Monday, 25 November 2024

कथा

 🌳 समय बड़ा बलवान 🌳


तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान।

भिलां लूटी गोपियां, वही अर्जुन वही बाण।।


अर्थात:- समय ही सबसे बड़ा बलवान है, समय ही होता है जो सबको बड़ा या छोटा बनाता है। जैसे एक बार महान धनुर्धर अर्जुन का समय खराब था तो वो भीलों से गोपियों की रक्षा नही कर पाया था।


आइये इस "पौराणिक कथा" के माध्यम से जानते है तुलसीदास जी ने ऐसा क्यों कहा था।


विष्णु पुराण में कथा आती है कि, जब गांधारी और दुर्वासा ऋषि के श्राप से यदुवंशियों का विनाश हो रहा था।


    तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को द्वारका बुलाया और अपने धाम जाने से पूर्व द्वारका की सभी स्त्रियों गोपियों को अपने साथ हस्तिनापुर ले जाओ।


     श्रीकृष्ण और यदुवंशियों के शरीर का अंतिम संस्कार करके अर्जुन जब द्वारिका से निकले तो भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा मानकर उनके साथ भगवान श्री कृष्ण की कई पत्नियां, गोपियां और अन्य यदुवंशियों की स्त्रियां भी द्वारिका से साथ चलने लगीं। द्वारिका से उनकी अंतिम विदाई हो रही थी इसलिए जिनके पास जो धन संपदा थी वह साथ में लेकर नगर से निकल चली।  


मार्ग में अकेले अर्जुन के साथ द्वारिका की स्त्रियां गोपियां और वहां की अपार संपदा के आगमन की सूचना मार्ग में रहने वाले भीलों (लुटेरों) और ग्रामीणों तक पहुंचने लगी। सभी लोग द्वारिका की स्त्रियों और धन संपदा को पाने के लिए ललचाने लगे हालांकि उनके लिए बड़ी बाधा अर्जुन थे। जिनके पराक्रम को सभी लोग जानते थे लेकिन लालच में अंधा हुआ मनुष्य जान को जोखिम में डालने से भी नहीं चूकता है। सभी ने मिलकर स्त्रियों और धन को लूटने का फैसला कर लिया।


भीलों (लुटेरों) ने ग्रामीणों को धन का लालच देकर उनकी सहायता करने के लिए तैयार कर लिया। अर्जुन सतर्कता से चल रहे थे लेकिन आने वाले खतरे से अंजान थे। मार्ग में अचानक उनको भीलों ने घेर लिया और स्त्रियों गोपियों और धन पर अधिकार जमाने लगे। अर्जुन ने सभी को भय दिखाकर भगाने का प्रयास किया लेकिन अर्जुन की किसी भी बात का भीलों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तब अर्जुन ने अपना गांडीव उठा लिया और भीलों पर दिव्य बाणों का प्रयोग करना चहा लेकिन, अर्जुन हैरान रह गए।


अर्जुन बार-बार मंत्र बोलकर दिव्यास्त्रों को बुला रहे थे लेकिन दिव्याशास्त्र प्रकट नहीं हुए। अर्जुन का दिव्य गांडीव भी सामान्य धनुष के जैसा बन गया। महाभारत युद्ध में पूरी कौरव सेना को पराजित करने वाले अर्जुन आश्चर्य में थे कि उनकी शक्तियों को क्या हो गया है। 


    एक-एक बाण से अर्जुन भीलों के समूह पर प्रहार कर रहे थे। भीलों ने अग्निदेव से प्राप्त अक्षय तुनीर, जिनमें बाण कभी समाप्त नहीं होते थे उसे भी तोड़ दिया और अर्जुन को पराजित करके द्वारिका की स्त्रियों और धन संपदा को अर्जुन के देखते-देखते लुटकर चले गए।


अर्जुन शोक में डुबे हुए थे और रो रहे थे। भीलों (लुटेरों) से पराजित अर्जुन किसी तरह से महर्षि व्यास के पास पहुंचे और पूरी स्थिति बताई। व्यासजी ने बताया कि दरअसल तुम जिस शक्ति की बात कर रहे हो और जो कुछ शक्तियां तुम्हारे पास थीं वह तो तुम्हारी थी ही नहीं। 


    सारी शक्तियों के स्वामी तो स्वयं श्रीकृष्ण थे। जब तक वह तुम्हारे साथ थे तब तक उनकी शक्तियां भी तुम्हारी थीं। उनके जाने के साथ वो शक्तियां भी चली गईं। 


