🌊 स्वामी रामतीर्थ एक पुरानी कथा बताते थे।
एक बार तालाब और नदी में वार्ता हुई। तालाब ने कहा:
“तू क्यों बहती रहती है? पगली है। पतली सी, लम्बी सी बहते-बहते समुद्र में जाकर मिट जाएगी। मुझे देख, मैं सब कुछ संग्रह करके रखता हूँ, इसलिए कितना चौड़ा हूँ।”
नदी बोली:
_“मुझे तो बहते हुए दूसरों के काम आने में आनंद आता है।”_ 🌸
फिर हुआ क्या?
बरसात के मौसम में मलेरिया फैला, मच्छरों की संख्या बढ़ी। नगरपालिका ने मिट्टी और कचरे से तालाब को भरवा दिया, ढँक दिया, बन्द कर दिया।
📌 संग्रह करने का फल मिल गया।
इसी प्रकार कुछ लोग कहते हैं:
“गधे की तरह सेवा करने से क्या लाभ?”
लेकिन नदी ने सिखाया कि वास्तव में वही अज्ञान है।
🔥 देखो, सत्संग में भी कुछ लोग दोष निकालते हैं।
*_“बड़े भाग मानुष तन पावा...”_*
इस मानव जीवन के *एक-एक क्षण* को सार्थक करो।
⏳ जो लोग यूँ ही समय बिताते रहते हैं, उनका जीवन भी यूँ ही निकल जाता है। फिर जैसी वासना, जैसे कर्म, वैसे ही शरीरों में भटकना पड़ता है।
पूर्वकाल में अच्छे राजा प्रजा से लिया हुआ धन अपने उपभोग में नहीं लगाते थे। राजा-रानी अपने लिए खेती तक करते थे। ऐसे उदाहरण भी हुए हैं।
हमारे ज्ञानी महापुरुषों ने तो सूर्य से भी आगे, अरबों मील दूर तक के रहस्यों का चिंतन और वर्णन किया है।
🙏 हमारा किसी से विरोध नहीं है। किसी दल से नहीं, किसी समाज से नहीं।
*“साँप से भी मेरा बैर नहीं है।”*
उनकी सभाओं में मुस्लिम भाई भी जाते हैं, बुर्का पहनने वाली बहनें भी सुनती हैं।
😊 इसी प्रसंग में अहमदाबाद के रेशमी बाजार का एक विनोदी प्रसंग सुनाया। रमज़ान के दिनों में एक कपड़ा व्यापारी सपने में भी कपड़ा बेच रहा था और उसी अवस्था में अपनी ही धोती के दो टुकड़े कर बैठा।
*लधुम गोल्हे सच्चो सतगुरु*
दुनिया खे मां बुधायिंदस
सुतल आहिन जे निंढड़ीअ में
उन्हन खे मां जगाइंदस
भले वने सिर
न कूड़ चवां तिर
न पाण किरां कुअ में
न बेखे चवां किर
सुतल आहिन जे निंढड़ीअ में
उन्हन खे मां जगाइंदस
😄 विनोद करते-करते वे आगे बढ़ गए...
गुरूजी जाते जाते सेवक से पूछे , मेरा कोई प्लान था क्या कि ऐसा बोलूंगा? .. 😄
🌺🙏 *हरि ॐ तत्सत* 🙏🌺
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