जहाँ शराब-कबाब का सेवन, दुर्व्यसन, कलह होता है वहाँ की लक्ष्मी 'वित्त' बनकर सताती है, दुःख और चिंता उत्पन्न करती है { 'विताड़े ते वित्त' (गुजराती) - जो दुःख दे वह है 'वित्त' } । जहाँ लक्ष्मी का धर्मयुक्त उपयोग होता है वहाँ वह महालक्ष्मी होकर नारायण के सुख से सराबोर करती है ।
Thursday, 31 October 2024
Sunday, 6 October 2024
कौन था महिषासुर कैसे हुई उत्पत्ति और वध
कौन था महिषासुर कैसे हुई इसकी उत्तपत्ति और वध
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महिषासुर ब्रह्म ऋषि कश्यप और दनु का पौत्र (पोता) और असुरों के राजा रम्भ का पुत्र था महिषासुर के पिता रंभ, असुरों के राजा थे।
एक बार असुरों के राजा रंभ को एक अप्सरा महिषी से प्रेम हुआ, उसने उससे विवाह किया, महिषी को एक भैंस बनने का श्राप था। इसलिए जब रंभ और महिषी के संयोग पुत्र उत्पन्न हुआ तो उसका नाम महिषासुर पड़ा (महिष अर्थात भैंस, भैंसे जैसा असुर)।
महिषासुर को अपने माता पिता से कई शक्तियाँ प्राप्त हुई, उसके पास एक खास शक्ति थी जिससे वह कभी भी इंसान से भैंसा या भैंसे से इंसान बन सकता था (आप उसे इच्छा धारी भैंसा भी कह सकते हैं)।
महिषासुर बड़ा होकर अत्यंत शक्तिशाली असुर बना और असुरों का राजा भी बन गया। अब वह ना केवल पाताल लोक में, अपितु स्वर्ग लोक सहित तीनों लोक का राजा बनना चाहता था। लेकिन इंद्र देव का सामना करना उसके लिए उतना भी सरल नहीं था, देवता अत्यंत शक्तिशाली थें।
महिषासुर सृष्टिकर्ता ब्रम्हा का महान भक्त था। देवताओं से अधिक शक्तिशाली बनने के लिए महिषासुर ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया।
जब ब्रह्मा जी ने उसे वरदान मांगने के लिए कहा तो उसने अमृत्व (अमर होने) का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने उससे कहा कि यह वरदान देना संभव नहीं क्योंकि अमृत्व का वरदान बहुत विशेष परिस्थितियों में और विशेष विभूतियों को दिया जाता है।
जब ब्रह्मा जी ने महिषासुर को अन्य वरदान मांगने को कहा तो महिषासुर ने कहा - "प्रभु फिर मुझे ऐसा वरदान दीजिये कि कोई भी देव अथवा पुरुष मेरा वध ना कर सकें" इसने सोचा स्त्री तो वैसे भी मुझ पर विजय नही प्राप्त कर सकती और देव और पुरुष मुझे मार नही सकते तो में अमर हो ही गया समझो....
महिषासुर ने ब्रह्मा जी से कई और शक्तियाँ भी प्राप्त की और बहुत अधिक शक्तिशाली हो गया। ब्रह्मा जी भी तथास्तु कहकर वहाँ से चले गए।
बस अब क्या था, महिषासुर वरदान पाकर बहुत अहंकारी हो गया। अब उसने अपनी असुर सेना के साथ देव लोक अर्थात स्वर्ग की चढ़ाई कर दी। पूरी तैयारी के साथ महिषासुर ने स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया। स्वर्ग के राजा देवराज इन्द्र इस युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार न थें।
इन्द्र ने अपना वज्र चलाया लेकिन महिषासुर तब तक बहुत शक्तिशाली हो चुका था। नतीजा यह रहा कि असुरों की विशाल सेना ने देवताओं की सेना को हरा दिया और देवताओं को स्वर्ग खाली करके वहाँ से भागना पड़ा।
महिषासुर स्वर्ग का राजा बन गया, जिसने भी उसका विरोध किया, उसकी हत्या हुई। महिषासुर ने कई स्त्रियों पर भी अत्याचार किया। अब देवताओं के पास त्रिदेव से सहायता लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा था। ब्रह्मा जी तो अपने भक्त महिषासुर को नहीं मारते, अब देवता भगवान विष्णु की शरण में चले गए।
नारायण देवताओं को अपने साथ कैलाश ले गए क्योंकि भगवान शिव ही हैं जिनकी भक्ति देवता और असुर दोनों करते हैं। कहा जाता है विष्णु जी ने महिषासुर से युद्ध करके उसे हरा दिया था लेकिन ब्रह्म देव के वरदान का मान रखने के लिए उन्होंने महिषासुर को जीवित छोड़ दिया।
अब केवल महादेव ही थें जिन्हें अगर क्रोध आजाए तो वे ब्रह्मा जी के वरदान के बारे में न सोचते हुए महिषासुर का वध कर देतें। देवताओं को महादेव से उम्मीद थीं, लेकिन उन्होंने महिषासुर का वध करने से मना कर दिया। अब ब्रह्मा जी, विष्णु जी और शिव जी, तीनों महिषासुर का वध करने से मना कर चुके थें। देवता बहुत दुखी हुए, और कैलाश से पृथ्वी की और चले गए।
