भूमि में बने एक छोटे से छिद्र में समा गई। श्री राम ने तुरंत कहा, हनुमान मेरी अंगूठी नीचे गिर गई है। उसे शीघ्र लेकर आओ। आदेश मिलते ही हनुमान जी ने एक पल भी देर नहीं की। उन्होंने तुरंत अपना सूक्ष्म रूप धारण किया और उस छिद्र के भीतर प्रवेश कर गए। हनुमान जी तेजी से नीचे की ओर बढ़ने लगे। पर यह क्या? अंगूठी उनसे आगे-आगे जा रही थी। वे पूरी शक्ति से दौड़ रहे थे। पर अंगूठी उनसे दूर होती जा रही थी। उन्होंने अपनी गति और बढ़ा दी। वे पृथ्वी के अनेक भागों से गुजरे। ऐसा लगा मानो वे पूरी धरती का चक्कर लगा रहे हो। फिर भी अंगूठी की गति उनसे अधिक थी। हनुमान जी के मन में प्रश्न उठने लगे। यह कैसी लीला है? क्या यह कोई परीक्षा है? क्या प्रभु कुछ संकेत देना चाहते हैं? उधर इसी समय यमराज ने दूसरी बार अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। अंततः हनुमान जी ने देखा कि वो अंगूठी सुमेरू पर्वत के भीतर स्थित एक गहरी गुफा में जा गिरी। वे तुरंत वहां पहुंचे। गुफा के बाहर एक वानर बैठा था। उसने हनुमान को रोकते हुए पूछा, "कौन हो तुम?" हनुमान जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "मैं हनुमान हूं।" यह सुनते ही वो वानर हंस पड़ा। इतने छोटे और दुर्बल तुम हनुमान हो। असली हनुमान तो भीतर हैं। यह सुनकर हनुमान जी स्वयं चकित रह गए। उन्होंने भीतर जाने की अनुमति मांगी। अनुमति मिलते ही वे गुफा के अंदर प्रवेश कर गए। जैसे ही वे अंदर पहुंचे, उन्होंने एक दिव्य प्रकाश से भरा वातावरण देखा। वहां एक विशाल अत्यंत तेजस्वी हनुमान विराजमान थे। उनका स्वरूप पर्वत के समान था। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, स्वागत है पवनपुत्र। तुम किस कार्य से आए हो? आप कौन हैं? और हम दोनों हनुमान कैसे हो सकते हैं? उस विराट स्वरूप ने उत्तर दिया, "मैं पिछले कल्प का हनुमान हूं। तुम इस कल्प के हनुमान हो। हनुमान जी स्तब्ध रह गए। मैं अपने प्रभु की अंगूठी लेने आया हूं। वो यहीं गिरी है। विराट हनुमान ने एक ओर संकेत किया। हनुमान जी ने देखा वहां अंगूठियों का एक विशाल ढेर पड़ा था। असंख्य अंगूठियां। जितनी दृष्टि जाए उतनी अंगूठियां। विराट हनुमान बोले जबजब पृथ्वी पर श्री राम अवतरित होते हैं। लीला पूर्ण होने के समय वे अपने हनुमान को अंगूठी लेने भेजते हैं। एक अंगूठी इस लोक में आती है और फिर दो हो जाती हैं। एक हनुमान अपने साथ ले जाते हैं। दूसरी यहीं रह जाती है। हनुमान जी ने विस्मय से पूछा। तो क्या यह सब बार-बार होता रहा है? उत्तर मिला। समय अनंत है। रामावतार भी अनंत है। तुम केवल एक चक्र के साक्षी हो। हनुमान जी की आंखें भर आई। उन्हें समझ आने लगा यह केवल अंगूठी की खोज नहीं थी। यह समय के अनंत चक्र का बोध था। उधर अयोध्या के द्वार पर यमराज दूसरी बार पहुंच चुके थे। इस बार वातावरण पहले जैसा नहीं था। जैसे ही वे हनुमान को पुकारने वाले थे। उसी