Monday, 27 October 2025

હાસ્ય

😂😂😂😂😂😂😂


એક આદરણીય

સ્કૂલમાસ્ટર હમણાં જ નિવૃત્ત થયા હતા. 🎓

તે અને તેમની પત્ની

રાજકોટમાં એક ફ્લેટમાં રહેતા હતા. 🏠😉


દશેરા માટે, 

તેઓએ તેમના વતન જવાનું નક્કી કર્યું. 

💥🔥🔥🔥


જતા પહેલા,

માસ્ટરે મનમાં વિચાર્યું -

"આપણે બહાર હોઈએ ત્યારે,

જો કોઈ ચોર ઘરમાં ઘૂસી જાય તો શું?

તે ખુલ્લા કબાટ તોડી શકે છે અને બધે 

ગડબડ કરી શકે છે, ભલે ઘરમાં

પૈસા ન હોય!" 😅


તેથી, પોતાના ઘરને

તબાહીથી બચાવવા માટે,

તેણે ટેબલ પર ₹1000 મૂક્યા 💸

એક નોટ સાથે. 📝


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"પ્રિય અજાણ્યો ચોર,


મારા ઘરમાં ઘૂસવા માટે

તમે જે પ્રયાસ કર્યો છે તેના માટે

હૃદયપૂર્વક અભિનંદન! 🥰🥰🥰


પરંતુ કમનસીબે,

હું એક મધ્યમ વર્ગનો માણસ છું,

માત્ર મારા પેન્શન પર જીવી રહ્યો છું. 😅

તેથી અહીં કંઈ મૂલ્યવાન નથી.


મને ખરાબ લાગે છે કે

તમારી મહેનત અને કિંમતી સમય

વ્યર્થ જશે. 😔 તો કૃપા કરીને, તમારા 

પ્રયત્નોના આદર તરીકે, મુકવામાં આવેલ

આ નાની રકમ સ્વીકારો. 🙏


ઉપરાંત, તમારા વ્યવસાયમાં

વધુ સફળ થવામાં મદદ કરવા માટે

(ચોરી 😜) કરવા બાબતે હું તમને નીચે 

કેટલીક ટિપ્સ આપી રહ્યો છું 👇"


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માસ્ટરની "સલાહ"

નીચે મુજબ વાંચવામાં આવે છે: 😂👇


૮મા માળે - એક ભ્રષ્ટ મંત્રી રહે છે 💼💰


૭મા માળે - એક કુટિલ મિલકત વેપારી 🏢


છઠ્ઠા માળે - એક સહકારી બેંકના ચેરમેન 🏦


પાંચમા માળે - એક મોટા ઉદ્યોગપતિ 🏭


ચોથા માળે - એક પ્રખ્યાત વકીલ ⚖️


ત્રીજા માળે - એક ભ્રષ્ટ રાજકારણી 😏💍💵


"તેમની પાસે સોના અને રોકડના પર્વતો છે.


તમારી 'વ્યવસાયિક સફળતા'

તેમને સહેજ પણ પરેશાન નહીં કરે!


કારણ કે તેઓ પોલીસમાં

ફરિયાદ પણ નહીં કરે!" 😂😂😂


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દશેરા પછી, જ્યારે

માસ્ટર ઘરે પાછા ફર્યા, 

ત્યારે તેમને ટેબલ પર એક

મોટી થેલી મળી. 🎒😲

તેની અંદર ₹૧૦ લાખ રોકડા હતા! 

💸💸💸

અને એક પત્ર —


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"આદરણીય ગુરુજી, 🙏


તમારા માર્ગદર્શન અને

શિક્ષણ બદલ હૃદયપૂર્વક આભાર! 👏👏

મેં તમારી સલાહનું પાલન કર્યું અને મારું 

મિશન સફળ થયું! 😄

હું કૃતજ્ઞતાના પ્રતીક તરીકે

આ નાની રકમ છોડી રહ્યો છું.


ભવિષ્યમાં પણ મને

તમારા આશીર્વાદ અને શાણપણ

મળતું રહે એવી પ્રાર્થના...


