Monday, 25 May 2026

गांधारी का श्राप

श्री कृष्ण की नगरी द्वारिका महाभारत युद्ध के 36 वर्ष पश्चात समुद्र में डूब जाती है। द्वारिका के समुद्र में डूबने से पूर्व श्री कृष्ण सहित सारे यदुवंशी भी मारे जाते है। समस्त यदुवंशियों के मारे जाने और द्वारिका के समुद्र में विलीन होने के पीछे मुख्य रूप से दो घटनाएं जिम्मेदार है। एक माता गांधारी द्वारा श्री कृष्ण को दिया गया श्राप और दूसरा ऋषियों द्वारा श्री कृष्ण पुत्र सांब को दिया गया श्राप। आइए इस घटना पर विस्तार से जानते है।


गांधारी ने दिया था यदुवंश के नाश का श्राप - महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा


ऋषियों ने दिया था सांब को श्राप - महाभारत युद्ध के बाद जब छत्तीसवां वर्ष आरंभ हुआ तो तरह-तरह के अपशकुन होने लगे। एक दिन महर्षि विश्वामित्र, कण्व, देवर्षि नारद आदि द्वारका गए। वहां यादव कुल के कुछ नवयुवकों ने उनके साथ परिहास (मजाक) करने का सोचा। वे श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को स्त्री वेष में ऋषियों के पास ले गए और कहा कि ये स्त्री गर्भवती है। इसके गर्भ से क्या उत्पन्न होगा?


ऋषियों ने जब देखा कि ये युवक हमारा अपमान कर रहे हैं तो क्रोधित होकर उन्होंने श्राप दिया कि- श्रीकृष्ण का यह पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए एक लोहे का मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा तुम जैसे क्रूर और क्रोधी लोग अपने समस्त कुल का संहार करोगे। उस मूसल के प्रभाव से केवल श्रीकृष्ण व बलराम ही बच पाएंगे। श्रीकृष्ण को जब यह बात पता चली तो उन्होंने कहा कि ये बात अवश्य सत्य होगी।


मुनियों के श्राप के प्रभाव से दूसरे दिन ही सांब ने मूसल उत्पन्न किया। जब यह बात राजा उग्रसेन को पता चली तो उन्होंने उस मूसल को चुरा कर समुद्र में डलवा दिया। इसके बाद राजा उग्रसेन व श्रीकृष्ण ने नगर में घोषणा करवा दी कि आज से कोई भी वृष्णि व अंधकवंशी अपने घर में मदिरा तैयार नहीं करेगा। जो भी व्यक्ति छिपकर मदिरा तैयार करेगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। घोषणा सुनकर

द्वारकावासियों ने मदिरा नहीं बनाने का निश्चय किया। द्वारका में होने लगे थे भयंकर अपशकुन इसके बाद द्वारका में भयंकर अपशकुन होने लगे। प्रतिदिन आंधी चलने लगी। चूहे इतने बढ़ गए कि मार्गों पर मनुष्यों से ज्यादा दिखाई देने लगे। वे रात में सोए हुए मनुष्यों के बाल और नाखून कुतरकर खा जाया करते थे। सारस उल्लुओं की और बकरे गीदड़ों की आवाज निकालने लगे। गायों के पेट से गधे, कुत्तियों से बिलाव और नेवलियों के गर्भ से चूहे पैदा होने लगे। उस समय यदुवंशियों को पाप करते शर्म नहीं आती थी।


अंधकवंशियों के हाथों माक्रे गए थे प्रद्युम्न - जब श्रीकृष्ण ने नगर में होते इन अपशकुनों को देखा तो उन्होंने सोचा कि कौरवों की माता गांधारी का श्राप सत्य होने का समय आ गया है। इन अपशकुनों को देखकर तथा पक्ष के तेरहवें दिन अमावस्या का संयोग जानकर श्रीकृष्ण काल की अवस्था पर विचार करने लगे।