क्षण आकाश से दिव्य वाणी गूंजी। हे धर्मराज प्रभु श्री राम आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हनुमान के लौटने से पहले आप महल में प्रवेश करें। श्री राम ने उन्हें सम्मान पूर्वक आसन दिया। दोनों आमने-सामने बैठे यमराज ने गंभीर स्वर में कहा प्रभु हमारा संवाद अत्यंत गोपनीय है। कोई इसे ना सुने यदि कोई सुन ले तो उसे मृत्युदंड देना होगा। श्री राम ने शांत भाव से सहमति दी। उन्होंने लक्ष्मण जी को बुलाया और कहा जब तक मैं स्वयं ना बुलाऊं कोई भीतर ना आए यदि कोई नियम तोड़े तो दंड अवश्य होगा। लक्ष्मण जी द्वार पर पहरा देने लगे। अंदर श्री राम और यमराज अवतार कार्य की पूर्णता और धाम गमन पर चर्चा कर रहे थे। उसी समय महल के द्वार पर एक तेजस्वी ऋषि पहुंचे। वह थे महर्षि दुर्वासा। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "मुझे तुरंत श्री राम से मिलना है।" लक्ष्मण जी ने विनम्रता से उत्तर दिया। इस समय प्रभु किसी से नहीं मिल सकते। यह सुनते ही दुर्वासा का क्रोध भड़क उठा। उन्होंने चेतावनी दी। यदि मुझे रोका गया तो मैं पूरी अयोध्या को श्राप दे दूंगा। अब लक्ष्मण जी धर्म संकट में पड़ गए। एक ओर प्रभु का आदेश। दूसरी ओर पूरी अयोध्या का विनाश। क्षण भर में उन्होंने निर्णय लिया। वे भीतर चले गए। जैसे ही लक्ष्मण भीतर पहुंचे, यमराज तुरंत अदृश्य हो गए। नियम भंग हो चुका था। श्री राम सब समझ गए। अब धर्म की मर्यादा निभानी थी। लक्ष्मण जी ने बिना एक शब्द बोले दंड स्वीकार कर लिया। उन्होंने अयोध्या को प्रणाम किया और सरयू नदी के तट पर जाकर जल में प्रवेश कर लिया। इस प्रकार उन्होंने देह त्याग दी। उधर गुफा में समय का रहस्य जानकर हनुमान जी अपनी अंगूठी लेकर लौटे। पर जब वे अयोध्या पहुंचे वातावरण बदल चुका था। श्री राम सरयू तट पर खड़े थे। सभी अनुयाई उपस्थित थे। धाम गमन का समय आ चुका था। हनुमान जी ने सब कुछ जान लिया। क्षण भर के लिए उनके हृदय में यमराज के प्रति रोष उठा। पर अगले ही पल वे शांत हो गए। उन्हें समझ आ गया यह सब प्रभु की योजना थी। श्री राम ने हनुमान को अपने पास बुलाया। मधुर स्वर में कहा हनुमान तुम पृथ्वी पर रहो। जब तक मेरा नाम रहेगा तुम जीवित रहोगे। जहां राम कथा होगी वहां तुम उपस्थित रहोगे। हनुमान जी ने प्रभु के चरण पकड़ लिए। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। श्री राम सरयू में प्रवेश कर गए। अवतार पूर्ण हुआ। कहते हैं उस दिन मृत्यु भी समझ गई कि भक्ति के सामने उसका अधिकार सीमित है। काल सबको ले जाता है पर सच्ची भक्ति को नहीं। इसीलिए हनुमान आज भी जीवित हैं। जहां-जहां राम का नाम वहांवहां हनुमान। अगर आपको यह प्रसंग मूल्यवान लगा हो तो इस वीडियो को लाइक करें और अपने परिवार के साथ जरूर शेयर करें। ऐसी ही और आध्यात्मिक गहराइयों को जानने के लिए पेज को फॉलो करें और कमेंट्स में जय बजरंग बली जरूर लिखें।