ऐसी कथा आती है देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करते देख भगवान विष्णु और भगवान शिव अत्यधिक क्रोध से भर गए। इसी समय ब्रह्मा, विष्णु और शिव के मुंह से क्रोध के कारण एक महान तेज प्रकट हुआ। अन्य देवताओं के शरीर से भी एक तेजोमय शक्ति मिलकर उस तेज से एकाकार हो गई। यह तेजोमय शक्ति एक पहाड़ के समान थी। उसकी ज्वालायें दसों-दिशाओं में व्याप्त होने लगीं। यह तेजपुंज सभी देवताओं के शरीर से प्रकट होने के कारण एक अलग ही स्वरूप लिए हुए था।
इन देवी की उत्पत्ति महिषासुर के अंत के लिए हुई थी, इसलिए इन्हें 'महिषासुर मर्दिनी' कहा गया। समस्त देवताओं के तेज पुंज से प्रकट हुई देवी को देखकर, पीड़ित देवताओं की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। भगवान शिव ने सर्वप्रथम अपना त्रिशूल देवी को दिया। भगवान विष्णु ने भी अपना चक्र देवी को प्रदान किया। इसी प्रकार, सभी देवी-देवताओं ने अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र देवी के हाथों में सजा दिये। इंद्र ने अपना वज्र और ऐरावत हाथी से उतारकर एक घंटा देवी को दिया। सूर्य ने अपने रोम कूपों और किरणों का तेज भरकर ढाल, तलवार और दिव्य सिंह यानि शेर को सवारी के लिए उस देवी को अर्पित कर दिया। विश्वकर्मा ने कई अभेद्य कवच और अस्त्र देकर महिषासुर मर्दिनी को सभी प्रकार के बड़े-छोटे अस्त्रों से शोभित किया।
एक अन्य कथा के अनुसार जो मुझे ज्यादा ठीक लगती है भगवान भोले नाथ शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती जी को इस बारे में बताया। महादेव के हाथों महिषासुर का वध ब्रह्मा जी के वरदान के विरुद्ध होता, ब्रह्मा जी का अपमान होता.. लेकिन महादेवी (पार्वती जी) के हाथों महिषासुर का वध तो वरदान का अपमान नहीं होता ना। वह तो स्त्रीरूप हैं अब गौरी माता ही इस संकट का समाधान निकाल सकती थीं। देवतओं की दशा देख माँ जगतजननी जगदम्बा भवानी इतने क्रोध में आगयी उनके शरीर से ज्वाला मुखी जैसा तेज निकलने लगा और देखते देखते वह अष्टभुजा वाली (माँ दुर्गा) बन सिंह पर सवार हो गयी।
आदि शक्ति (माँ दुर्गा) को सभी देवताओं ने अपने शस्त्र दिए, स्वयं महादेव ने उन्हें त्रिशूल दिया, महादेव द्वारा महिषासुर का वध नियम विरुद्ध होता, लेकिन ऐसा तो बिल्कुल नहीं था कि महादेव के त्रिशूल द्वारा महिषासुर का वध नियम विरुद्ध हो। अब पार्वती जी ने कैलाश से प्रस्थान किया।
अचानक असुर वहाँ आ गए, उन्होंने महिषासुर को पार्वती जी (माँ दुर्गा) के बारे में बताया।
थोड़ी देर बाद महिषासुर ने देखा कि एक विशालकाय रूपवान स्त्री अनेक भुजाओं वालीं और अस्त्र शस्त्र से सज्जित होकर शेर पर बैठकर अट्टहास कर रही हैं।
महिषासुर वहाँ आया और जैसे ही उसने माता पार्वती (माँ दुर्गा) को निकट से देखा तो उनकी सुंदरता को देख वह कामवासना से भर गया।
उसने पार्वती जी (माँ दुर्गा) से कहा- हे सुंदर स्त्री! तुम्हे देखने के पश्चात मैंने तुमसे विवाह करने का मन बना लिया है, मैं असुरों का राजा महिषासुर तुम्हें अपने साथ ले जाऊँगा और तुम असुरों की रानी बन जाओगी। तुम्हारे जितनी सुंदर स्त्री मैंने आज से पहले कभी नहीं देखी, महादेव को छोड़कर तुम मेरी पत्नी क्यों नहीं बन जाती? इस असभ्य असुर की बात सुनकर पार्वती जी (माँ दुर्गा) अत्यंत क्रोधित हो गई। माता रानी ने कहा- हे अहंकारी असुर! कामवासना से तेरी मति मारी गई है, तुमने स्त्रियों पर भी अत्याचार किया, देवताओं से स्वर्ग लोक छीन लिया और तुम्हारे अहंकार बढता ही चला गया। अब तुम्हारा अंत निकट है। माता की बात सुनकर महिषासुर हँसा और बोला कि मुझे वरदान प्राप्त है कोई पुरुष मेरा वध नहीं कर सकता, एक स्त्री में इतना बल नहीं की मेरा वध कर सके। मैं अमर हूँ। यह कहकर महिषासुर माता पार्वती (माँ दुर्गा) के पास आ गया। माता रानी ने प्रचंड दुर्गा रूप धारण कर लिया और महिषासुर की सेना पर आक्रमण कर दिया।
महिषासुर की सेना का सेनापति आगे बढ़कर देवी के साथ युद्ध करने लगा। उदग्र नामक महादैत्य भी 60 हजार राक्षसों को लेकर इस युद्ध में कूद पड़ा। महानु नामक दैत्य एक करोड़ सैनिकों के साथ, अशीलोमा दैत्य पांच करोड़ और वास्कल नामक राक्षस 60 लाख सैनिकों के साथ युद्ध में कूद पड़े। सारे देवता इस महायुद्ध को बड़े कौतूहल से देख रहे थे। दानवों के सभी अचूक अस्त्र-शस्त्र देवी के सामने बौने साबित हो रहे थे, लेकिन देवी भगवती अपने शस्त्रों से राक्षसों की सेना को बींधने बनाने लगीं।
