. कार्तिक माहात्म्य
अध्याय–34
ऋषियों ने पूछा–‘हे सूतजी! पीपल के वृक्ष की शनिवार के अलावा सप्ताह के शेष दिनों में पूजा क्यों नहीं की जाती ?
सूतजी बोले–‘हे ऋषियों! समुद्र-मंथन करने से देवताओं को जो रत्न प्राप्त हुए, उनमें से देवताओं ने लक्ष्मी और कौस्तुभमणि भगवान विष्णु को समर्पित कर दी थी। जब भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से विवाह करने के लिए तैयार हुए तो लक्ष्मी जी बोली–‘हे प्रभु! जब तक मेरी बड़ी बहन का विवाह नहीं हो जाता तब तक मैं छोटी बहन आपसे किस प्रकार विवाह कर सकती हूँ इसलिए आप पहले मेरी बड़ी बहन का विवाह करा दे, उसके बाद आप मुझसे विवाह कीजिए। यही नियम है जो प्राचीनकाल से चला आ रहा है।’
सूतजी ने कहा–‘लक्ष्मी जी के मुख से ऐसे वचन सुनकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी की बड़ी बहन का विवाह उद्दालक ऋषि के साथ सम्पन्न करा दिया। लक्ष्मी जी की बड़ी बहन अलक्ष्मी जी बड़ी कुरुप थी, उसका मुख बड़ा, दाँत चमकते हुए, उसकी देह वृद्धा की भाँति, नेत्र बड़े-बड़े और बाल रुखे थे। भगवान विष्णु द्वारा आग्रह किये जाने पर ऋषि उद्दालक उससे विवाह कर के उसे वेद मन्त्रों की ध्वनि से गुंजाते हुए अपने आश्रम ले आये। वेद ध्वनि से गुंजित हवन के पवित्र धुंए से सुगन्धित उस ऋषि के सुन्दर आश्रम को देखकर अलक्ष्मी को बहुत दु:ख हुआ। वह महर्षि उद्दालक से बोली–‘चूंकि इस आश्रम में वेद ध्वनि गूँज रही है इसलिए यह स्थान मेरे रहने योग्य नहीं है इसलिए आप मुझे यहाँ से अन्यत्र ले चलिए।’
उसकी बात सुनकर महर्षि उद्दालक बोले–‘तुम यहाँ क्यों नहीं रह सकती और तुम्हारे रहने योग्य अन्य कौन सा स्थान है वह भी मुझे बताओ।’ अलक्ष्मी बोली–‘जिस स्थान पर वेद की ध्वनि होती हो, अतिथियों का आदर-सत्कार किया जाता हो, यज्ञ आदि होते हों, ऐसे स्थान पर मैं नहीं रह सकती। जिस स्थान पर पति-पत्नी आपस में प्रेम से रहते हों पितरों के निमित्त यज्ञ होते हों, देवताओं की पूजा होती हो, उस स्थान पर भी मैं नहीं रह सकती। जिस स्थान पर वेदों की ध्वनि न हो, अतिथियों का आदर-सत्कार न होता हो, यज्ञ न होते हों, पति-पत्नी आपस में क्लेश करते हों, पूज्य वृद्धो, सत्पुरुषों तथा मित्रों का अनादर होता हो, जहाँ दुराचारी, चोर, परस्त्रीगामी मनुष्य निवास करते हों, जिस स्थान पर गायों की हत्या की जाती हो, मद्यपान, ब्रह्महत्या आदि पाप होते हों, ऐसे स्थानों पर मैं प्रसन्नतापूर्वक निवास करती हूँ।’
सूतजी बोले–‘अलक्ष्मी के मुख से इस प्रकार के वचन सुनकर उद्दालक का मन खिन्न हो गया। वह इस बात को सुनकर मौन हो गये। थोड़ी देर बाद वे बोले कि ‘ठीक है, मैं तुम्हारे लिए ऐसा स्थान ढूंढ दूँगा। जब तक मैं तुम्हारे लिए ऐसा स्थान न ढूंढ लूँ तब तक तुम इसी पीपल के नीचे चुपचाप बैठी रहना।’ महर्षि उद्दालक उसे पीपल के वृक्ष के नीचे बैठाकर उसके रहने योग्य स्थान की खोज में निकल पड़े परन्तु जब बहुत समय तक प्रतीक्षा करने पर भी वे वापिस नहीं लौटे तो अलक्ष्मी विलाप करने लगी। जब वैकुण्ठ में बैठी लक्ष्मी जी ने अपनी बहन अलक्ष्मी का विलाप सुना तो वे व्याकुल हो गई। वे दुखी होकर भगवान विष्णु से बोली–‘हे प्रभु! मेरी बड़ी बहन पति द्वारा त्यागे जाने पर अत्यन्त दुखी है। यदि मैं आपकी प्रिय पत्नी हूँ तो आप उसे आश्वासन देने के लिए उसके पास चलिए।’ लक्ष्मी जी की प्रार्थना पर भगवान विष्णु लक्ष्मी जी सहित उस पीपल के वृक्ष के पास गये जहाँ अलक्ष्मी बैठकर विलाप कर रही थी।