   वेदव्यास जी कहते हैं अर्जुन अब नवयुग का आरंभ हो रहा है समय मे परिवर्तन आ चुका है, तुम्हारा कर्तव्य पूरा हो चूका है, तुम्हारे अस्त्रों सस्त्रो का प्रयोजन खत्म हो चुका है, किसी भी अस्त्र का प्रयोजन तब तक रहता है जब तल संसार को उसकी आवश्यकता होती है, तुम्हे जो विद्या मिली थी वो अब जा चुकी है अब इस युग मे श्रीकृष्ण और तुम रहोगे तो पृथ्वी का संतुलन बिगड़ जाएगा इसलिए श्रीकृष्ण समय से अपने धाम लौट गए....अब यह जो कुछ भी हो रहा है वह उनकी मर्जी से हो रहा है,,,इसलिए तुम्हारे दिव्यास्त्र भीलों से लड़ते हुए काम नही आये l


अर्जुन ने व्यासजी के समझाने पर भगवान श्रीकृष्ण की अंतिम आज्ञा का ध्यान करके उनके प्रपौत्र वज्रनाभजी को यदुवंशियों का राजा बना दिया। वज्रनाभजी उस समय बहुत छोटे थे इसलिए हस्तिनापुर में रहे और पांडवों के स्वर्गारोहण के बाद परीक्षित जी ने इनका ध्यान रखा और बाद में मथुरा मंडल का राजा बना दिया। वज्रनाभ जी के नाम पर भी मथुरा और आस-पास का क्षेत्र व्रजमंडल कहलाता है।