नौ दिन तक माता पार्वती जो दुर्गा बन चुकी थीं, उन्होंने असुर सेना का विनाश किया और 10वें दिन महिषासुर से युद्ध किया और जब महिषासुर हार के डर से भैंसा बनकर माता को छलने की कोशिश करने लगा तो माता रानी के शेर ने उस पर प्रहार किया। आखिरकार दुर्गा माता ने अपने त्रिशूल से महिषासुर का वध कर दिया।
इस युद्ध में महिषासुर का वध तो हो ही गया, साथ में अनेक अन्य दैत्य भी मारे गए। इन सभी ने तीनों लोकों में आतंक फैला रखा था। सभी देवी-देवताओं ने प्रसन्न होकर आकाश से फूलों की वर्षा की।
इसी दिन को हम विजय दशमी के रूप में मनाते हैं। यह बुराई पर अच्छाई की जीत थी। इसी दिन भगवान श्री राम ने रावण का भी वध किया था।
ॐसत्य जय माता दी
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Monday, 5 August 2024
हनुमान और शनि देव युद्ध
🙏🏻🙏🏻जय श्री सीताराम जी 🙏🏻🙏🏻
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🩸भक्तवर हनुमान और शनि 🩸
शनि ने दुष्टग्रहनिहन्ता महावीर का हाथ पकड़ लिया और उन्हें युद्ध के लिए ललकारने लगे। हनुमान ने झटककर अपना हाथ छुड़ा लिया। युद्ध लोलुप शनि पुनः भक्तवर हनुमान का हाथ पकड़ कर उन्हें युद्ध के लिए खींचने लगे।
'आप नहीं मानेंगे।' धीरे से कहते हुए पिशाच ग्रह घातक कपिवर ने अपनी पूंछ बढ़ा कर शनि को उसमें लपेटना प्रारम्भ किया। कुछ ही क्षण में अविनीत सूर्य पुत्र क्रोधसंरक्तलोचन समीरात्मज की सुदृढ़ पुच्छ में आकण्ठ आबद्ध हो गये। उनका अहंकार, उनकी शक्ति एवं उनका पराक्रम व्यर्थ सिद्ध हुआ। वे सर्वथा अवश, असहाय और निरुपाय होकर दृढ़तम बन्धन की पीड़ा से छटपटा रहे थे।
"अब राम-सेतु की परिक्रमा का समय हो गया।" अञ्जनानन्दन उठे और दौड़ते हुए सेतु की प्रदक्षिणा करने लगे। शनिदेव की सम्पूर्ण शक्ति से भी उनका बन्धन शिथिल न हो सका। भक्तराज हनुमान के दौड़ने से उनकी विशाल पूंछ वानर-भालुओं द्वारा रखे गए शिलाखण्डों पर गिरती जा रही थी। वीरवर हनुमान दौड़ते हुए जान-बूझकर भी अपनी पूंछ शिलाखण्डों पर पटक देते थे।
शनि की बड़ी अद्भुत एवं दयनीय दशा थी। शिलाखण्डों पर पटके जाने से उनका शरीर रक्त से लथपथ हो गया। उनकी पीड़ा की सीमा नहीं थी और उग्रवेग हनुमान की परिक्रमा में कहीं विराम नहीं दीख रहा था।
तब शनि अत्यन्त कातर स्वर में प्रार्थना करने लगे -- 'करुणामय भक्तराज! मुझ पर कृपा कीजिए। अपनी उद्दण्डता का दण्ड मैं पा गया। आप मुझे मुक्त कीजिए। मेरा प्राण छोड़ दीजिए।'
दयामूर्ति हनुमान खड़े हुए। शनि का अङ्ग-प्रत्यङ्ग लहूलुहान हो गया था। असह पीड़ा हो रही थी उनके रग-रग में। विनीतात्मा समीरात्मज ने कहा -- 'यदि तुम मेरे भक्त की राशि पर कभी न जाने का वचन दो तो मैं तुम्हें मुक्त कर सकता हूं और यदि तुमने ऐसा किया तो मैं तुम्हें कठोरतम दण्ड प्रदान करूँगा।'
'सुरवन्दित वीरवर! निश्चय ही मैं आपके भक्त की राशि पर कभी भी नहीं जाऊँगा।' पीड़ा से छटपटाते हुए शनि ने आतुरता से प्रार्थना की --- ' आप कृपापूर्वक मुझे शीघ्र बन्धन मुक्त कर दीजिए।'
शरणागतवत्सल भक्तप्रवर हनुमान ने शनि को छोड़ दिया। शनि ने अपना शरीर सहलाते हुए गर्वापहारी मारुतात्मज के चरणों में सादर प्रणाम किया और वे चोट की असह्य पीड़ा से व्याकुल हो कर अपनी देह पर लगाने के लिए तेल माँगने लगे।
उन्हें जो तेल प्रदान करता, उसे वे संतुष्ट होकर आशिष देते। कहते हैं, इसी कारण अब भी शनिदेव को तेल चढ़ाया जाता है।
Thursday, 18 January 2024
बच्चो का पोषण
जन्म से लेकर 5 वर्ष की आयु तक : इस उम्र में बच्चों के स्वस्थ शरीर तथा मजबूत हड्डियों के लिए विटामिन ʹडीʹ जो कैल्शियम ग्रहण करने में मदद करता है व लौह तत्त्व अत्यावश्यक होता है । विटामिन ʹडीʹ की पूर्ति में दूध, घी, मक्खन, गेहूँ, मक्का जैसे पोषक पदार्थ तथा प्रातःकालीन सूर्य की किरणें दोनों अत्यंत मददरूप होते हैं । किसी एक की भी कमी होने से बच्चों की हड्डियाँ कमजोर व पतली रह जाती हैं, वे सूखा रोग से ग्रस्त हो जाते हैं । लौह तत्त्व की कमी से बुद्धि का स्तर भी कम रहता है, अतः स्तनपान छुड़ाने के बाद बच्चों के आहार में लौह व विटामिन ʹडीʹ युक्त पदार्थ जरूर शामिल करने चाहिए ।*
Tuesday, 8 August 2023
भगवान की कृपा को समझिए
*प्रेरक कहानी: भगवान की कृपा को समझिए*
एक व्यक्ति काफी दिनों से चिंतित चल रहा था जिसके कारण वह काफी तथा तनाव में रहने लगा था। वह इस बात से परेशान था कि घर के सारे खर्चे उसे ही उठाने पड़ते हैं, पूरे परिवार की जिम्मेदारी उसी के ऊपर है, किसी ना किसी रिश्तेदार का उसके यहाँ आना जाना लगा ही रहता है...