તમારો શિષ્ય - ચોર 😄😄"


--


😂😂😂

ગુરુજીએ તે વાંચ્યું અને હસીને કહ્યું —


"અરે! મને લાગ્યું કે હું નિવૃત્ત થઈ ગયો છું,

પણ એવું લાગે છે કે મારી શિક્ષણ કારકિર્દી 

હજુ પણ ચાલુ છે!" 📚🤣💥


😂😂😂😂😂😂

😂😂😂😂😂😂😃😄

Friday, 24 October 2025

देवदूत

टालस्टाय ने एक छोटी सी कहानी लिखी है। मृत्यु के देवता ने अपने एक दूत को भेजा पृथ्वी पर। एक स्त्री मर गयी थी, उसकी आत्मा को लाना था। 


देवदूत आया, लेकिन चिंता में पड़ गया। क्योंकि तीन छोटी-छोटी लड़कियां जुड़वां–एक अभी भी उस मृत स्त्री से लगी है। एक चीख रही है, पुकार रही है। एक रोते-रोते सो गयी है, उसके आंसू उसकी आंखों के पास सूख गए हैं–तीन छोटी जुड़वां बच्चियां और स्त्री मर गयी है, और कोई देखने वाला नहीं है। पति पहले मर चुका है। परिवार में और कोई भी नहीं है। इन तीन छोटी बच्चियों का क्या होगा?


उस देवदूत को यह खयाल आ गया, तो वह खाली हाथ वापस लौट गया। उसने जा कर अपने प्रधान को कहा कि मैं न ला सका, मुझे क्षमा करें, लेकिन आपको स्थिति का पता ही नहीं है। तीन जुड़वां बच्चियां हैं– छोटी-छोटी, दूध पीती। एक अभी भी मृत से लगी है, एक रोते-रोते सो गयी है, दूसरी अभी चीख-पुकार रही है। हृदय मेरा ला न सका। क्या यह नहीं हो सकता कि इस स्त्री को कुछ दिन और जीवन के दे दिए जाएं? कम से कम लड़कियां थोड़ी बड़ी हो जाएं। और कोई देखने वाला नहीं है।


मृत्यु के देवता ने कहा, तो तू फिर समझदार हो गया; उससे ज्यादा,..... जिसकी मर्जी से मौत होती है, .......जिसकी मर्जी से जीवन होता है!


    तो तूने पहला पाप कर दिया, और इसकी तुझे सजा मिलेगी। और सजा यह है कि तुझे पृथ्वी पर चले जाना पड़ेगा। और जब तक तू तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर, तब तक वापस न आ सकेगा।


इसे थोड़ा समझना। तीन बार न हंस लेगा अपनी मूर्खता पर–क्योंकि दूसरे की मूर्खता पर तो अहंकार हंसता है। जब तुम अपनी मूर्खता पर हंसते हो तब अहंकार टूटता है।


 देवदूत को लगा नहीं। वह राजी हो गया दंड भोगने को, लेकिन फिर भी उसे लगा कि सही तो मैं ही हूं। और हंसने का मौका कैसे आएगा? 


उसे रूस की जमीन पर फेंक दिया गया। 


एक चमार, सर्दियों के दिन करीब आ रहे थे और बच्चों के लिए कोट और कंबल खरीदने शहर गया था, कुछ रुपए इकट्ठे कर के। जब वह शहर जा रहा था तो उसने राह के किनारे एक नंगे आदमी को पड़े हुए, ठिठुरते हुए देखा।


 यह नंगा आदमी वही देवदूत है जो पृथ्वी पर फेंक दिया गया था।


 उस चमार को दया आ गयी। और बजाय अपने बच्चों के लिए कपड़े खरीदने के, उसने इस आदमी के लिए कंबल और कपड़े खरीद लिए।


 इस आदमी को कुछ खाने- पीने को भी न था, घर भी न था, छप्पर भी न था जहां रुक सके। तो चमार ने कहा कि अब तुम मेरे साथ ही आ जाओ। लेकिन अगर मेरी पत्नी नाराज हो–जो कि वह निश्चित होगी, क्योंकि बच्चों के लिए कपड़े खरीदने लाया था, वह पैसे तो खर्च हो गए–वह अगर नाराज हो, चिल्लाए, तो तुम परेशान मत होना। थोड़े दिन में सब ठीक हो जाएगा।


उस देवदूत को ले कर चमार घर लौटा। न तो चमार को पता है कि देवदूत घर में आ रहा है, न पत्नी को पता है। जैसे ही देवदूत को ले कर चमार घर में पहुंचा, पत्नी एकदम पागल हो गयी। बहुत नाराज हुई, बहुत चीखी- चिल्लायी। और देवदूत पहली दफा हंसा। चमार ने उससे कहा, हंसते हो, बात क्या है? उसने कहा, मैं जब तीन बार हंस लूंगा तब बता दूंगा।


देवदूत हंसा पहली बार, क्योंकि उसने देखा कि इस पत्नी को पता ही नहीं है कि चमार देवदूत को घर में ले आया है, जिसके आते ही घर में हजारों खुशियां आ जाएंगी। लेकिन आदमी देख ही कितनी दूर तक सकता है! पत्नी तो इतना ही देख पा रही है कि एक कंबल और बच्चों के पकड़े नहीं बचे। जो खो गया है वह देख पा रही है, जो मिला है उसका उसे अंदाज ही नहीं है–मुफ्त! घर में देवदूत आ गया है। जिसके आते ही हजारों खुशियों कश्रो,नंंक्या घट रहा है!