उन्होंने देखा कि इस समय वैसा ही योग बन रहा है जैसा महाभारत के युद्ध के समय बना था। गांधारी के श्राप को सत्य करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण ने यदुवंशियों को तीर्थयात्रा करने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण की आज्ञा से सभी राजवंशी समुद्र के तट पर प्रभास तीर्थ आकर निवास करने लगे।


प्रभास तीर्थ में रहते हुए एक दिन जब अंधक व वृष्णि वंशी आपस में बात कर रहे थे। तभी सात्यकि ने आवेश में आकर कृतवर्मा का उपहास और अनादर कर दिया। कृतवर्मा ने भी कुछ ऐसे शब्द कहे कि सात्यकि को क्रोध आ गया और उसने कृतवर्मा का वध कर दिया। यह देख अंधकवंशियों ने सात्यकि को घेर लिया और हमला कर दिया।


सात्यकि को अकेला देख श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न उसे बचाने दौड़े। सात्यकि और प्रद्युम्न अकेले ही अंधकवंशियों से भिड़ गए। परंतु संख्या में अधिक होने के कारण वे अंधकवंशियों को पराजित नहीं कर पाए और अंत में उनके हाथों मारे गए।

यदुवंशियों के नाश के बाद अर्जुन को बुलवाया था श्रीकृष्ण ने अपने पुत्र और सात्यकि की मृत्यु से क्रोधित होकर श्रीकृष्ण ने एक मुट्ठी एरका घास उखाड़ ली। हाथ में आते ही वह घास वज्र के समान भयंकर लोहे का मूसल बन गई। उस मूसल से श्रीकृष्ण सभी का वध करने लगे। जो कोई भी वह घास उखाड़ता वह भयंकर मूसल में बदल जाती (ऐसा ऋषियों के श्राप के कारण हुआ था)।


उन मूसलों के एक ही प्रहार से प्राण निकल जाते थे। उस समय काल के प्रभाव से अंधक, भोज, शिनि और वृष्णि वंश के वीर मूसलों से एक-दूसरे का वध करने लगे। यदुवंशी भी आपस में लड़ते हुए मर ने लगे।


श्रीकृष्ण के देखते ही देखते सांब, चारुदेष्ण, अनिरुद्ध और गद की मृ त्यु हो गई। फिर तो श्रीकृष्ण और भी क्रोधित हो गए और उन्होंने शेष बचे सभी वीरों का संहार कर डाला। अंत में केवल दारुक (श्रीकृष्ण के सारथी) ही शेष बचे थे।


श्रीकृष्ण ने दारुक से कहा कि तुम तुरंत हस्तिनापुर जाओ और अर्जुन को पूरी घटना बता कर द्वारका ले आओ। दारुक ने ऐसा ही किया। इसके बाद श्रीकृष्ण बलराम को उसी स्थान पर रहने का कहकर द्वारका लौट आए।


बलरामजी के स्वधाम गमन के बाद ये किया श्रीकृष्ण ने – द्वारका आकर श्रीकृष्ण ने पूरी घटना अपने पिता वसुदेवजी को बता दी। यदुवंशियों के संहार की बात जान कर उन्हें भी बहुत दुख हुआ। श्रीकृष्ण ने वसुदेवजी से कहा कि आप अर्जुन के आने तक स्त्रियों की रक्षा करें। इस समय बलरामजी वन में मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनसे मिलने जा रहा हूं।


जब श्रीकृष्ण ने नगर में स्त्रियों का विलाप सुना तो उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि शीघ्र ही अर्जुन द्वारका आने वाले हैं। वे ही तुम्हारी रक्षा करेंगे। ये कहकर श्रीकृष्ण बलराम से मिलने चल पड़े।


वन में जाकर श्रीकृष्ण ने देखा कि बलरामजी समाधि में लीन हैं। देखते ही देखते उनके मुख से सफेद रंग का बहुत बड़ा सांप निकला और समुद्र की ओर चला गया। उस सांप के हजारों मस्तक थे। समुद्र ने स्वयं प्रकट होकर भगवान शेषनाग का स्वागत किया। बलरामजी द्वारा देह त्यागने के बाद श्रीकृष्ण उस सूने वन में विचार करते हुए घूमने लगे।