इन्ही बातों को सोच सोच कर वह काफी परेशान रहता था तथा बच्चों को अक्सर डांट देता था तथा अपनी पत्नी से भी ज्यादातर उसका किसी न किसी बात पर झगड़ा चलता रहता था...
एक दिन उसका बेटा उसके पास आया और बोला पिताजी मेरा स्कूल का होमवर्क करा दीजिये, वह व्यक्ति पहले से ही तनाव में था तो उसने बेटे को डांट कर भगा दिया लेकिन जब थोड़ी देर बाद उसका गुस्सा शांत हुआ तो वह बेटे के पास गया तो देखा कि बेटा रो कर सो गया है ,और उसके हाथ में उसके होमवर्क की कॉपी है। उसने कॉपी लेकर देखी, और जैसे ही उसने कॉपी नीचे रखनी चाही, उसकी नजर होमवर्क के टाइटल पर पड़ी...
होमवर्क का टाइटल था...
वे चीजें जो हमें शुरू में अच्छी नहीं लगतीं लेकिन बाद में वे अच्छी ही होती हैं...
इस टाइटल पर बच्चे को एक पैराग्राफ लिखना था जो उसने लिख लिया था। उत्सुकतावश उसने बच्चे का लिखा पढना शुरू किया, बच्चे ने लिखा था...
मैं अपने फाइनल एग्जाम को बहुंत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये बिलकुल अच्छे नहीं लगते लेकिन इनके बाद स्कूल की छुट्टियाँ पड़ जाती हैं...
मैं ख़राब स्वाद वाली कड़वी दवाइयों को बहुत धन्यवाद् देता हूँ क्योंकि शुरू में तो ये कड़वी लगती हैं लेकिन ये मुझे बीमारी से ठीक करती हैं...
मैं सुबह - सुबह जगाने वाली उस अलार्म घड़ी को बहुत धन्यवाद् देता हूँ जो मुझे हर सुबह बताती है कि मैं जीवित हूँ...
मैं ईश्वर को भी बहुत धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझे इतने अच्छे पिता दिए क्योंकि उनकी डांट मुझे शुरू में तो बहुत बुरी लगती है लेकिन वो मेरे लिए खिलौने लाते हैं, मुझे घुमाने ले जाते हैं और मुझे अच्छी अच्छी चीजें खिलाते हैं और मुझे इस बात की ख़ुशी है कि मेरे पास पिता हैं क्योंकि मेरे दोस्त सोहन के तो पिता ही नहीं हैं...
बच्चे का होमवर्क पढने के बाद वह व्यक्ति जैसे अचानक नींद से जाग गया हो। उसकी सोच बदल सी गयी। बच्चे की लिखी बातें उसके दिमाग में बार बार घूम रही थी। खासकर वह लास्ट वाली लाइन। उसकी नींद उड़ गयी थी। फिर वह व्यक्ति थोडा शांत होकर बैठा और उसने अपनी परेशानियों के बारे में सोचना शुरू किया...
मुझे घर के सारे खर्चे उठाने पड़ते हैं इसका मतलब है कि मेरे पास घर है और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से बेहतर स्थिति में हूँ जिनके पास घर नहीं है...
मुझे पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है इसका मतलब है कि मेरा परिवार है, बीवी बच्चे हैं और ईश्वर की कृपा से मैं उन लोगों से ज्यादा खुशनसीब हूँ जिनके पास परिवार नहीं हैं और वो दुनियाँ में बिल्कुल अकेले हैं...
मेरे यहाँ कोई ना कोई मित्र या रिश्तेदार आता जाता रहता है, इसका मतलब है कि मेरी एक सामाजिक हैसियत है और मेरे पास मेरे सुख दुःख में साथ देने वाले लोग हैं...
हे ! मेरे भगवान् ! तेरा बहुंत बहुंत शुक्रिया... मुझे माफ़ करना, मैं तेरी कृपा को पहचान नहीं पाया...
इसके बाद उसकी सोच एकदम से बदल गयी, उसकी सारी परेशानी, सारी चिंता एक दम से जैसे ख़त्म हो गयी। वह एकदम से बदल सा गया। वो अपने बेटे से लिपट गया आंखो से आंसू बह रहे थे और मन ही मन अपने छोटे से बेटे से बो माफी मांग रहा था ,बेटे के माथे को चूमकर वो अपने बेटे को तथा ईश्वर को धन्यवाद देने लगा...