Wednesday, 1 April 2026

हनुमान जयंती विशेष

 *श्री हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं।* 💐💐 


‘रामजी तुम्हें प्रेम करेंगे’..... 




श्री हनुमान जयंती, - 2 अप्रैल


हनुमानजी माता सीता की खोज में अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए लंका पहुँचे । अशोक वाटिका में माता सीता के दर्शन कर उन्हें भगवान राम का संदेश दिया । माता सीता हनुमानजी पर बहुत प्रसन्न हुईं तथा उनको आशीर्वाद दिया ।


कितनी कसौटियों से गुजरने के बाद हनुमानजी को माता सीता का आशीर्वाद प्राप्त होता है । सीताजी ने हनुमानजी को आशीर्वाद दिया कि ‘‘अजर बनो ।’’ लेकिन अजर होने (कभी वृद्ध न होने) का आशीर्वाद सुनकर हनुमानजी खामोश ही खड़े रहे, तनिक भी नहीं हिले-डुले । सीताजी को लगा कि शायद अजर होने का वरदान इसे कम पड़ता है, इसलिए उन्होंने दूसरा वरदान दिया कि ‘‘तुम अमर बनोगे ।’’ परंतु हनुमानजी इससे भी प्रभावित नहीं हुए । जब माता को लगा कि इसे अजर-अमर होने में रस नहीं है, तब तो उन्होंने तीसरा आशीर्वाद दिया कि ‘‘...गुननिधि सुत होहू । तुम गुणों की निधि होओगे ।’’


हनुमानजी को इससे भी आनंद न मिला तब माताजी समझ गयीं कि इसको किस बात की भूख है । उन्होंने कहा : ‘‘अजर, अमर और गुणनिधि तो ठीक लेकिन जाओ, मेरा आशीर्वाद है कि श्रीराम तुमसे बहुत प्रेम करेंगे ।


करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ।।’’


‘प्रेम करेंगे’- इतना सुनते ही हनुमानजी को मानो समाधि लग गयी । कुछ समय बाद वे बोले : ‘‘बस माँ ! मुझे यही चाहिए । मुझे अजर-अमरवाला वरदान नहीं, मुझे तो ‘मेरे भगवान मुझसे प्रेम करें’- यही चाहिए ।’’


सीता माता ने पूछा : ‘‘हनुमंत ! इतने सारे आशीर्वाद मिले फिर भी तुम खुश न हुए लेकिन ‘रामजी तुम्हें प्रेम करेंगे’ यह सुनकर तुम शरीर की सुध-बुध भी खो बैठे, इसका क्या कारण है ?’’


हनुमानजी ने वंदन कर कहा : ‘‘माता ! आप तो सर्वज्ञ हैं, सब जानती हैं । श्रीराम जिससे प्रेम करें, उसके लिए तो क्या कहना ! उसके वर्णन के लिए तो मेरे पास शब्द ही नहीं हैं ।’’


फिर लंका में अपनी पूँछ का चमत्कार दिखाकर प्रभु के पास लौटने से पहले हनुमानजी पुनः अशोक वाटिका में माता से आज्ञा माँगने पहुँचे तो हनुमानजी की सच्ची निष्ठा से माता बहुत प्रसन्न हुईं । सीता माता ने उन्हें भगवान श्रीराम के लिए संदेश दिया और आशीर्वाद देकर हनुमानजी को जाने की आज्ञा प्रदान की । हनुमानजी की अनन्य निष्ठा का ही तो यह फल है कि जहाँ भी ‘राम-लक्ष्मण-जानकी’ को याद किया जाता है, वहाँ हनुमानजी का जयघोष अवश्य होता है । 


राम लक्ष्मण जानकी । जय बोलो हनुमान की ।। 


(लोक कल्याण सेतु : मार्च 2013)

Thursday, 19 March 2026

Amway कंपनी का क्या हुआ

 AMWAY નામની માર્કેટિંગ કંપની શરૂ થઈ હતી. જેમાં ખૂબ પૈસા કમાઈ શકાશે. પછી શું થયું? કોઈ પૈસાદાર થયું?

AMWAY (એમવે) એક સમયે ભારતમાં ઘરે-ઘરે જાણીતું નામ બની ગયું હતું. "તમારા પોતાના બોસ બનો" અને "ઘરે બેઠા લાખો કમાઓ" જેવી વાતોને કારણે લાખો લોકો તેમાં જોડાયા હતા.


તમારા પ્રશ્નનો સીધો જવાબ એ છે કે: ખૂબ ઓછા લોકો (માત્ર 1% થી પણ ઓછા) આમાંથી પૈસાદાર થયા, જ્યારે મોટાભાગના લોકોએ માત્ર પૈસા અને સમય ગુમાવ્યો.


હાલમાં કંપનીની સ્થિતિ અને શું થયું તેની વિગતવાર હકીકત નીચે મુજબ છે:


૧. શું કોઈ ખરેખર પૈસાદાર થયું?


હા, પણ માત્ર ગણતરીના લોકો.