घूमते-घूमते वे एक स्थान पर बैठ गए और गांधारी द्वारा दिए गए श्राप के बारे में विचार करने लगे। देह त्यागने की इच्छा से श्रीकृष्ण ने अपनी इंद्रियों का संयमित किया और महायोग (समाधि) की अवस्था में पृथ्वी पर लेट गए। ऐसे त्यागी श्रीकृष्ण ने देह – जिस समय भगवान श्रीकृष्ण समाधि में लीन थे, उसी समय जरा नाम का एक शिकारी हिरणों का शिकार करने के उद्देश्य से वहां आ गया। उसने हिरण समझ कर दूर से ही श्रीकृष्ण पर बाण चला दिया। बाण चलाने के बाद जब वह अपना शिकार पकडऩे के लिए आगे बढ़ा तो योग में स्थित भगवान श्रीकृष्ण को देख कर उसे अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ।


तब श्रीकृष्ण को उसे आश्वासन दिया और अपने परमधाम चले गए। अंतरिक्ष में पहुंचने पर इंद्र, अश्विनीकुमार, रुद्र, आदित्य, वसु, मुनि आदि सभी ने भगवान का स्वागत किया। इधर दारुक ने हस्तिनापुर जाकर यदुवंशियों के संहार की पूरी घटना पांडवों को बता दी। यह सुनकर पांडवों को बहुत शोक हुआ। अर्जुन तुरंत ही अपने मामा वसुदेव से मिलने के लिए द्वारका चल दिए। अर्जुन जब द्वारका पहुंचे तो वहां का दृश्य देखकर उन्हें बहुत शोक हुआ। श्रीकृष्ण की रानियां उन्हें देखकर रोने लगी।


उन्हें रोता देखकर अर्जुन भी रोने लगे और श्रीकृष्ण को याद करने लगे। इसके बाद अर्जुन वसुदेवजी से मिले। अर्जुन को देखकर वसुदेवजी बिलख-बिलख रोने लगे। वसुदेवजी ने अर्जुन को श्रीकृष्ण का संदेश सुनाते हुए कहा कि द्वारका शीघ्र ही समुद्र में डूबने वाली है अत: तुम सभी नगरवासियों को अपने साथ ले जाओ।


उन्हें रोता देखकर अर्जुन भी रोने लगे और श्रीकृष्ण को याद करने लगे। इसके बाद अर्जुन वसुदेवजी से मिले। अर्जुन को देखकर वसुदेवजी बिलख-बिलख रोने लगे। वसुदेवजी ने अर्जुन को श्रीकृष्ण का संदेश सुनाते हुए कहा कि द्वारका शीघ्र ही समुद्र में डूबने वाली है अत: तुम सभी नगरवासियों को अपने साथ ले जाओ।


अर्जुन अपने साथ ले गए श्रीकृष्ण के परिजनों को – वसुदेवजी की बात सुनकर अर्जुन ने दारुक से सभी मंत्रियों को बुलाने के लिए कहा। मंत्रियों के आते ही अर्जुन ने कहा कि मैं सभी नगरवासियों को यहां से इंद्रप्रस्थ ले जाऊंगा, क्योंकि शीघ्र ही इस नगर को समुद्र डूबा देगा।


अर्जुन अपने साथ ले गए श्रीकृष्ण के परिजनों को – वसुदेवजी की बात सुनकर अर्जुन ने दारुक से सभी मंत्रियों को बुलाने के लिए कहा। मंत्रियों के आते ही अर्जुन ने कहा कि मैं सभी नगरवासियों को यहां से इंद्रप्रस्थ ले जाऊंगा, क्योंकि शीघ्र ही इस नगर को समुद्र डूबा देगा।