हमारे सामने जो भी परेशानियाँ हैं, हम जब तक उनको नकारात्मक नज़रिये से देखते रहेंगे तब तक हम परेशानियों से घिरे रहेंगे लेकिन जैसे ही हम उन्हीं चीजों को, उन्ही परिस्तिथियों को सकारात्मक नज़रिये से देखेंगे, हमारी सोच एकदम से बदल जाएगी, हमारी सारी चिंताएं, सारी परेशानियाँ, सारे तनाव एक दम से ख़त्म हो जायेंगे और हमें मुश्किलों से निकलने के नए नए रास्ते दिखाई देने लगेंगे।
*प्रेरक जानकारी: शिव की माला में गुंथे 108 मुण्ड किसके?* 🔱🚩
🌷 भगवान शिव और सती का अद्भुत प्रेम शास्त्रों में वर्णित है। इसका प्रमाण है सती के यज्ञ कुण्ड में कूदकर आत्मदाह करना और सती के शव को उठाए क्रोधित शिव का तांडव करना। हालांकि यह भी शिव की लीला थी क्योंकि इस बहाने शिव 51 शक्ति पीठों की स्थापना करना चाहते थे।
🔱 शिव ने सती को पहले ही बता दिया था कि उन्हें यह शरीर त्याग करना है। इसी समय उन्होंने सती को अपने गले में मौजूद मुंडों की माला का रहस्य भी बताया था।
💀 *मुण्ड माला का रहस्य*💀
एक बार नारद जी के उकसाने पर सती भगवान शिव से जिद करने लगी कि आपके गले में जो मुंड की माला है उसका रहस्य क्या है। जब काफी समझाने पर भी सती न मानी तो भगवान शिव ने राज खोल ही दिया। शिव ने पार्वती से कहा कि इस मुंड की माला में जितने भी मुंड यानी सिर हैं वह सभी आपके हैं। सती इस बात का सुनकर हैरान रह गयी।
सती ने भगवान शिव से पूछा, यह भला कैसे संभव है कि सभी मुंड मेरे हैं। इस पर शिव बोले यह आपका 108 वां जन्म है। इससे पहले आप 107 बार जन्म लेकर शरीर त्याग चुकी हैं और ये सभी मुंड उन पूर्व जन्मों की निशानी है। इस माला में अभी एक मुंड की कमी है इसके बाद यह माला पूर्ण हो जाएगी। शिव की इस बात को सुनकर सती ने शिव से कहा मैं बार-बार जन्म लेकर शरीर त्याग करती हूं लेकिन आप शरीर त्याग क्यों नहीं करते।
🔱 शिव हंसते हुए बोले 'मैं अमर कथा जानता हूं इसलिए मुझे शरीर का त्याग नहीं करना पड़ता।' इस पर सती ने भी अमर कथा जानने की इच्छा प्रकट की। शिव जब सती को कथा सुनाने लगे तो उन्हें नींद आ गयी और वह कथा सुन नहीं पायी। इसलिए उन्हें दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर अपने शरीर का त्याग करना पड़ा।
शिव ने सती के मुंड को भी माला में गूंथ लिया। इस प्रकार 108 मुंड की माला तैयार हो गयी। सती ने अगला जन्म पार्वती के रूप में हुआ। इस जन्म में पार्वती को अमरत्व प्राप्त होगा और फिर उन्हें शरीर त्याग नहीं करना पड़ा..!!
*🙏🏿🙏🏽🙏ॐ नमः शिवाय*🙏🏾🙏🏻🙏🏼
पौराणिक काल के चौबीस चर्चित श्राप
*🪷।। पौराणिक काल के चौबीस चर्चित श्राप ।।🪷*
हिन्दू पौराणिक ग्रंथो में अनेको अनेक श्रापों का वर्णन मिलता है। हर श्राप के पीछे कोई न कोई कथाये जरूर मिलती है। प्रस्तुत है हिन्दू धर्म ग्रंथो में उल्लेखित चौबीस ऐसे ही प्रसिद्ध श्राप और उनके पीछे की कहानी-
*१. युधिष्ठिर का स्त्री जाति को श्राप-*
महाभारत के शांति पर्व के अनुसार युद्ध समाप्त होने के बाद जब कुंती ने युधिष्ठिर को बताया कि कर्ण तुम्हारा बड़ा भाई था तो पांडवों को बहुत दुख हुआ। तब युधिष्ठिर ने विधि-विधान पूर्वक कर्ण का भी अंतिम संस्कार किया। माता कुंती ने जब पांडवों को कर्ण के जन्म का रहस्य बताया तो शोक में आकर युधिष्ठिर ने संपूर्ण स्त्री जाति को श्राप दिया कि- आज से कोई भी स्त्री गुप्त बात छिपा कर नहीं रख सकेगी।
*२. ऋषि किंदम का राजा पांडु को श्राप-*
महाभारत के अनुसार एक बार राजा पांडु शिकार खेलने वन में गए। उन्होंने वहां हिरण के जोड़े को मैथुन करते देखा और उन पर बाण चला दिया। वास्तव में वो हिरण व हिरणी ऋषि किंदम व उनकी पत्नी थी। तब ऋषि किंदम ने राजा पांडु को श्राप दिया कि जब भी आप किसी स्त्री से मिलन करेंगे। उसी समय आपकी मृत्यु हो जाएगी। इसी श्राप के चलते जब राजा पांडु अपनी पत्नी माद्री के साथ मिलन कर रहे थे, उसी समय उनकी मृत्यु हो गई।
*३. माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप-*
महाभारत के अनुसार माण्डव्य नाम के एक ऋषि थे। राजा ने भूलवश उन्हें चोरी का दोषी मानकर सूली पर चढ़ाने की सजा दी। सूली पर कुछ दिनों तक चढ़े रहने के बाद भी जब उनके प्राण नहीं निकले, तो राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने ऋषि माण्डव्य से क्षमा मांगकर उन्हें छोड़ दिया।
तब ऋषि यमराज के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि मैंने अपने जीवन में ऐसा कौन सा अपराध किया था कि मुझे इस प्रकार झूठे आरोप की सजा मिली। तब यमराज ने बताया कि जब आप १२ वर्ष के थे, तब आपने एक पतिंगे की पूंछ में सींक चुभाई थी, उसी के फलस्वरूप आपको यह कष्ट सहना पड़ा।
तब ऋषि माण्डव्य ने यमराज से कहा कि १२ वर्ष की उम्र में किसी को भी धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं होता। तुमने छोटे अपराध का बड़ा दण्ड दिया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें शुद्र योनि में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। ऋषि माण्डव्य के इसी श्राप के कारण यमराज ने महात्मा विदुर के रूप में जन्म लिया।