વાસ્તવિકતા: આ બિઝનેસ મોડેલ (Pyramid structure) એવું છે કે જેમાં માત્ર ટોચ પર બેઠેલા 1% લોકો જ મોટી કમાણી કરે છે.

નીચલા સ્તરના લોકો: 90% થી વધુ લોકો જેઓ ડિસ્ટ્રીબ્યુટર તરીકે જોડાયા હતા, તેઓને કોઈ ખાસ નફો થયો નથી. ઉલટાનું, મોંઘી પ્રોડક્ટ્સ ખરીદવી, સેમિનારની ફી અને આવવા-જવાનો ખર્ચ કાઢતા ઘણા લોકો ખોટમાં રહ્યા.

મોટાભાગના લોકો થોડા સમય પછી કંટાળીને અથવા નુકસાન કરીને નીકળી ગયા.

૨. કાયદાકીય મુસીબતો (સરકારી તપાસ)


સરકારને જ્યારે સમજાયું કે આ સ્કીમમાં નવા લોકોને જોડવાથી જ પૈસા ફરે છે (Money Circulation Scheme), ત્યારે કડક પગલાં લેવાયા:


ED (Enforcement Directorate) ની કાર્યવાહી: વર્ષ 2023-24 ની આસપાસ ED એ Amway India સામે મની લોન્ડરિંગનો કેસ કર્યો અને લગભગ 750 કરોડ રૂપિયાથી વધુની સંપત્તિ જપ્ત (Attach) કરી લીધી.

આરોપ: એજન્સીનું કહેવું હતું કે કંપની પ્રોડક્ટ વેચવા પર ધ્યાન આપવાને બદલે લોકોને "સભ્યો બનાવવા" પર વધુ ભાર આપે છે, જે એક પ્રકારનું પિરામિડ ફ્રોડ છે.

૩. અત્યારે શું સ્થિતિ છે? (Current Status 2025)


કંપની બંધ નથી થઈ, પણ તેનો વ્યાપ અને ક્રેઝ ઘણો ઘટી ગયો છે:


નુકસાન: તાજેતરના રિપોર્ટ્સ (2024-25) મુજબ, Amway India હવે નફાને બદલે ખોટ (Loss) કરી રહી છે.

નવો રસ્તો: કાયદાકીય ભીંસ વધતા કંપનીએ હવે પોતાની સ્ટ્રેટેજી બદલી છે. હવે તેઓ લોકોને "મેમ્બર" બનાવવાને બદલે સીધા "સ્ટોર" ખોલવા અને હેલ્થ/વેલનેસ પ્રોડક્ટ્સ વેચવા પર ધ્યાન આપી રહ્યા છે.

કંપનીના CEO એ તાજેતરમાં ભારતમાં નવું રોકાણ કરવાની જાહેરાત કરી છે, પણ હવે તે પહેલા જેવી "સ્કીમ" રહી નથી.

નિષ્કર્ષ


જે લોકો શરૂઆતમાં જોડાયા હતા (15-20 વર્ષ પહેલાં) તેઓ કદાચ પૈસાદાર થયા હશે, પરંતુ અત્યારે સામાન્ય માણસ માટે આમાં જોડાઈને પૈસાદાર થવું લગભગ અશક્ય છે. હવે લોકો પણ જાગૃત થઈ ગયા છે કે માત્ર મહેનત અને સ્કિલથી જ પૈસા કમાઈ 

શકાય છે, લોકોને જોડીને નહીં.


Thursday, 19 February 2026

तक्षक राजा कथा

"जिहाद "का जवाब "जिहाद" से देने वाला पहला हिंदू योद्धा तक्षक


मुहम्मद बिन कासिम ने सन 712 में भारत पर आक्रमण किया।


वह बेहद क्रूर और अत्याचारी था।


उसने अपने आक्रमण में एक भी युवा को जीवित नहीं छोड़ा।


कासिम के इस नरसंहार को 8 वर्ष का बालक तक्षक 

चुपचाप देख रहा था। वही इस कथा का मुख्य पात्र है।


तक्षक के पिता सिन्धु नरेश राजा दाहिर के सैनिक थे।

कासिम की सेना के साथ लड़ते हुए वह वीरगति को प्राप्त हुए थे।


राजा दाहिर के मरने के बाद लूट मार करते हुए अरबी सेना तक्षक के गांव में पहुंची, तो गांव में हाहाकार मच गया।


