🌳 समय बड़ा बलवान 🌳
तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।
भिलां लूटी गोपियां, वही अर्जुन वही बाण।।
अर्थात:- समय ही सबसे बड़ा बलवान है, समय ही होता है जो सबको बड़ा या छोटा बनाता है। जैसे एक बार महान धनुर्धर अर्जुन का समय खराब था तो वो भीलों से गोपियों की रक्षा नही कर पाया था।
आइये इस "पौराणिक कथा" के माध्यम से जानते है तुलसीदास जी ने ऐसा क्यों कहा था।
विष्णु पुराण में कथा आती है कि, जब गांधारी और दुर्वासा ऋषि के श्राप से यदुवंशियों का विनाश हो रहा था।
तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को द्वारका बुलाया और अपने धाम जाने से पूर्व द्वारका की सभी स्त्रियों गोपियों को अपने साथ हस्तिनापुर ले जाओ।
श्रीकृष्ण और यदुवंशियों के शरीर का अंतिम संस्कार करके अर्जुन जब द्वारिका से निकले तो भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा मानकर उनके साथ भगवान श्री कृष्ण की कई पत्नियां, गोपियां और अन्य यदुवंशियों की स्त्रियां भी द्वारिका से साथ चलने लगीं। द्वारिका से उनकी अंतिम विदाई हो रही थी इसलिए जिनके पास जो धन संपदा थी वह साथ में लेकर नगर से निकल चली।
मार्ग में अकेले अर्जुन के साथ द्वारिका की स्त्रियां गोपियां और वहां की अपार संपदा के आगमन की सूचना मार्ग में रहने वाले भीलों (लुटेरों) और ग्रामीणों तक पहुंचने लगी। सभी लोग द्वारिका की स्त्रियों और धन संपदा को पाने के लिए ललचाने लगे हालांकि उनके लिए बड़ी बाधा अर्जुन थे। जिनके पराक्रम को सभी लोग जानते थे लेकिन लालच में अंधा हुआ मनुष्य जान को जोखिम में डालने से भी नहीं चूकता है। सभी ने मिलकर स्त्रियों और धन को लूटने का फैसला कर लिया।
भीलों (लुटेरों) ने ग्रामीणों को धन का लालच देकर उनकी सहायता करने के लिए तैयार कर लिया। अर्जुन सतर्कता से चल रहे थे लेकिन आने वाले खतरे से अंजान थे। मार्ग में अचानक उनको भीलों ने घेर लिया और स्त्रियों गोपियों और धन पर अधिकार जमाने लगे। अर्जुन ने सभी को भय दिखाकर भगाने का प्रयास किया लेकिन अर्जुन की किसी भी बात का भीलों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तब अर्जुन ने अपना गांडीव उठा लिया और भीलों पर दिव्य बाणों का प्रयोग करना चहा लेकिन, अर्जुन हैरान रह गए।
अर्जुन बार-बार मंत्र बोलकर दिव्यास्त्रों को बुला रहे थे लेकिन दिव्याशास्त्र प्रकट नहीं हुए। अर्जुन का दिव्य गांडीव भी सामान्य धनुष के जैसा बन गया। महाभारत युद्ध में पूरी कौरव सेना को पराजित करने वाले अर्जुन आश्चर्य में थे कि उनकी शक्तियों को क्या हो गया है।
एक-एक बाण से अर्जुन भीलों के समूह पर प्रहार कर रहे थे। भीलों ने अग्निदेव से प्राप्त अक्षय तुनीर, जिनमें बाण कभी समाप्त नहीं होते थे उसे भी तोड़ दिया और अर्जुन को पराजित करके द्वारिका की स्त्रियों और धन संपदा को अर्जुन के देखते-देखते लुटकर चले गए।
अर्जुन शोक में डुबे हुए थे और रो रहे थे। भीलों (लुटेरों) से पराजित अर्जुन किसी तरह से महर्षि व्यास के पास पहुंचे और पूरी स्थिति बताई। व्यासजी ने बताया कि दरअसल तुम जिस शक्ति की बात कर रहे हो और जो कुछ शक्तियां तुम्हारे पास थीं वह तो तुम्हारी थी ही नहीं।
सारी शक्तियों के स्वामी तो स्वयं श्रीकृष्ण थे। जब तक वह तुम्हारे साथ थे तब तक उनकी शक्तियां भी तुम्हारी थीं। उनके जाने के साथ वो शक्तियां भी चली गईं।
वेदव्यास जी कहते हैं अर्जुन अब नवयुग का आरंभ हो रहा है समय मे परिवर्तन आ चुका है, तुम्हारा कर्तव्य पूरा हो चूका है, तुम्हारे अस्त्रों सस्त्रो का प्रयोजन खत्म हो चुका है, किसी भी अस्त्र का प्रयोजन तब तक रहता है जब तल संसार को उसकी आवश्यकता होती है, तुम्हे जो विद्या मिली थी वो अब जा चुकी है अब इस युग मे श्रीकृष्ण और तुम रहोगे तो पृथ्वी का संतुलन बिगड़ जाएगा इसलिए श्रीकृष्ण समय से अपने धाम लौट गए....अब यह जो कुछ भी हो रहा है वह उनकी मर्जी से हो रहा है,,,इसलिए तुम्हारे दिव्यास्त्र भीलों से लड़ते हुए काम नही आये l
अर्जुन ने व्यासजी के समझाने पर भगवान श्रीकृष्ण की अंतिम आज्ञा का ध्यान करके उनके प्रपौत्र वज्रनाभजी को यदुवंशियों का राजा बना दिया। वज्रनाभजी उस समय बहुत छोटे थे इसलिए हस्तिनापुर में रहे और पांडवों के स्वर्गारोहण के बाद परीक्षित जी ने इनका ध्यान रखा और बाद में मथुरा मंडल का राजा बना दिया। वज्रनाभ जी के नाम पर भी मथुरा और आस-पास का क्षेत्र व्रजमंडल कहलाता है।