*४. नंदी का रावण को श्राप-*
वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।
*५. कद्रू का अपने पुत्रों को श्राप-*
महाभारत के अनुसार ऋषि कश्यप की कद्रू व विनता नाम की दो पत्नियां थीं। कद्रू सर्पों की माता थी व विनता गरुड़ की। एक बार कद्रू व विनता ने एक सफेद रंग का घोड़ा देखा और शर्त लगाई। विनता ने कहा कि ये घोड़ा पूरी तरह सफेद है और कद्रू ने कहा कि घोड़ा तो सफेद हैं, लेकिन इसकी पूंछ काली है।
कद्रू ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए अपने सर्प पुत्रों से कहा कि तुम सभी सूक्ष्म रूप में जाकर घोड़े की पूंछ से चिपक जाओ, जिससे उसकी पूंछ काली दिखाई दे और मैं शर्त जीत जाऊं। कुछ सर्पों ने कद्रू की बात नहीं मानी। तब कद्रू ने अपने उन पुत्रों को श्राप दिया कि तुम सभी जनमजेय के सर्प यज्ञ में भस्म हो जाओगे।
*६. उर्वशी का अर्जुन को श्राप-*
महाभारत के युद्ध से पहले जब अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने स्वर्ग गए, तो वहां उर्वशी नाम की अप्सरा उन पर मोहित हो गई। यह देख अर्जुन ने उन्हें अपनी माता के समान बताया। यह सुनकर क्रोधित उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया कि तुम नपुंसक की भांति बात कर रहे हो। इसलिए तुम नपुंसक हो जाओगे, तुम्हें स्त्रियों में नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। यह बात जब अर्जुन ने देवराज इंद्र को बताई तो उन्होंने कहा कि अज्ञातवास के दौरान यह श्राप तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें कोई पहचान नहीं पाएगा।
*७. तुलसी का भगवान विष्णु को श्राप-*
शिवपुराण के अनुसार शंखचूड़ नाम का एक राक्षस था। उसकी पत्नी का नाम तुलसी था। तुलसी पतिव्रता थी, जिसके कारण देवता भी शंखचूड़ का वध करने में असमर्थ थे। देवताओं के उद्धार के लिए भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप लेकर तुलसी का शील भंग कर दिया। तब भगवान शंकर ने शंखचूड़ का वध कर दिया। यह बात जब तुलसी को पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर हो जाने का श्राप दिया। इसी श्राप के कारण भगवान विष्णु की पूजा शालीग्राम शिला के रूप में की जाती है।
*८. श्रृंगी ऋषि का परीक्षित को श्राप-*
पाण्डवों के स्वर्गारोहण के बाद अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने शासन किया। उसके राज्य में सभी सुखी और संपन्न थे। एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलते-खेलते बहुत दूर निकल गए। तब उन्हें वहां शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए, जो मौन अवस्था में थे। राजा परीक्षित ने उनसे बात करनी चाहिए, लेकिन ध्यान में होने के कारण ऋषि ने कोई जबाव नहीं दिया।
ये देखकर परीक्षित बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने एक मरा हुआ सांप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। यह बात जब शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी को पता चली तो उन्होंने श्राप दिया कि आज से सात दिन बात तक्षक नाग राजा परीक्षित को डंस लेगा, जिससे उनकी मृत्यु हो जाएगी।
*९. राजा अनरण्य का रावण को श्राप-*
वाल्मीकि रामायण के अनुसार रघुवंश में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका नाम अनरण्य था। जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुई। उस युद्ध में राजा अनरण्य की मृत्यु हो गई। मरने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न एक युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा। इन्हीं के वंश में आगे जाकर भगवान श्रीराम ने जन्म लिया और रावण का वध किया।
*१०. परशुराम का कर्ण को श्राप-*
महाभारत के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के ही अंशावतार थे। सूर्यपुत्र कर्ण उन्हीं का शिष्य था। कर्ण ने परशुराम को अपना परिचय एक ब्राह्मण के रूप में दिया था। एक बार जब परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे, उसी समय कर्ण को एक भयंकर कीड़े ने काट लिया। गुरु की नींद में विघ्न न आए, ये सोचकर कर्ण दर्द सहते रहे, लेकिन उन्होंने परशुराम को नींद से नहीं उठाया।
नींद से उठने पर जब परशुराम ने ये देखा तो वे समझ गए कि कर्ण ब्राह्मण नहीं बल्कि क्षत्रिय है। तब क्रोधित होकर परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि मेरी सिखाई हुई शस्त्र विद्या की जब तुम्हें सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तुम वह विद्या भूल जाओगे।
*११. तपस्विनी का रावण को श्राप-*
वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था। तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, जो भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी।