अर्जुन ने मंत्रियों से कहा कि आज से सातवे दिन सभी लोग इंद्रप्रस्थ के लिए प्रस्थान करेंगे इसलिए आप शीघ्र ही इसके लिए तैयारियां शुरू कर दें। सभी मंत्री तुरंत अर्जुन की आज्ञा के पालन में जुट गए। अर्जुन ने वह रात श्रीकृष्ण के महल में ही बिताई।


गली सुबह श्रीकृष्ण के पिता वसुदेवजी ने प्राण त्याग दिए। अर्जुन ने विधि-विधान से उनका अंतिम संस्कार किया। वसुदेवजी की पत्नी देवकी, भद्रा, रोहिणी व मदिरा भी चिता पर बैठकर सती हो गईं। इसके बाद अर्जुन ने प्रभास तीर्थ में मारे गए समस्त यदुवंशियों का भी अंतिम संस्कार किया।


सातवे दिन अर्जुन श्रीकृष्ण के परिजनों तथा सभी नगरवासियों को साथ लेकर इंद्रप्रस्थ की ओर चल दिए। उन सभी के जाते ही द्वारका नगरी समुद्र में डूब गई। ये दृश्य देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। 

Tuesday, 19 May 2026

द्वापर युग अंत

 यह कथा द्वापर युग के अंत और कलयुग के प्रारंभ की संधि की है, जब कुरुक्षेत्र का मैदान रक्त से लाल हो चुका था।


महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद पांडवों ने राजपाट तो संभाल लिया, लेकिन उनके अंतर्मन में शांति नहीं थी। अपने ही बंधु-बांधवों और गुरुओं के वध के कारण उन पर 'गोत्र-हत्या' और 'ब्रह्म-हत्या' का दोष था। भगवान श्री कृष्ण के परामर्श पर, पांडव महादेव से क्षमा याचना करने और उनका आशीर्वाद लेने के लिए निकल पड़े।


पांडव सर्वप्रथम काशी पहुँचे, लेकिन भगवान शिव पांडवों द्वारा किए गए विनाश से रुष्ट थे। वे उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे गुप्त रूप से हिमालय चले गए। पांडव भी हार मानने वाले नहीं थे; वे उन्हें खोजते हुए केदारखंड (वर्तमान उत्तराखंड) की ऊँचाइयों तक पहुँच गए।

भगवान शिव ने पांडवों को आते देख एक बैल (वृषभ) का रूप धारण कर लिया और गुप्तकाशी के पास चर रहे पशुओं के झुंड में शामिल हो गए।


पांडवों को आभास हो गया कि महादेव इसी झुंड में छिपे हैं। तब भीम ने एक युक्ति अपनाई:


भीम ने अपना शरीर अत्यंत विशाल किया और दो पर्वतों पर अपने पैर फैला दिए।


सारे पशु भीम के पैरों के नीचे से निकल गए, लेकिन महादेव (बैल रूपी) ने एक वीर पांडव के चरणों के नीचे से निकलना स्वीकार नहीं किया।


जैसे ही भीम ने बैल को पकड़ने का प्रयास किया, महादेव भूमि में समाने लगे।


तभी भीम ने फुर्ती दिखाते हुए बैल की कूबड़ (पीठ का भाग) को कसकर पकड़ लिया। पांडवों की इस अडिग श्रद्धा को देखकर महादेव का हृदय पिघल गया और वे अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर उन्हें पापमुक्त कर दिया।


जब महादेव बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनके शरीर के अंग पाँच अलग-अलग स्थानों पर ज्योतिर्मय रूप में प्रकट हुए। इन पाँचों स्थानों को पांडवों ने मंदिरों के रूप में स्थापित किया