जल्दी ही, क्योंकि वह देवदूत था, सात दिन में ही उसने चमार का सब काम सीख लिया। और उसके जूते इतने प्रसिद्ध हो गए कि चमार महीनों के भीतर धनी होने लगा। आधा साल होते-होते तो उसकी ख्याति सारे लोक में पहुंच गयी कि उस जैसा जूते बनाने वाला कोई भी नहीं, क्योंकि वह जूते देवदूत बनाता था। सम्राटों के जूते वहां बनने लगे। धन अपरंपार बरसने लगा। एक दिन सम्राट का आदमी आया। और उसने कहा कि यह चमड़ा बहुत कीमती है, आसानी से मिलता नहीं, कोई भूल-चूक नहीं करना। जूते ठीक इस तरह के बनने हैं। और ध्यान रखना जूते बनाने हैं, स्लीपर नहीं। क्योंकि रूस में जब कोई आदमी मर जाता है तब उसको स्लीपर पहना कर मरघट तक ले जाते हैं। चमार ने भी देवदूत को कहा कि स्लीपर मत बना देना। जूते बनाने हैं, स्पष्ट आज्ञा है, और चमड़ा इतना ही है। अगर गड़बड़ हो गयी तो हम मुसीबत में फंसेंगे।


 लेकिन फिर भी देवदूत ने स्लीपर ही बनाए। 


जब चमार ने देखे कि स्लीपर बने हैं तो वह क्रोध से आगबबूला हो गया। वह लकड़ी उठा कर उसको मारने को तैयार हो गया कि तू हमारी फांसी लगवा देगा! और तुझे बार-बार कहा था कि स्लीपर बनाने ही नहीं हैं, फिर स्लीपर किसलिए? देवदूत फिर खिलखिला कर हंसा।


 तभी आदमी सम्राट के घर से भागा हुआ आया। उसने कहा, जूते मत बनाना, स्लीपर बनाना। क्योंकि सम्राट की मृत्यु हो गयी है।


भविष्य अज्ञात है। सिवाय उसके और किसी को ज्ञात नहीं। और आदमी तो अतीत के आधार पर निर्णय लेता है। सम्राट जिंदा था तो जूते चाहिए थे, मर गया तो स्लीपर पर चाहिए।


 तब वह चमार उसके पैर पकड़ कर माफी मांगने लगा कि मुझे माफ कर दे, मैंने तुझे मारा। पर उसने कहा, कोई हर्ज नहीं। मैं अपना दंड भोग रहा हूं। लेकिन वह हंसा आज दुबारा। चमार ने फिर पूछा कि हंसी का कारण? उसने कहा कि जब मैं तीन बार हंस लूं…।


दुबारा हंसा इसलिए कि भविष्य हमें ज्ञात नहीं है। इसलिए हम आकांक्षाएं करते हैं जो कि व्यर्थ हैं। हम अभीप्साएं करते हैं जो कभी पूरी न होंगी। हम मांगते हैं जो कभी नहीं घटेगा। क्योंकि कुछ और ही घटना तय है। हमसे बिना पूछे हमारी नियति घूम रही है। और हम व्यर्थ ही बीच में शोरगुल मचाते हैं। चाहिए स्लीपर और हम जूते बनवाते हैं। मरने का वक्त करीब आ रहा है और जिंदगी का हम आयोजन करते हैं। तो देवदूत को लगा कि वे बच्चियां! मुझे क्या पता, भविष्य उनका क्या होने वाला है? मैं नाहक बीच में आया।


और तीसरी घटना घटी कि एक दिन तीन लड़कियां आयीं जवान। उन तीनों की शादी हो रही थी। और उन तीनों ने जूतों के आर्डर दिए कि उनके लिए जूते बनाए जाएं। एक बूढ़ी महिला उनके साथ आयी थी जो बड़ी धनी थी। देवदूत पहचान गया, ये वे ही तीन लड़कियां हैं, जिनको वह मृत मां के पास छोड़ गया था और जिनकी वजह से वह दंड भोग रहा है। वे सब स्वस्थ हैं, सुंदर हैं। उसने पूछा कि क्या हुआ? यह बूढ़ी औरत कौन है? उस बूढ़ी औरत ने कहा कि ये मेरी पड़ोसिन की लड़कियां हैं। गरीब औरत थी, उसके शरीर में दूध भी न था। उसके पास पैसे-लत्ते भी नहीं थे। और तीन बच्चे जुड़वां। वह इन्हीं को दूध पिलाते-पिलाते मर गयी। लेकिन मुझे दया आ गयी, मेरे कोई बच्चे नहीं हैं, और मैंने इन तीनों बच्चियों को