स्त्रियों को घरों से बाहर खींच-खींच कर सरे-आम इज्ज़त लूटी जाने लगी।

भय के कारण तक्षक के घर में सब चिल्ला उठे। तक्षक की दो बहनें डर से कांपने लगीं।

 तक्षक की मां सब परिस्थिति भांप चुकी थी। उसने कुछ पल अपने तीनों बच्चों की तरफ देखा। 


उन्हें गले लगा लियाऔर रो पड़ी।


अगले ही पल उस क्षत्राणी ने तलवार से दोनों बेटियों का सिर धड़ से अलग कर दिया। 


उसकी मां ने तक्षक की ओर देखा और तलवार अपनी छाती में उतार ली। 


यह सब घटना आठ वर्ष का अबोध बालक "तक्षक" देख रहा था।


वह अबोध बालक अपने घर के पिछले दरवाजे से बाहर निकल कर खेतों की तरफ भागा।

और समय के साथ बड़ा होता गया।


तक्षक भटकता हुआ कन्नौज के राजा "नागभट्ट" के पास पहुँचा। उस समय वह 25 वर्ष का हो चुका था।


वह नागभट्ट की सेना में भर्ती हो गया।


अपनी बुद्धि बल के कारण वह कुछ ही समय में राजा का अंगरक्षक बन गया। 


तक्षक के चेहरे पर कभी न खुशी न गम दिखता था।


उसकी आंखें हमेशा क्रोध से लाल रहतीं थीं। उसके पराक्रम के किस्से सेना में सुनाए जाते थे।


तक्षक इतना बहादुर था कि तलवार के एक वार से हाथी का सिर कलम कर देता था।

सिन्धु पर शासन कर रही अरब सेना कई बार कन्नौज पर आक्रमण कर चुकी थी लेकिन हमेशा नागभट्ट की बहादुर सेना उन्हें युद्ध में हरा देती थी।और वे भाग जाते थे। युद्ध के सनातन नियमों का पालन करते हुए राजा नागभट्ट की सेना इन भागे हुए जेहादियों का पीछा नहीं करती थी।


इसी कारण वे मजबूत होकर बार बार कन्नौज पर आक्रमण करते रहते थे।


एक बार फिर अरब के खलीफा के आदेश से सिन्धु की विशाल सेना कन्नौज पर आक्रमण करने आयी।  


यह खबर पता चली तो कन्नौज के राजा नागभट्ट ने अपने सेनापतियों की बैठक बुलाई।      


सब अपने अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। 


इतने में महाराजा का अंग रक्षक तक्षक खड़ा हुआ। 


उसने कहा महाराज हमें दुश्मन को उसी की भाषा में ज़बाब देना होगा।


एक पल नागभट् ने तक्षक की ओर देखा,


फिर कहा कि अपनी बात खुल कर कहो तक्षक क्या कहना चाहते हो।


तक्षक ने महाराजा नागभट्ट से कहा कि अरब सैनिक महा बरबर, जालिम, अत्याचारी, जेहादी मानसिकता के लोग हैं। उनके साथ सनातन नियमों के अनुसार युद्ध करना अपनी प्रजा के साथ अन्याय होगा।


उन्हें उन्हीं की भाषा में ज़बाब देना होगा।


महाराजा ने कहा किन्तु हम धर्म और मर्यादा को कैसे छोड़ सकते हैं "तक्षक"।

तक्षक ने कहा कि मर्यादा और धर्म का पालन उनके साथ किया जाता है जो मर्यादा और धर्म का मर्म समझें। इन राक्षसों का धर्म हत्या और बलात्कार है। इनके साथ वैसा ही व्यवहार करके युद्ध जीता जा सकता है ।


राजा का मात्र एक ही धर्म होता है - प्रजा की रक्षा। राजन: आप देवल और मुल्तान का युद्ध याद करें। मुहम्मद बिन कासिम ने युद्ध जीता, दाहिर को पराजित किया और उसके पश्चात प्रजा पर कितना अत्याचार किया।


यदि हम पराजित हुए तो हमारी स्त्रियों और बच्चों के साथ वे वैसा ही व्यवहार करेंगे।

महाराज: आप जानते ही हैं कि भारतीय नारियों को किस तरह खुले बाजार में राजा दाहिर के हारने के बाद बेचा गया । उनका एक वस्तु की तरह भोग किया गया।