1.केदारनाथ - यहाँ बैल की पीठ के आकार की शिला पूजी जाती है।


2.तुंगनाथ - यह विश्व का सबसे ऊँचा शिव मंदिर है।


3.रुद्रनाथ - यहाँ महादेव के 'नीलकंठ' मुख के दर्शन होते हैं।


4.मध्यमहेश्वर - यहाँ शिवजी के मध्य भाग की पूजा होती है।


5.कल्पेश्वर - यहाँ महादेव की जटाओं की पूजा होती है; यह वर्षभर खुला रहता है।


कहा जाता है कि जब शिव जी बैल रूप में धरती में समाए, तो उनका ऊपरी भाग (सिर) नेपाल की राजधानी काठमांडू में प्रकट हुआ, जिसे आज हम पशुपतिनाथ के नाम से जानते हैं। केदारनाथ और पशुपतिनाथ को एक ही स्वरूप का हिस्सा माना जाता है।


पांडवों द्वारा निर्मित ये मंदिर आज भी भक्तों के लिए मोक्ष का द्वार हैं। मान्यता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन के बाद अन्य चार केदारों की यात्रा करता है, उसके पितर तृप्त हो जाते हैं और उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है।

हर हर महादेव! 🙏

Friday, 8 May 2026

बाबा वेंगा - एलियन की भविष्यवाणी

 रहस्यमय चैतसिक शक्ति रखने वाली भविष्यवेत्ता ।


दुनिया की प्रसिद्ध भविष्यवेत्ता व्यक्तियों में बाबा वंगा ( वेंगा ) का नाम अग्रगण्य है । बाबा वंगा ( वांगा ) बुल्गारिया की नेत्रहीन महिला थीं ।

The future is hidden in symbols, waiting for those who can see. ‘भविष्य प्रतीकों में छिपा हुआ है, वह उन लोगों की प्रतीक्षा करता है जो उसे देख सकते हैं ।’ – Nostradamus ( नोस्ट्राडेमस ) ।


‘I see what is coming, but I cannot change what people choose.’


‘मैं जो आने वाला है ( होने वाला है ) उसे देखती हूँ, पर मैं लोगों के निर्णय को बदल नहीं सकती ।’


My sight is a gift, not a power. I only relay what i see.


‘मेरी दृष्टि एक ( ईश्वर द्वारा दी गई ) भेंट है, शक्ति नहीं । मैं केवल वही बताती हूँ जो मैं देखती हूँ ।’


I do not predict to frighten, I predict to warn and help.


‘मैं किसी को डराने के लिए भविष्यवाणी नहीं करती, मैं उन्हें चेतावनी देने और सहायता करने के लिए भविष्यवाणी करती हूँ ।’


‘Those who ignore warnings often suffer the consequences.’


‘जो चेतावनियों को नजरअंदाज करते हैं, उन्हें प्रायः उसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं ।’


Do not fear the future, fear ignorance and inaction.


‘भविष्य से मत डरो, अज्ञान और निष्क्रियता से डरो ।’


 


महर्षि पतंजलि के पातंजल योग सूत्र में एक सूत्र है – ‘परिणामत्रयसयंमात् अतीत अनागत ज्ञानम्, ( ३.१८ ) अर्थात तीन प्रकार के परिवर्तन पर संयम रखने से भूतकाल ( बीता हुआ समय ) और भविष्यकाल ( आने वाला समय ) का ज्ञान होता है । मानव मन अनंत शक्तियों का भंडार है । उसकी अगाध शक्तियों में से एक भविष्य ज्ञान से संबंधित है । कुछ लोगों में भविष्य ज्ञान की शक्ति जन्मजात होती है तो कुछ में दुर्घटनावश, अनायास, अचानक प्रकट हो जाती है, कुछ ध्यान-योग जैसी प्रक्रिया से ऐसी शक्ति विकसित कर लेते हैं ।