पाल लिया।


 अगर मां जिंदा रहती तो ये तीनों बच्चियां गरीबी, भूख और दीनता और दरिद्रता में बड़ी होतीं। मां मर गयी, इसलिए ये बच्चियां तीनों बहुत बड़े धन-वैभव में, संपदा में पलीं। और अब उस बूढ़ी की सारी संपदा की ये ही तीन मालिक हैं। और इनका सम्राट के परिवार में विवाह हो

रहा है।


देवदूत तीसरी बार हंसा। और चमार को उसने कहा कि ये तीन कारण हैं। भूल मेरी थी। नियति बड़ी है। और हम उतना ही देख पाते हैं, जितना देख पाते हैं। जो नहीं देख पाते, बहुत विस्तार है उसका। और हम जो देख पाते हैं उससे हम कोई अंदाज नहीं लगा सकते, जो होने वाला है, जो होगा। मैं अपनी मूर्खता पर तीन बार हंस लिया हूं। अब मेरा दंड पूरा हो गया और अब मैं जाता हूं।


तुम अगर अपने को बीच में लाना बंद कर दो, तो तुम्हें मार्गों का मार्ग मिल गया। फिर असंख्य मार्गों की चिंता न करनी पड़ेगी। 


         छोड़ दो उस पर। वह जो करवा रहा है, जो उसने अब तक करवाया है, उसके लिए धन्यवाद। जो अभी करवा रहा है, उसके लिए धन्यवाद। जो वह कल करवाएगा, उसके लिए धन्यवाद। तुम बिना लिखा चेक धन्यवाद का उसे दे दो। वह जो भी हो, तुम्हारे धन्यवाद में कोई फर्क न पड़ेगा। अच्छा लगे, बुरा लगे, लोग भला कहें, बुरा कहें, लोगों को दिखायी पड़े दुर्भाग्य या सौभाग्य, यह सब चिंता तुम मत करना।     

🙏

Saturday, 27 September 2025

जीवन में उपयोगी नियम


*🔹जीवन में उपयोगी नियम🔹*


*🔸1. अश्लील पुस्तक आदि न पढ़कर ज्ञानवर्धक पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए ।*


*🔸2. चोरी कभी न करो ।*


*🔸3. किसी की भी वस्तु लें तो उसे सँभाल कर रखो । कार्य पूरा हो फिर तुरन्त ही वापिस दे दो ।*


*🔸4. समय का महत्त्व समझो । व्यर्थ बातें, व्यर्थ काम में समय न गँवाओ । नियमित तथा समय पर काम करो ।*


*🔸5. स्वावलंबी बनो । इससे मनोबल बढ़ता है ।*


*🔸6. हमेशा सच बोलो । किसी की लालच या धमकी में आकर झूठ का आश्रय न लो ।*


*🔸7. अपने से छोटे दुर्बल बालकों को अथवा किसी को भी कभी सताओ मत । हो सके उतनी सबकी मदद करो ।*


*🔸8. अपने मन के गुलाम नहीं परन्तु मन के स्वामी बनो । तुच्छ इच्छाओं की पूर्ति के लिए कभी स्वार्थी न बनो ।*


*🔸9. किसी का तिरस्कार, उपेक्षा, हँसी-मजाक कभी न करो । किसी की निंदा न करो और न सुनो ।*


*🔸10. किसी भी व्यक्ति, परिस्थिति या मुश्किल से कभी न डरो परन्तु हिम्मत से उसका सामना करो ।*


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🙏

Wednesday, 24 September 2025

कर्ज मुक्ति का उपाय

*🔅 शीघ्र कर्जमुक्ति के उपाय 🔅* 


*🔸 जब तक आपका कर्जा पूर्ण समाप्त न हो जाय तब तक नियमितरूप से 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस मंत्र का मन-ही-मन जप करते हुए पीपल-वृक्ष को जल अर्पित करें और उसकी गीली मिट्टी से तिलक करें। इससे आप शीघ्र कर्ज-मुक्त होंगे ।*


*🔸 यदि आपके व्यवसाय में कारीगर अथवा नौकर हैं तो उन्हें महीने में एक बार अवश्य अपने घर का भोजन इस भाव से खिलायें कि 'सभी रूपों में भगवान हैं, आज हम इन रूपों में विराजित भगवान को भोग अर्पण कर रहे हैं।' ऐसा करने से आपके व्यवसाय में हमेशा भगवान की कृपा बनी रहेगी। आपके सहयोगी पूरे जी- जान से कार्य में लगे रहेंगे, जिससे केवल कर्ज का चुकाना ही नहीं अपितु बरकत लाना भी आसान हो जायेगा। हर महीने नहीं कर सकते तो विशेष अवसरों पर ही करें।*