महाराजा ने देखा कि तक्षक की बात से सभा में उपस्थित सारे सेनापति सहमत हैं।

महाराजा नागभट्ट गुप्त कक्ष की ओर तक्षक के साथ बढ़े और गुप्तचरों के साथ बैठक की।


 तक्षक के नेतृत्व में युद्ध लड़ने का फैसला हुआ। अगले ही दिन कन्नौज की सीमा पर दोनों सेनाओं का पड़ाव हो चुका था। आशा थी कि अगला प्रभात एक भीषण युद्ध का साक्षी होगा।


आधी रात बीत चुकी थी। अरब की सेना अपने शिविर में सो रही थी। 


अचानक ही तक्षक के नेतृत्व में एक चौथाई सेना अरब के सैनिकों पर टूट पड़ी।

जब तक अरब सैनिक संभलते तब तक मूली गाजर की तरह हजारों अरबी सैनिकों को तक्षक की सेना मार चुकी थी। किसी हिंदू शासक से रात्री युद्ध की आशा अरब सैनिकों को न थी। सुबह से पहले ही अरबी सैनिकों की एक चौथाई सेना मारी जा चुकी थी। बाकी सेना भाग खड़ी हुई। 


जिस रास्ते से अरब की सेना भागी थी उधर राजा नागभट्ट अपनी बाकी सेना के साथ खड़े थे। सारे अरबी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। एक भी सैनिक नहीं बचा। युद्ध समाप्त होने के बाद राजा नागभट्ट वीर तक्षक को ढूंढने लगे।

वीर तक्षक वीरगति को प्राप्त हो चुका था। उसने अकेले हजारों जेहादियों को मौत की नींद सुला दिया था।


राजा नागभट ने वीर तक्षक की भव्य प्रतिमा बनवायी।


 कन्नौज में आज भी उस बहादुर तक्षक की प्रतिमा विद्यमान है।


यह युद्ध सन् 733 में हुआ था। उसके बाद लगभग 300 वर्ष तक अरब से दूसरे किसी आक्रमणकारी को आक्रमण करने की हिम्मत नहीं हुई।


यह इतिहास की घटना है जो सत्य पर आधारित है।


जागो हिन्दू जागो अपनी मातृभूमि की रक्षा करो।


राजेन्द्र सिंह आर्य

Sunday, 15 February 2026

शिवलिंग पर क्या चढ़ाए

 1. भगवान शिव को चावल चढ़ाने से धन की प्राप्ति होती है।

2. तिल चढ़ाने से पापों का नाश हो जाता है।

3. जौ अर्पित करने से सुख में वृद्धि होती है।

4. गेहूं चढ़ाने से संतान वृद्धि होती है।

1. बुखार होने पर भगवान शिव को जल चढ़ाने से शीघ्र लाभ मिलता है। सुख व संतान की वृद्धि के लिए भी जल द्वारा शिव की पूजा उत्तम बताई गई है।

2. तेज दिमाग के लिए शक्कर मिला दूध भगवान शिव को चढ़ाएं।

3. शिवलिंग पर गन्ने का रस चढ़ाया जाए तो सभी आनंदों की प्राप्ति होती है।

4. शिव को गंगा जल चढ़ाने से भोग व मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है।

5. शहद से भगवान शिव का अभिषेक करने से टीबी रोग में आराम मिलता है।

6. यदि शारीरिक रूप से कमजोर कोई व्यक्ति भगवान शिव का अभिषेक गाय के शुद्ध घी से करे तो उसकी कमजोरी दूर हो सकती है।

1. लाल व सफेद आंकड़े के फूल से भगवान शिव का पूजन करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।

2. भगवान शिव की पूजा चमेली के फूल से करने पर वाहन सुख मिलता है।

3. अलसी के फूलों से शिव की पूजा करने पर मनुष्य भगवान विष्णु को प्रिय होता है।

4. शमी वृक्ष के पत्तों से पूजन करने पर मोक्ष प्राप्त होता है।

5. बेला के फूल से पूजा करने पर सुंदर व सुशील पत्नी मिलती है।

6. जूही के फूल से भगवान शिव की पूजा करें तो घर में कभी अन्न की कमी नहीं होती।

7. कनेर के फूलों से भगवान शिव की पूजा करने से नए वस्त्र मिलते हैं।

8. हरसिंगार के फूलों से पूजन करने पर सुख-सम्पत्ति में वृद्धि होती है।

9. धतूरे के फूल से पूजन करने पर भगवान शंकर सुयोग्य पुत्र प्रदान करते हैं, जो कुल का नाम रोशन करता है।