दुनिया की प्रसिद्ध भविष्यवेत्ता व्यक्तियों में बाबा वंगा ( वेंगा ) का नाम अग्रगण्य है । बाबा वंगा ( वांगा ) बुल्गारिया की नेत्रहीन महिला थीं जिन्हें ‘बाल्कन की नोस्ट्राडेमस’ कहा जाता है । उनका जन्म नाम वंगेलिया पांडेवा सुरचेवा (Vangeliya Pandeva Surcheva) था । बाद में वह विशेष रूप से वंगा दिमित्रोवा के रूप में जानी गईं । भविष्यवेत्ता होने के कारण आज लोग उन्हें विशेष रूप से बाबा वंगा (वेंगा) के नाम से जानते हैं । ३ अक्टूबर १९११ को ओटोमन साम्राज्य (वर्तमान में उत्तरी मैसेडोनिया) के सैलानिका प्रांत के स्ट्रूमिका में उनका जन्म हुआ था । ११ अगस्त १९९६ को ८५ वर्ष की आयु में सोफिया, बुल्गारिया में उनका निधन हुआ था । वह रहस्यवादी, चिकित्सक, उपचारक और भविष्यवेत्ता थीं ।


‘स्टोयानोवा’ के अनुसार जब वह १३ वर्ष की थीं तब एक चक्रवाती तूफान में हवा में उठकर पास के खेत में जा गिरी थीं । उनकी आंखें रेत, धूल और पत्थरों से ढक गई थीं । दर्द के कारण वह आंखें खोल नहीं पा रही थीं । उनकी आंखों को नुकसान हुआ था । उन पर दो ऑपरेशन किए गए लेकिन वे सफल नहीं हुए । तीसरा ऑपरेशन पूरा नहीं हो सका क्योंकि उनके पिता के पास उसके लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे । इसके परिणामस्वरूप उनकी दृष्टि धीरे-धीरे कम होती गई और अंततः वह पूरी तरह अंधी हो गईं लेकिन उसके बाद उनमें ऐसी दिव्य शक्ति प्रकट हुई जिससे उन्हें भविष्य की घटनाएं आंतरिक दृष्टि से दिखाई देने लगीं और उसके आधार पर वह भविष्यवाणी करती थीं जो अधिकांशतः सही सिद्ध होती थीं ।


बचपन में एक दिन उन्होंने अपनी बहन से कहा – मुझे अत्यंत दुख होता है कि हमारे पिता से हमारा वियोग होने वाला है । वे कुछ ही दिनों के मेहमान हैं । मुझे उनका मृत्यु दिखाई दे रही है । उन्होंने अपने पिता की मृत्यु की तारीख भी बताई । किसी ने उनकी बात पर विश्वास नहीं किया । लेकिन उन्होंने जो तारीख बताई थी उसी दिन उनका निधन हो गया । एक दिन उन्होंने अपनी बहन से कहा – ‘दूसरे देश का एक युवा और सुंदर सैनिक हमारे यहाँ आएगा और कुछ समय बाद मेरा विवाह उसी के साथ होगा । पेट्रिय के पास स्थित क्रांसझिलित्सा गाँव का बुल्गारियाई सैनिक गुश्तेरोव अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए हत्यारे का पता लगाने वंगा के पास आया था । १० मई १९४२ को दिमितार गुश्तेरोव ने वंगा से विवाह कर लिया था । वंगा को अपने पति की आयु कम होने का भी आभास हो गया था । उन्होंने इसके बारे में लिखा था – ‘मेरे पति युवा हैं फिर भी १ अप्रैल १९६२ को उनका निधन होगा । वास्तव में ऐसा ही हुआ । बीमारी और शराब की लत के कारण उसी दिन उनका निधन हो गया ।


१९६० के दशक में पेट्रिय नगरपालिका और इंस्टिट्यूट ऑफ सजेस्टोलॉजी ने वंगा की चैतसिक शक्तियों और भविष्यवाणियों का समर्थन किया था । वंगा पर १९७० की पुस्तक ‘साइकिक डिस्कवरीज बिहाइंड आयरन कर्टन’ में चर्चा की गई थी । बुल्गारियन कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सदस्यों ने भी उनकी सलाह ली थी । सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव लियोनिद ब्रेझनेव ने भी उनकी सलाह ली थी । बुल्गारिया के जार बोरिस तृतीय ने भी उनसे मिलकर भविष्य जानने का प्रयास किया था ।