Thursday, 21 August 2025

पेड़ का रहस्य

ઝાડનું રહસ્ય

એક માણસ એક બહુરાષ્ટ્રીય કંપનીમાં સેલ્સ મેનેજર તરીકે કામ કરતો હતો. તેણે પોતાની બચતથી શહેરની બહાર એક આલીશાન ઘર બનાવ્યું. શહેરની બહાર હોવાથી, તે વિસ્તાર થોડો ઉજ્જડ હતો.

તે માણસ તેની પત્ની અને બાળકો સાથે તેના નવા ઘરમાં રહેવા લાગ્યો. તે સવારે વહેલા કામ પર નીકળી જતો અને સાંજે મોડો પાછો ફરતો.

એક ઉજ્જડ જગ્યાએ આટલું વૈભવી ઘર જોઈને, ચોરોના એક જૂથે ત્યાં ચોરી કરવાની યોજના બનાવી. ચોરી કરતા પહેલા, તેઓ મેનેજરના ઘરની આસપાસ ગયા અને તેના ઘરની ગતિવિધિઓનું નિરીક્ષણ કરવાનું શરૂ કર્યું.

પહેલા જ દિવસે, તેણે મેનેજરનું વિચિત્ર વર્તન જોયું. ઘરે આવ્યા પછી, તેણે સૌથી પહેલું કામ પોતાના બગીચામાં આંબાના ઝાડ પર જઈને પોતાની ઓફિસની બેગમાંથી એક પછી એક વસ્તુઓ કાઢીને ઝાડ પર ક્યાંક મૂકવાનું શરૂ કર્યું.

મેનેજરની પીઠ ચોરો તરફ હોવાથી, તેઓ જોઈ શક્યા નહીં કે તેણે તેની બેગમાંથી શું કાઢ્યું અને તેને ઝાડ પર ક્યાં મૂક્યું. તેઓએ અનુમાન લગાવ્યું કે તે કંઈક કિંમતી હશે.

ચોરો મેનેજરના ઘરની નજીક ઓચિંતો છાપો મારીને બેઠા હતા અને અંધારું થવાની રાહ જોતા હતા. રાત્રે જ્યારે ઘરની લાઇટ બંધ થઈ ગઈ, ત્યારે તેમને ખાતરી થઈ કે ઘરમાં બધા સૂઈ ગયા છે.

તેઓ દિવાલ કૂદીને ઘરમાં પ્રવેશ્યા અને સીધા આંબાના ઝાડ પાસે ગયા. પછી સમય બગાડ્યા વિના તેઓએ ત્યાં મેનેજર દ્વારા છુપાવેલી વસ્તુઓ શોધવાનું શરૂ કર્યું. પરંતુ ઘણી શોધખોળ કર્યા પછી પણ તેમને કંઈ મળ્યું નહીં. અંતે, થાકેલા અને થાકેલા, તેઓ પાછા ફર્યા.

બીજા દિવસે તેઓ ફરીથી તે ઘરની નજીક છુપાઈને બેઠા. જ્યારે મેનેજર ઓફિસથી પાછો ફર્યો, ત્યારે ચોરોએ ફરીથી તેમની નજર તેના પર કેન્દ્રિત કરી. પાછલા દિવસની જેમ, તે પહેલા આંબાના ઝાડ પાસે ગયો અને બેગમાંથી કંઈક કાઢીને તેમાં નાખવાનું શરૂ કર્યું. પછી તે ઘરની અંદર ગયો.

તે રાત્રે, ઘરની લાઇટ બંધ કર્યા પછી, ચોરો ફરીથી દિવાલ પર ચઢી ગયા અને આંબાના ઝાડ પર પહોંચ્યા અને મેનેજરે ત્યાં છુપાવેલી વસ્તુઓ શોધવા લાગ્યા. પરંતુ તે દિવસે તેમને કંઈ મળ્યું નહીં.

થોડા દિવસો સુધી તેઓ દરરોજ રાત્રે આંબાના ઝાડ પાસે શોધતા રહ્યા પણ તેમને કંઈ મળ્યું નહીં. તેઓ મૂંઝવણમાં હતા કે મેનેજર ઝાડમાં એવી વસ્તુઓ કેવી રીતે છુપાવે છે કે અમારા જેવા હોશિયાર ચોરો પણ તે શોધી શકતા નથી. હવે ચોરો ચોરી કરવા કરતાં આ રહસ્ય જાણવા માટે વધુ ઉત્સુક બન્યા.