*१२. गांधारी का श्रीकृष्ण को श्राप-*
महाभारत के युद्ध के बाद जब भगवान श्रीकृष्ण गांधारी को सांत्वना देने पहुंचे तो अपने पुत्रों का विनाश देखकर गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दिया कि जिस प्रकार पांडव और कौरव आपसी फूट के कारण नष्ट हुए हैं, उसी प्रकार तुम भी अपने बंधु-बांधवों का वध करोगे। आज से छत्तीसवें वर्ष तुम अपने बंधु-बांधवों व पुत्रों का नाश हो जाने पर एक साधारण कारण से अनाथ की तरह मारे जाओगे। गांधारी के श्राप के कारण ही भगवान श्रीकृष्ण के परिवार का अंत हुआ।
*१३. महर्षि वशिष्ठ का वसुओं को श्राप-*
महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह पूर्व जन्म में अष्ट वसुओं में से एक थे। एक बार इन अष्ट वसुओं ने ऋषि वशिष्ठ की गाय का बलपूर्वक अपहरण कर लिया। जब ऋषि को इस बात का पता चला तो उन्होंने अष्ट वसुओं को श्राप दिया कि तुम आठों वसुओं को मृत्यु लोक में मानव रूप में जन्म लेना होगा और आठवें वसु को राज, स्त्री आदि सुखों की प्राप्ति नहीं होगी। यही आठवें वसु भीष्म पितामह थे।
*१४. शूर्पणखा का रावण को श्राप-*
वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था। वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।
*१५. ऋषियों का साम्ब को श्राप-*
महाभारत के मौसल पर्व के अनुसार एक बार महर्षि विश्वामित्र, कण्व आदि ऋषि द्वारका गए। तब उन ऋषियों का परिहास करने के उद्देश्य से सारण आदि वीर कृष्ण पुत्र साम्ब को स्त्री वेष में उनके पास ले गए और पूछा कि इस स्त्री के गर्भ से क्या उत्पन्न होगा। क्रोधित होकर ऋषियों ने श्राप दिया कि श्रीकृष्ण का ये पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए लोहे का एक भयंकर मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा समस्त यादव कुल का नाश हो जाएगा।
*१६. दक्ष का चंद्रमा को श्राप-*
शिवपुराण के अनुसार प्रजापति दक्ष ने अपनी २७ पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से करवाया था। उन सभी पत्नियों में रोहिणी नाम की पत्नी चंद्रमा को सबसे अधिक प्रिय थी। यह बात अन्य पत्नियों को अच्छी नहीं लगती थी। ये बात उन्होंने अपने पिता दक्ष को बताई तो वे बहुत क्रोधित हुए और चंद्रमा को सभी के प्रति समान भाव रखने को कहा, लेकिन चंद्रमा नहीं माने। तब क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दिया।
*१७. माया का रावण को श्राप-*
रावण ने अपनी पत्नी की बड़ी बहन माया के साथ भी छल किया था। माया के पति वैजयंतपुर के शंभर राजा थे। एक दिन रावण शंभर के यहां गया। वहां रावण ने माया को अपनी बातों में फंसा लिया। इस बात का पता लगते ही शंभर ने रावण को बंदी बना लिया। उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर दिया।
इस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया सती होने लगी तो रावण ने उसे अपने साथ चलने को कहा। तब माया ने कहा कि तुमने वासना युक्त होकर मेरा सतित्व भंग करने का प्रयास किया। इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो गई, अत: तुम्हारी मृत्यु भी इसी कारण होगी।
*१८. शुक्राचार्य का राजा ययाति को श्राप-*
महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार राजा ययाति का विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ हुआ था। देवयानी की शर्मिष्ठा नाम की एक दासी थी। एक बार जब ययाति और देवयानी बगीचे में घूम रहे थे, तब उसे पता चला कि शर्मिष्ठा के पुत्रों के पिता भी राजा ययाति ही हैं, तो वह क्रोधित होकर अपने पिता शुक्राचार्य के पास चली गई और उन्हें पूरी बात बता दी। तब दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने ययाति को बूढ़े होने का श्राप दे दिया था।
*१९. ब्राह्मण दंपत्ति का राजा दशरथ को श्राप-*
वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार जब राजा दशरथ शिकार करने वन में गए तो गलती से उन्होंने एक ब्राह्मण पुत्र का वध कर दिया। उस ब्राह्मण पुत्र के माता-पिता अंधे थे। जब उन्हें अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार मिला तो उन्होंने राजा दशरथ को श्राप दिया कि जिस प्रकार हम पुत्र वियोग में अपने प्राणों का त्याग कर रहे हैं, उसी प्रकार तुम्हारी मृत्यु भी पुत्र वियोग के कारण ही होगी।
*२०. नंदी का ब्राह्मण कुल को श्राप-*
शिवपुराण के अनुसार एक बार जब सभी ऋषिगण, देवता, प्रजापति, महात्मा आदि प्रयाग में एकत्रित हुए तब वहां दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर का तिरस्कार किया। यह देखकर बहुत से ऋषियों ने भी दक्ष का साथ दिया। तब नंदी ने श्राप दिया कि दुष्ट ब्राह्मण स्वर्ग को ही सबसे श्रेष्ठ मानेंगे तथा क्रोध, मोह, लोभ से युक्त हो निर्लज्ज ब्राह्मण बने रहेंगे। शूद्रों का यज्ञ करवाने वाले व दरिद्र होंगे।
*२१. नलकुबेर का रावण को श्राप-*