भविष्यवेत्ता के रूप में उनकी ख्याति चारों ओर फैल गई थी । उनके घर के बाहर असंख्य लोगों की भविष्य जानने के लिए लंबी कतारें लगती थीं । बुल्गारियाई लोगों से वह मात्र पाँच डॉलर शुल्क लेती थीं और विदेश से आए लोगों से लगभग तीस डॉलर लेती थीं । वह सारा धन देश के विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लिए सरकार को दे देती थीं और अपनी थोड़ी बहुत आवश्यकताओं के लिए सरकार से केवल लगभग ३०० डॉलर लेती थीं ।


वंगा दिमित्रोवा की अनेक भविष्यवाणियाँ बिल्कुल सत्य सिद्ध हुई हैं । उनके पिता, पति और स्वयं के निधन की जो तिथियाँ उन्होंने बताई थीं उन्हीं तिथियों पर उनका निधन हुआ था । उन्होंने १९८० में भविष्यवाणी की थी कि २००० में रूसी न्यूक्लियर सबमरीन कुर्स्क डूब जाएगी । अंतरराष्ट्रीय बचाव कर्मियों ने कई दिनों तक उस सबमरीन को समुद्र की गहराई से निकालने के प्रयास किए लेकिन वे असफल रहे और उसमें मौजूद लोगों की मृत्यु हो गई ।


११ सितंबर २००१ को न्यूयॉर्क के ट्विन टावर पर आतंकी हमला होने की भविष्यवाणी उन्होंने १९८९ में ही कर दी थी जो सत्य सिद्ध हुई । ट्विन टावर पर दो अपहृत विमानों से हमला कर निर्दोष लोगों की हत्या की गई थी । अमेरिका के ४४वें राष्ट्रपति अफ्रीकी-अमेरिकी होंगे यह भी उन्होंने कहा था और बराक ओबामा उसी प्रकार राष्ट्रपति बने । उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत कब होगी और उसका क्या परिणाम होगा इसकी भी भविष्यवाणी की थी । बुल्गारिया के राजा जार बोरिस-३ की मृत्यु की तिथि भी उन्होंने सही बताई थी । इसी प्रकार उन्होंने चेकोस्लोवाकिया के विभाजन, लेबनान में अशांति, निकारागुआ में युद्ध, साइप्रस में विवाद, इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने और उनकी हत्या, सोवियत संघ के विघटन, यूगोस्लाविया के टूटने, पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के एकीकरण, चेरनोबिल की परमाणु दुर्घटना, स्टालिन की मृत्यु, सीरिया के गृह युद्ध, क्रीमिया के अलग होने जैसी घटनाओं की भी सही भविष्यवाणियाँ की थीं । २००४ में हिंद महासागर में आई सुनामी की भविष्यवाणी भी उन्होंने १९५० में ही कर दी थी । वंगा दिमित्रोवा ने अपनी भविष्यवाणी में प्रिंसेस डायना की मृत्यु का भी उल्लेख किया था । २०१९/२० में फैली कोरोना महामारी के बारे में भी उन्होंने संकेत दिए थे । न्यूयॉर्क पोस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार वंगा ने २०२६ में तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत और मानव जाति का परग्रही जीवों ( Aliens ) से पहला संपर्क होने की भविष्यवाणी की थी ।


उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था – ‘Humanity will make contact with extraterrestrial life, possibly leading to a global crisis or apocalypse. मानवता का संपर्क परग्रही जीवनधारियों से होगा जिससे संभवतः वैश्विक संकट या प्रलय उत्पन्न हो सकता है । २०२६ में कुछ देशों के बीच युद्ध होने की भी भविष्यवाणी की गई थी । वंगा ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ( AI ) के उपयोग में वृद्धि के बारे में भी भविष्यवाणी की थी ।