છેવટે, તેમની જિજ્ઞાસા સંતોષવા માટે, તેઓ બધા રવિવારે મેનેજરને મળવા તેમના ઘરે ગયા. તેઓએ સજ્જનોની જેમ મેનેજરનું સ્વાગત કર્યું.

પછી ચોરોના નેતાએ કહ્યું, "સાહેબ... કૃપા કરીને વાંધો ના લો. હું તમને કંઈક પૂછવા માંગતો હતો. અમે ચોર છીએ. છેલ્લા કેટલાક દિવસોથી અમે તમારા ઘરમાંથી ચોરી કરવાનો પ્રયાસ કરી રહ્યા છીએ. દરરોજ અમે જોઈએ છીએ કે તમે સાંજે ઘરે આવો છો અને આંબાના ઝાડમાં કંઈક મૂકો છો પણ ઘણી કોશિશ કર્યા પછી પણ અમને તે વસ્તુઓ મળી શકી નથી. અમે બધા જાણવા માટે ઉત્સુક છીએ કે તમે ત્યાં એવી વસ્તુઓ કેવી રીતે છુપાવો છો જે તે મળતી નથી?"

ચોરોની વાત સાંભળીને મેનેજર હસ્યો, પછી કહ્યું, "અરે ભાઈ... હું ત્યાં કંઈ છુપાવતો નથી. તમે લોકો ગેરસમજ કરી છે."

"ના સાહેબ, અમે તે જોયું છે. દરરોજ સાંજે તમે તમારી બેગમાંથી કંઈક કાઢો છો અને તેને ઝાડ પર મુકો છો. તમે હંમેશા ત્યાં કંઈક છુપાવો છો." ચોરોએ એક સ્વરમાં કહ્યું.

હવે મેનેજર ગંભીર બન્યા અને કહ્યું, "હું એક બહુરાષ્ટ્રીય કંપનીમાં સેલ્સ મેનેજર છું. કામનું દબાણ ખૂબ વધારે છે. જેના કારણે તણાવ અનિવાર્ય છે. કોઈપણ કિંમતે લક્ષ્ય પ્રાપ્ત કરવું પડશે. આ માટે, દરરોજ કોઈને કોઈ સાથે ઝઘડો થાય છે. તમારે ગ્રાહકના ટોણા સાંભળવા પડે છે, બોસની ઠપકો સહન કરવો પડે છે. માનસિક તણાવ એટલો બધો છે કે ઘરે આવીને પણ તે દૂર થતો નથી. પહેલા, મારા પરિવારના સભ્યો ઘણીવાર બિનજરૂરી રીતે મારો તણાવ સહન કરતા હતા."

થોડા સમય પછી, મેનેજરે આગળ કહ્યું, “….જ્યારે મેં આ નવું ઘર બનાવ્યું, ત્યારે મેં વિચાર્યું કે હું આ ઘરનું વાતાવરણ શાંતિપૂર્ણ રાખીશ. હું ક્યારેય ઓફિસનો તણાવ ઘરે નહીં લાવીશ. તેથી જ ઘરે આવ્યા પછી, હું સૌથી પહેલું કામ આંબાના ઝાડ પર જાઉં છું અને મારો બધો તણાવ એક પછી એક ત્યાં મૂકી દઉં છું. આશ્ચર્યજનક વાત એ છે કે બીજા દિવસે જ્યારે હું તેને લેવા જાઉં છું, ત્યારે અડધો તણાવ અદૃશ્ય થઈ જાય છે. જે થોડું બચે છે, તે હું મારી સાથે લઈ જાઉં છું. પણ પછી જ્યારે હું સાંજે ઘરે આવું છું, ત્યારે હું ઝાડ પાસે તણાવ છોડી દઉં છું, આ ઝાડનું રહસ્ય છે.”

મેનેજરની વાત સાંભળ્યા પછી, ચોરો ઝાડનું રહસ્ય સમજી ગયા. તેઓ ચોરી કરવામાં સફળ ન થઈ શક્યા, પરંતુ તેઓએ જીવનનો એક ખૂબ જ મહત્વપૂર્ણ પાઠ ચોક્કસપણે શીખ્યા.