10.लाल डंठलवाला धतूरा शिव पूजा में शुभ माना गया है।

अगर किसी व्यक्ति की शादी में बाधाएं आ रही हैं तो शिवलिंग पर केसर मिला कर दूध चढ़ाएं। माता पार्वती की भी पूजा करें।*

Monday, 9 February 2026

ભીષ્મ અને કર્ણ ના પાપ



























 મહાભારતના યુદ્ધ પછી જ્યારે ભગવાન કૃષ્ણ પાછા ફર્યા ત્યારે ક્રોધિત રુક્મિણીએ તેમને પૂછ્યું."બીજું બધું બરાબર છે, પણ તમે દ્રોણાચાર્ય અને ભીષ્મ પિતામહ જેવા ધર્મનિષ્ઠ લોકોની હત્યામાં કેમ સહકાર આપ્યો?"શ્રી કૃષ્ણએ જવાબ આપ્યો, "તે સાચું છે કે બંનેએ જીવનભર ધર્મનું પાલન કર્યું, પરંતુ તેઓએ કરેલા એક પાપે તેમના તમામ પુણ્ય છીનવી લીધા."

"તે પાપો શું હતા?"શ્રી કૃષ્ણએ કહ્યું, "જ્યારે સભામાં દ્રૌપદીનું વસ્ત્રાહરણ કરવામાં આવ્યું હતું, ત્યારે તે બંને હાજર હતા અને વડીલો તરીકે દુશાસનનો આદેશ આપી શક્યા હોત, પરંતુ તેઓએ તેમ ન કર્યું.

તેમના આ એક પાપને કારણે તેમની બિનસાંપ્રદાયિકતા ઓછી થઈ ગઈ."રુક્મિણીએ પૂછ્યું,

"અને કર્ણ? તે તેની ધર્માદા માટે પ્રખ્યાત હતો, તેના દરવાજેથી કોઈ ખાલી હાથે પસાર થયું ન હતું, તેમાં ખોટું શું છે?શ્રી કૃષ્ણએ કહ્યું, "તે સાચું છે કે તેઓ તેમના દાન માટે પ્રખ્યાત હતા અને ક્યારેય કોઈને નારાજ કરતા નહોતા. પરંતુ જ્યારે અભિમન્યુ યુદ્ધના મેદાનમાં ઘાયલ થયો, તેણે કર્ણ પાસે પાણી માંગ્યું, જે તેની પડખે ઊભો હતો. જ્યાં કર્ણ ઊભો હતો ત્યાં પાણીનો કૂવો હતો, પણ કર્ણએ મૃત્યુશૈયા પર ઘાયલ અભિમન્યુને પાણી ન આપ્યું.એટલે જીવનભર દાન દ્વારા મેળવેલ યોગ્યતા નષ્ટ પામ્યો હતો. પાછળથી તેના રથનું પૈડું એ જ ખાઈમાં ફસાઈ ગયું અને તેનું મૃત્યુ થયું."ઘણીવાર એવું બને છે કે આપણી આસપાસ કંઈક ખોટું થઈ રહ્યું છે અને આપણે કંઈ કરતા નથી. અમને લાગે છે કે અમે આ પાપનો ભાગ નથી, પરંતુ કંઈ ન કરીને, મદદ કરવાની સ્થિતિમાં પણ, અમે તેના સમાન ભાગ છીએ.જો આપણે કોઈ સ્ત્રી, વૃદ્ધ, નિર્દોષ કે નિર્બળને જુલમ થતો જોતા હોઈએ તો પણ જો આપણે તેમને મદદ ન કરીએ તો આપણે પણ તે પાપમાં ભાગીદાર હોઈએ છીએ. લોકો માર્ગ અકસ્માતમાં ઘાયલ વ્યક્તિને મદદ કરતા નથી કારણ કે તેઓ વિચારે છે કે તેઓ પોલીસ દ્વારા પકડાઈ જશે.તમારા અધર્મની એક ક્ષણ જીવનભરના ધર્મને નષ્ટ કરી શકે છે.