🚩 गणेशजी के बड़े भाई *कार्तिक स्वामी* भी पूर्वकाल के बड़े ज्ञानी थे। एक बार वे *सूर्यदेव* से मिलने गए। सूर्यदेव अर्थात केवल वह 13 लाख गुना बड़ा अग्नि का गोला नहीं, वह तो उनका _अधिभौतिक रूप_ है।
☀️ प्रतिदिन करोड़ों टन पदार्थ ग्रहण करके संसार को प्रकाश और ताप देने वाला सूर्य, जिसके कारण दुनिया का काम चल रहा है, उसका भी एक *देवतामय स्वरूप* है।
जैसे कोई मकान बहुत बड़ा हो सकता है, लेकिन उसका मालिक छोटा दिखाई देता है। जैसे शरीर स्थूल दिखाई देता है, पर जब शरीर छूट जाता है तो उसमें रहने वाला दिखता नहीं।
🌊 ऐसे ही गंगाजी भी बहुत दूर तक बहती हैं, लेकिन उनकी पूजा *देवी रूप* में होती है।
इसी प्रकार कार्तिकजी सूर्यदेव से मिलने पहुँचे। स्वागत में सूर्यदेव थाल लेकर आए। तभी उन्होंने देखा कि आकाश मार्ग से कोई दिव्य पुरुष जा रहे हैं।
🔆 सूर्यदेव ने ध्यान करके देखा कि कौन हैं। आजकल के योगी भी बहुत कुछ जान लेते हैं, किन्तु पूर्वकाल में तो *संकल्प बल* अत्यन्त प्रभावशाली था। संकल्प और मंत्र से ही अनेक कार्य सम्पन्न हो जाते थे।
युग बदला तो नीचे _यंत्रों_ का युग आया। मोबाइल आदि से कार्य होने लगे। यह भी ठीक है। 😊
सूर्यदेव ने *“आगच्छ, आगच्छ”* कहकर उनका आवाहन किया और स्वागत किया।
उनके जाने के बाद दूसरी थाली लाने ही वाले थे कि दूसरा विमान भी वहाँ से गुजरा। उसमें भी कोई दिव्य पुरुष थे। सूर्यदेव ने दूसरी थाली उनके स्वागत में अर्पित कर दी।
जब तीसरी थाली लायी गयी तो कार्तिक स्वामी ने कहा:
🙏 _“हे सूर्यदेव, हे भास्कर! आप ज्ञातव्य हैं और लोकाचार में भी महापुरुष हैं। जिनका आपने स्वागत किया, वे कौन थे?”_
सूर्यदेव बोले:
🌟 *“पहली बार जो गए थे, वे संसार में जन्म-मरण में भटके हुए जीवों को पार लगाने वाले कोई ब्रह्मज्ञानी संत थे। इसलिए मैंने उनका स्वागत-अर्चन किया।”*
🌟 *“दूसरी बार जो गए, वे उन संतों के दैवी कार्य में तत्पर रहने वाले सेवक, सत्शिष्य थे। संत और समाज के बीच सेतु बनने वाले, सत्संग को समाज तक पहुँचाने वाले महापुरुष थे।”*
😊 विनोद करते हुए सूर्यदेव बोले:
“जैसे ब्रह्मज्ञानी के आने से पहले सफाई कर्मचारी, नगरपालिका वाले रास्ता तैयार करते हैं, वैसे ही मैं भी कईयों को पहले भेजकर फिर जाऊँगा। वहाँ बिसात बिछाने की सेवा करेंगे...”
_“नगरपालिका देवाय, सर्वेश्वर देवाय...”_ 😄
💫 *जो परहित नहीं कर सकता, वह अपना हित भी नहीं कर सकता।*
*जिसके जीवन में परहित नहीं है, त्याग नहीं है, उससे बड़ा अभागा कोई नहीं।*
🌊 स्वामी रामतीर्थ एक पुरानी कथा बताते थे।
एक बार तालाब और नदी में वार्ता हुई। तालाब ने कहा:
“तू क्यों बहती रहती है? पगली है। पतली सी, लम्बी सी बहते-बहते समुद्र में जाकर मिट जाएगी। मुझे देख, मैं सब कुछ संग्रह करके रखता हूँ, इसलिए कितना चौड़ा हूँ।”
नदी बोली:
_“मुझे तो बहते हुए दूसरों के काम आने में आनंद आता है।”_ 🌸
फिर हुआ क्या?
बरसात के मौसम में मलेरिया फैला, मच्छरों की संख्या बढ़ी। नगरपालिका ने मिट्टी और कचरे से तालाब को भरवा दिया, ढँक दिया, बन्द कर दिया।
📌 संग्रह करने का फल मिल गया।
इसी प्रकार कुछ लोग कहते हैं:
“गधे की तरह सेवा करने से क्या लाभ?”
लेकिन नदी ने सिखाया कि वास्तव में वही अज्ञान है।
🔥 देखो, सत्संग में भी कुछ लोग दोष निकालते हैं।
*_“बड़े भाग मानुष तन पावा...”_*
इस मानव जीवन के *एक-एक क्षण* को सार्थक करो।
⏳ जो लोग यूँ ही समय बिताते रहते हैं, उनका जीवन भी यूँ ही निकल जाता है। फिर जैसी वासना, जैसे कर्म, वैसे ही शरीरों में भटकना पड़ता है।
पूर्वकाल में अच्छे राजा प्रजा से लिया हुआ धन अपने उपभोग में नहीं लगाते थे। राजा-रानी अपने लिए खेती तक करते थे। ऐसे उदाहरण भी हुए हैं।
हमारे ज्ञानी महापुरुषों ने तो सूर्य से भी आगे, अरबों मील दूर तक के रहस्यों का चिंतन और वर्णन किया है।
🙏 हमारा किसी से विरोध नहीं है। किसी दल से नहीं, किसी समाज से नहीं।
*“साँप से भी मेरा बैर नहीं है।”*
उनकी सभाओं में मुस्लिम भाई भी जाते हैं, बुर्का पहनने वाली बहनें भी सुनती हैं।
😊 इसी प्रसंग में अहमदाबाद के रेशमी बाजार का एक विनोदी प्रसंग सुनाया। रमज़ान के दिनों में एक कपड़ा व्यापारी सपने में भी कपड़ा बेच रहा था और उसी अवस्था में अपनी ही धोती के दो टुकड़े कर बैठा।
*लधुम गोल्हे सच्चो सतगुरु*
दुनिया खे मां बुधायिंदस
सुतल आहिन जे निंढड़ीअ में
उन्हन खे मां जगाइंदस
भले वने सिर
न कूड़ चवां तिर
न पाण किरां कुअ में
न बेखे चवां किर
सुतल आहिन जे निंढड़ीअ में
उन्हन खे मां जगाइंदस
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