શિક્ષણ:-

મિત્રો! આજના યુગમાં, આરામ અને સુવિધાના સાધનો વધી રહ્યા છે અને જીવન આરામદાયક બની રહ્યું છે. પરંતુ ક્યાંકને ક્યાંક તણાવ પણ વધી રહ્યો છે. ઘણીવાર તમે જોયું હશે કે લોકો તેમના કામના તણાવને તેમના ઘરે લાવે છે. આ રીતે, તેઓ ઘરે શાંતિથી રહી શકતા નથી, અને તેમના તણાવથી તેમના પરિવારના સભ્યોને પણ પ્રભાવિત કરે છે. શું હંમેશા તણાવનો ભાર વહન કરવો જરૂરી છે? શું આ રીતે જીવન વધુ મુશ્કેલ નથી બની રહ્યું? તણાવ સંપૂર્ણપણે દૂર કરી શકાતો નથી. પરંતુ ઓછામાં ઓછું જ્યારે તમે ઘરે પરિવારના સભ્યો સાથે હોવ છો, ત્યારે તણાવને દૂર રાખી શકાય છે અને તેમની સાથે ખુશીની ક્ષણો વિતાવી શકાય છે. તેથી, જ્યારે પણ તમે ઘરે આવો છો, ત્યારે તણાવને બહાર છોડી દો.

Friday, 1 August 2025

मनोरंजन

 यदि आप पति हो और कभी एकदम सुबह 4.00 बजे जाग जाओ, और चाय पीने की इच्छा हो जाए, जो कि......स्वाभाविक है,‌ तो आप सोचेंगे कि.....चाय खुद ही बनाऊं या प्रिय अर्धांगिनी को जगाने का दुःसाहस करूँ.....? दोनो ही स्थितियों में आपको निम्नलिखित भयंकर परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है... और आप कुछ भी करो, आपको..."चार बातें"...तो सुननी ही है, जो ‌कि वास्तव में 40-50 कम नहीं होती हैं...!!

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● पहली परिस्थिति:---

आपने खुद ही चाय बनाई...!!


आपने यदि खुद चाय बना ली, तो सुबह-सुबह ब्रह्म- मुहूर्त में आठ बजे जब भार्या जागेगी तब, आपको सुनना ही है:----  


क्या ज़रूरत थी खुद बनाने की, मुझे जगा देते, पूरी पतीली "जला कर", रख दी, और वह "दूध की पतीली" थी, "चाय वाली" नीचे रखी है "दाल भरकर"....!!

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विश्लेषण:---- ‌चाय खुद बनाने से पत्नी दुखी हुई / शर्मिंदा हुई / अपने अधिकार क्षेत्र में घुसपैठ से भयाक्रांत हुई / या कुछ और, आप कभी भी समझ नहीं पाएंगे, दूसरा ये कि......"दूध की पतीली" में "चाय" बनाना तो गुनाह है, लेकिन "चाय की पतीली" में "दाल" भरकर रखी जा सकती है....??

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● दूसरी परिस्थिति:---

आपने पत्नि चाय बनाने के लिए जगा दिया...!!


यदि आपने गलती से भी पत्नी को जगा दिया तो, आप सुनने के लिए तैयार रहिये:---- ‌"मेरी तो किस्मत ही ख़राब है, एक काम नहीं आता इस आदमी को, पिताजी ने जाने क्या देखा था, आधी रात को चाय चाहिए इन्हे....अभी अभी तो, पीठ सीधी की थी और इनकी फरमाइशें हैं कि, ख़त्म ही नहीं हो रही हैं, दिन देखते हैं, न रात....?? चाय बनकर, पी कर ख़त्म भी हो जाएगी पर 'श्लोक-सरिता' का प्रवाह अनवरत, अविरल चालता ही रहेगा...!!

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● तीसरी परिस्थिति:---

एक अन्य विचित्र परिस्थिति....!!


यदि आप चाय खुद बना रहे हैं.......और शक्कर के डिब्बे में शक्कर आधा चम्मच बची है, तो आपके दिमाग में विचार आएगा ही कि बड़े डिब्बे से निकालकर इसमें टॉप-अप कर देता हूँ, यदि आपने ऐसा किया तो पता है क्या सुनोगे....?? शायद आप सोच रहे होंगे कि, आपने बहुत शाबाशी वाला काम कीया, नहीं बल्कि आपको....शर्तिया ये सुनना पड़ेगा -- "किसने कहा था शक्कर निकालने को ? मुझे वह डिब्बा, आज मँजवाना था"

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निष्कर्ष:---- संसार में पत्नी की नजरों में पति नाम का जो जीव होता है, उसमे अकल का बिल्कुल ही अभाव होता है...!! "सर्व-गुण-संपन्न"......तो उसके "पापा" होते हैं, और या फिर "प्रतापगढ-वाले-जीजाजी"....???