उसको आश्वासन देते हुए भगवान विष्णु बोले–‘हे अलक्ष्मी! तुम इसी पीपल के वृक्ष की जड़ में सदैव के लिए निवास करो क्योंकि इसकी उत्पत्ति मेरे ही अंश से हुई है और इसमें सदैव मेरा ही निवास रहता है। प्रत्येक वर्ष गृहस्थ लोग तुम्हारी पूजा करेगें और उन्हीं के घर में तुम्हारी छोटी बहन का वास होगा। स्त्रियों को तुम्हारी पूजा विभिन्न उपहारों से करनी चाहिए। मनुष्यों को पुष्प, धूप, दीप, गन्ध आदि से तुम्हारी पूजा करनी चाहिए तभी तुम्हारी छोटी बहन लक्ष्मी उन पर प्रसन्न होगी।’
सूतजी बोले–‘ऋषियों! मैंने आपको भगवान श्रीकृष्ण, सत्यभामा तथा पृथु-नारद का संवाद सुना दिया है जिसे सुनने से ही मनुष्य के समस्त पापों का नाश हो जाता है और अन्त में वैकुण्ठ को प्राप्त करता है। यदि अब भी आप लोग कुछ पूछना चाहते हैं तो अवश्य पूछिये, मैं उसे अवश्य कहूँगा।’
सूतजी के वचन सुनकर शौनक आदि ऋषि थोड़ी देर तक प्रसन्नचित्त वहीं बैठे रहे, तत्पश्चात वे लोग बद्रीनारायण जी के दर्शन हेतु चल दिये। जो मनुष्य इस कथा को सुनता या सुनाता है उसे इस संसार में समस्त सुख प्राप्त होते हैं।
*🔔🌼🌿🙏हरि ॐ🙏🌿🌼🔔*
*┏╮/╱ कार्तिक माह की*
*╰ 🌹┛उन्तीसवी कहानी।।🪔))*
*╱/ ╰┛*इल्ली घुण की कहानी (पंचतीर्थ्या)*
*⚊⚊⚊⚊✬( हरि ॐ)✬⚊⚊⚊⚊*
एक इल्ली और घुण था ।
इल्ली बोली आओ घुण कार्तिक नहायें।
तो घुण बोला तू ही नहा लें।
मैं तो नहीं नहाऊँगा।
बाद में इल्ली तो राजा की लड़की के पल्ले लगकर चली गई व काती नहाती रही और घुण नहीं नहाया ।
कार्तिक उतरते ही दोनों मर गये।
बाद में इल्ली ने कार्तिक नहाने के कारण राजा के घर जन्म लिया और घुण राजा के घर गधा बना ।
राजा ने बेटी का विवाह का सावा निकलवाया। बेटी सुसराल जाने के लिए विदा होने लगी तो बेटी की बैलगाड़ी रूक गई।
राजा- रानी बोले कि बैलगाड़ी क्यों रूक गई है। बेटी तुझे जो चाहिए माँग ले ।
तब लड़की बोली कि वह गधा मुझे चाहिए तो वह बोले यह क्या माँगा, यह मत ले जा चाहे और धन-दौलत ले जा।
परन्तु वह नहीं मानी और कहा मुझे तो यही गधा चाहिए तो वह गधा रथ के साथ बांध दिया।
जब गधे को साथ बाँध दिया तो वह फुदक-फुदक कर भागने लगा ।
लड़की महल में जाने लगी तो उसे सीढ़ी के नीचे बाँध दिया।
जब सीढ़ी उतरने लगी तो गधे ने कहा कि लड़की थोड़ा पानी पिला दो।
तब लड़की ने कहा मैने पहले ही कहा कि आ कार्तिक नहा ले तब तूने कहा था कि मैं तो बाजरा खाऊँगा और ठण्डा ठण्डा पानी पीऊँगा।
उनकी आपस की यह बात दोरानी-जिठानी ने सुन ली और देवर को सिखा दिया कि तुम क्या जादूगरनी लायें हो जो जानवर से बात करती हैं।
तो वह बोला कि कानों सुनी नहीं मानता, आखों से देखकर मानूंगा। दूसरे दिन वह छुप कर बैठ गया और देखा कि रानी महल से नीचे उतरी तो गधा फिर वहीं बात बोला और रानी ने जवाब भी दिया,
अब राजकुमार बोला कि रानी तू जानवर से क्यों बात कर रही है।
तू बता दे नहीं तो तलवार से मारूंगा।
राम ने कहा कि औरत का भेद मत पूछो।
तब राजा ने कहा कि मैं तेरा पूरा भेद लूंगा।
रानी ने कहा कि पिछले जन्म में मैं तो इल्ली थी और वह घुण था।
तब मैंने कहा कि आ घुण कार्तिक नहा लें तो यह नहाया नहीं जिससे यह गधा बन गया और मैं रानी के पल्ले के लगकर कार्तिक नहाई तो मैंने राजा के घर जन्म लिया।
यह बात सुनकर राजा ने कहा कि कार्तिक में नहाने का क्या फल है?
तो रानी ने कहा कि कार्तिक नहाने से मैं आपके घर में राज-पाट कर रही हूँ।
तब राजा ने कहा कि इतना फल है तो हम दोनों अब जोड़े से नहायेंगे और बहुत दान-पुण्य करेंगे जिससे आगे हमें और ज्यादा सुख मिलेगा।
दोनों जने कार्तिक नहाने लगे तो राजा के घर में बहुत धन-सम्पत्ति हो गई। हे कार्तिक महाराज जैसा इल्ली को सुख दिया वैसा सबको देना ।
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🎊🙇🏻♀️जय श्री कृष्ण शरणं मम🙇🏻♀️🎊
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