वाल्मीकि रामायण के अनुसार विश्व विजय करने के लिए जब रावण स्वर्ग लोक पहुंचा तो उसे वहां रंभा नाम की अप्सरा दिखाई दी। अपनी वासना पूरी करने के लिए रावण ने उसे पकड़ लिया। तब उस अप्सरा ने कहा कि आप मुझे इस तरह से स्पर्श न करें, मैं आपके बड़े भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर के लिए आरक्षित हूं। इसलिए मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूं। लेकिन रावण ने उसकी बात नहीं मानी और रंभा से दुराचार किया। यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को श्राप दिया कि आज के बाद रावण बिना किसी स्त्री की इच्छा के उसको स्पर्श करेगा तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में बंट जाएगा।
*२२. श्रीकृष्ण का अश्वत्थामा को श्राप-*
महाभारत युद्ध के अंत समय में जब अश्वत्थामा ने धोखे से पाण्डव पुत्रों का वध कर दिया, तब पाण्डव भगवान श्रीकृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा करते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम तक पहुंच गए। तब अश्वत्थामा ने पाण्डवों पर ब्रह्मास्त्र का वार किया। ये देख अर्जुन ने भी अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा।
महर्षि व्यास ने दोनों अस्त्रों को टकराने से रोक लिया और अश्वत्थामा और अर्जुन से अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस लेने को कहा। तब अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा ने अपने अस्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी।
यह देख भगवान श्रीकृष्ण ने परीक्षित की रक्षा कर दंड स्वरुप अश्वत्थामा के माथे पर लगी मणि निकालकर उन्हें तेजहीन कर दिया और युगों-युगों तक भटकते रहने का शाप दिया था।
*२३. तुलसी का श्रीगणेश को श्राप-*
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार तुलसीदेवी गंगा तट से गुजर रही थीं, उस समय वहां श्रीगणेश तप कर रहे थे। श्रीगणेश को देखकर तुलसी का मन उनकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी ने श्रीगणेश से कहा कि आप मेरे स्वामी हो जाइए, लेकिन श्रीगणेश ने तुलसी से विवाह करने से इंकार कर दिया। क्रोधवश तुलसी ने श्रीगणेश को विवाह करने का श्राप दे दिया और श्रीगणेश ने तुलसी को वृक्ष बनने का।
*२४. नारद का भगवान विष्णु को श्राप-*
शिवपुराण के अनुसार एक बार देवऋषि नारद एक युवती पर मोहित हो गए। उस कन्या के स्वयंवर में वे भगवान विष्णु के रूप में पहुंचे, लेकिन भगवान की माया से उनका मुंह वानर के समान हो गया। भगवान विष्णु भी स्वयंवर में पहुंचे। उन्हें देखकर उस युवती ने भगवान का वरण कर लिया। यह देखकर नारद मुनि बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि जिस प्रकार तुमने मुझे स्त्री के लिए व्याकुल किया है। उसी प्रकार तुम भी स्त्री विरह का दु:ख भोगोगे। भगवान विष्णु ने राम अवतार में नारद मुनि के इस श्राप को पूरा किया।
*🙏।। आचार्य डॉ0 विजय शंकर मिश्र: द्वारा अग्रेषित पोस्ट ।।🙏*
तुलसी
यह लेख चार (Four) भागों में लिखा गया है। चारों लेख अवश्य पढ़ें।
*तुलसी एक गुण अनेक*
तुलसी के बारे में घर-घर में सभी जानते हैं। हिंदू धर्म में तुलसी को विशेष महत्व दिया गया हैैं। कहा जाता हैं कि जहां तुसली फलती हैं, उस घर में रहने वालों को कोई संकट नहीं आते। स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद में तुलसी के अनेक गुण के बारे में बताया गया हैं। यह बात कम लोग जानते हैं कि तुलसी परिवार में आने वाले संकट के बारे में सुखकर पहले संकेत दे देती हैं। पेटलावद के ज्योतिषी आनंद त्रिवेदी बता रहे हैं कि तुलसी एक, लेकिन गुण अनेक किय तरह से हैं।
प्रकृति की अपनी एक अलग खासियत है। इसने अपनी हर एक रचना को बड़ी ही खूबी और विशिष्ट नेमत बख्शी है। इंसान तो वैसे भी प्रकृति की उम्दा रचनाओं में से एक है जो समझदारी और सूझबूझ से काम लेता है। इसके अलावा जानवरों की खूबी ये है कि वे आने वाले खतरे, मसलन भूकंपए सुनामी, पारलौकिक ताकतों आदि को पहले ही भांप सकने में सक्षम होते हैं, लेकिन बहुत ही कम लोग यह बात जानते हैं कि पौधों के भीतर भी ऐसी ही अलग विशेषता है, जिसे अगर समझ लिया जाए तो घर के सदस्यों पर आने वाले कष्टों को पहले ही टाला जा सकता है।
*क्यों मुरझाता है तुलसी का पौधा*
शायद कभी किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि चाहे तुलसी के पौधे पर कितना ही पानी क्यों ना डाला जाए उसकी कितनी ही देखभाल क्यों ना की जाएए वह अचानक मुरझाने या सूखने क्यों लगता है।
*क्या बताना चाहता है*
आपको यकीन नहीं होगा लेकिन तुलसी का मुरझाया हुआ पौधा आपको यह बताने की कोशिश कर रहा होता है कि जल्द ही परिवार पर किसी विपत्ति का साया मंडरा सकता है। कहने का अर्थ यह है कि अगर परिवार के किसी भी सदस्य पर कोई मुश्किल आने वाली है तो उसकी सबसे पहली नजर घर में मौजूद तुलसी के पौधे पर पड़ती है।