इसलिए सभी पतिओं को, मेरी सलाह है कि, कभी सुबह-सुबह नींद खुल जाए, तो वापस मुंह ढांक कर सो जाएं, उसी में भलाई है...!! 😀 😀

प्रार्थना की शक्ति

एक बेटी ने एक संत से आग्रह किया कि वो हमारे घर आकर उसके बीमार पिता से मिलें, प्रार्थना करें। बेटी ने यह भी बताया कि उसके बुजुर्ग पिता पलंग से उठ भी नहीं सकते। 

संत ने बेटी के आग्रह को स्वीकार किया।

कुछ समय बाद जब संत घर आए, तो उसके पिताजी पलंग पर दो तकियों पर सिर रखकर लेटे हुए थे और एक खाली कुर्सी पलंग के साथ पड़ी थी।

संत ने सोचा कि शायद मेरे आने की वजह से यह कुर्सी यहां पहले से ही रख दी गई हो।

संत ने पूछा - मुझे लगता है कि आप मेरे ही आने की उम्मीद कर रहे थे, पिता- नहीं, आप कौन हैं?

संत ने अपना परिचय दिया और फिर कहा- मुझे यह खाली कुर्सी देखकर लगा कि आपको मेरे आने का आभास था।

पिता- ओह यह बात नहीं है, आपको अगर बुरा न लगे तो कृपया कमरे का दरवाजा बंद करेंगे क्या? संत को यह सुनकर थोड़ी हैरत हुई, फिर भी दरवाजा बंद कर दिया।

पिता- दरअसल इस खाली कुर्सी का राज मैंने आज तक किसी को भी नहीं बताया, अपनी बेटी को भी नहीं। पूरी जिंदगी, मैं यह जान नहीं सका कि प्रार्थना कैसे की जाती है।

मंदिर जाता था, पुजारी के श्लोक सुनता था, वो तो सिर के ऊपर से गुज़र जाते थे, कुछ भी पल्ले नहीं पड़ता था।

मैंने फिर प्रार्थना की कोशिश करना छोड़ दिया।

लेकिन चार साल पहले मेरा एक दोस्त मिला उसने मुझे बताया कि प्रार्थना कुछ नहीं, भगवान से सीधे संवाद का माध्यम होती है, उसी ने सलाह दी कि एक खाली कुर्सी अपने सामने रखो, फिर विश्वास करो कि वहाँ भगवान खुद ही विराजमान हैं अब भगवान से ठीक वैसे ही बात करना शुरू करो, जैसे कि अभी तुम मुझसे कर रहे हो।

मैंने ऐसा ही करके देखा, मुझे बहुत अच्छा लगा, फिर तो मैं रोज दो-दो घंटे ऐसा करके देखने लगा, लेकिन यह ध्यान रखता था कि मेरी बेटी कभी मुझे ऐसा करते न देख ले।

अगर वह देख लेती, तो परेशान हो जाती या वह फिर मुझे मनोचिकित्सक के पास ले जाती। यह सब सुनकर संत ने बुजुर्ग के लिए प्रार्थना की, सिर पर हाथ रखा और भगवान से बात करने के क्रम को जारी रखने के लिए कहा। संत को उसी दिन दो दिन के लिए शहर से बाहर जाना था, इसलिए विदा लेकर चले गए। दो दिन बाद बेटी का फोन संत के पास आया कि उसके पिता की उसी दिन कुछ घंटे बाद ही मृत्यु हो गई थी, जिस दिन पिताजी आपसे मिले थे। संत ने पूछा कि उन्हें प्राण छोड़ते वक्त कोई तकलीफ तो नहीं हुई?

बेटी ने जवाब दिया- नहीं, मैं जब घर से काम पर जा रही थी, तो उन्होंने मुझे बुलाया, मेरा माथा प्यार से चूमा, यह सब करते हुए उनके चेहरे पर ऐसी शांति थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। जब मैं वापस आई, तो वो हमेशा के लिए आंखें मूंद चुके थे, लेकिन मैंने एक अजीब सी चीज भी देखी। पिताजी ऐसी मुद्रा में थे जैसे कि खाली कुर्सी पर किसी की गोद में अपना सिर झुकाए हों। संतजी, वो क्या था?

यह सुनकर संत की आंखों से आंसू बह निकले, बड़ी मुश्किल से बोल पाए - काश, मैं भी जब दुनियां से जाऊं तो ऐसे ही जाऊं। बेटी! तुम्हारे पिताजी की मृत्यु भगवान की गोद में हुई है। उनका सीधा सम्बन्ध सीधे भगवान से था। उनके पास जो खाली कुर्सी थी, उसमें भगवान बैठते थे और वे सीधे उनसे बात करते थे। उनकी प्रार्थना में इतनी ताकत थी कि भगवान को उनके पास आना पड़ता था।