Tuesday, 19 November 2024

હનુમાન ચાલીસા ગુજરાતી

 *🏹 જય શ્રી રામ 🏹*



*_દોહા_*

શ્રી ગુરુ ચરણ સરોજ રજ નિજમન મુકુર સુધારિ ।

વરણૌ રઘુવર વિમલયશ જો દાયક ફલચારિ ॥

બુદ્ધિહીન તનુજાનિકૈ સુમિરૌ પવન કુમાર ।

બલ બુદ્ધિ વિદ્યા દેહુ મોહિ હરહુ કલેશ વિકાર ॥


*_ધ્યાનમ્_*

ગોષ્પદીકૃત વારાશિં મશકીકૃત રાક્ષસમ્ ।

રામાયણ મહામાલા રત્નં વંદે-(અ)નિલાત્મજમ્ ॥

યત્ર યત્ર રઘુનાથ કીર્તનં તત્ર તત્ર કૃતમસ્તકાંજલિમ્ ।

ભાષ્પવારિ પરિપૂર્ણ લોચનં મારુતિં નમત રાક્ષસાંતકમ્ ॥


*_ચૌપાઈ_*

જય હનુમાન જ્ઞાન ગુણ સાગર ।

જય કપીશ તિહુ લોક ઉજાગર ॥ 


રામદૂત અતુલિત બલધામા ।

અંજનિ પુત્ર પવનસુત નામા ॥ 


મહાવીર વિક્રમ બજરંગી ।

કુમતિ નિવાર સુમતિ કે સંગી ॥


કંચન વરણ વિરાજ સુવેશા ।

કાનન કુંડલ કુંચિત કેશા ||


હાથવજ્ર ઔ ધ્વજા વિરાજૈ ।

કાંથે મૂંજ જનેવૂ સાજૈ ॥


શંકર સુવન કેસરી નંદન ।

તેજ પ્રતાપ મહાજગ વંદન ॥


વિદ્યાવાન ગુણી અતિ ચાતુર ।

રામ કાજ કરિવે કો આતુર ॥ 


પ્રભુ ચરિત્ર સુનિવે કો રસિયા ।

રામલખન સીતા મન બસિયા | |


સૂક્ષ્મ રૂપધરિ સિયહિ દિખાવા ।

વિકટ રૂપધરિ લંક જલાવા ॥


ભીમ રૂપધરિ અસુર સંહારે ।

રામચંદ્ર કે કાજ સંવારે ॥ 


લાય સંજીવન લખન જિયાયે ।

શ્રી રઘુવીર હરષિ ઉરલાયે ॥


રઘુપતિ કીન્હી બહુત બડાયી (ઈ) ।

તુમ મમ પ્રિય ભરત સમ ભાયી ॥


સહસ્ર વદન તુમ્હરો યશગાવૈ ।

અસ કહિ શ્રીપતિ કંઠ લગાવૈ ॥


સનકાદિક બ્રહ્માદિ મુનીશા ।

નારદ શારદ સહિત અહીશા ॥


યમ કુબેર દિગપાલ જહાં તે ।

કવિ કોવિદ કહિ સકે કહાં તે ॥


તુમ ઉપકાર સુગ્રીવહિ કીન્હા ।

રામ મિલાય રાજપદ દીન્હા ॥


તુમ્હરો મંત્ર વિભીષણ માના ।

લંકેશ્વર ભયે સબ જગ જાના ॥


યુગ સહસ્ર યોજન પર ભાનૂ ।

લીલ્યો તાહિ મધુર ફલ જાનૂ ॥ 


પ્રભુ મુદ્રિકા મેલિ મુખ માહી ।

જલધિ લાંઘિ ગયે અચરજ નાહી ॥ 


દુર્ગમ કાજ જગત કે જેતે ।

સુગમ અનુગ્રહ તુમ્હરે તેતે ॥ 


રામ દુઆરે તુમ રખવારે ।

હોત ન આજ્ઞા બિનુ પૈસારે ॥


સબ સુખ લહૈ તુમ્હારી શરણા ।

તુમ રક્ષક કાહૂ કો ડર ના ॥ 


આપન તેજ સમ્હારો આપૈ ।

તીનોં લોક હાંક તે કાંપૈ ॥


ભૂત પિશાચ નિકટ નહિ આવૈ ।

મહવીર જબ નામ સુનાવૈ ॥


નાસૈ રોગ હરૈ સબ પીરા ।

જપત નિરંતર હનુમત વીરા ॥ 


સંકટ સે હનુમાન છુડાવૈ ।

મન ક્રમ વચન ધ્યાન જો લાવૈ ॥


સબ પર રામ તપસ્વી રાજા ।

તિનકે કાજ સકલ તુમ સાજા ॥ 


ઔર મનોરથ જો કોયિ લાવૈ ।

તાસુ અમિત જીવન ફલ પાવૈ ॥ 


ચારો યુગ પ્રતાપ તુમ્હારા ।

હૈ પ્રસિદ્ધ જગત ઉજિયારા ॥ 


સાધુ સંત કે તુમ રખવારે ।

અસુર નિકંદન રામ દુલારે ॥


અષ્ઠસિદ્ધિ નવ નિધિ કે દાતા ।

અસ વર દીન્હ જાનકી માતા ॥ 


રામ રસાયન તુમ્હારે પાસા ।

સદા રહો રઘુપતિ કે દાસા ॥ 


તુમ્હરે ભજન રામકો પાવૈ ।

જન્મ જન્મ કે દુખ બિસરાવૈ ॥ 


અંત કાલ રઘુપતિ પુરજાયી ।

જહાં જન્મ હરિભક્ત કહાયી ॥ 


ઔર દેવતા ચિત્ત ન ધરયી ।

હનુમત સેયિ સર્વ સુખ કરયી ॥ 


સંકટ ક(હ)ટૈ મિટૈ સબ પીરા ।

જો સુમિરૈ હનુમત બલ વીરા ॥ 


જૈ જૈ જૈ હનુમાન ગોસાયી ।

કૃપા કરહુ ગુરુદેવ કી નાયી ॥ 


જો શત વાર પાઠ કર કોયી ।

છૂટહિ બંદિ મહા સુખ હોયી ॥ 


જો યહ પડૈ હનુમાન ચાલીસા ।

હોય સિદ્ધિ સાખી ગૌરીશા ॥


તુલસીદાસ સદા હરિ ચેરા ।

કીજૈ નાથ હૃદય મહ ડેરા ॥ 


*_દોહા_*

પવન તનય સંકટ હરણ - મંગળ મૂરતિ રૂપ્ ।

રામ લખન સીતા સહિત - હૃદય બસહુ સુરભૂપ્ ॥


*|| હનુમાન જયંતી ની હાર્દિક શુભકામના ||*

*🙏🏻જય સોમનાથ 🙏🏻*

कथा

 श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा।

  एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-

नारद- बालक तुम कौन हो ?

बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।

नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?

बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।

   तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।

बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?

नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।

बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?

नारद- शनिदेव की महादशा।

  इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।

नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वर्य मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वर्य मांगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-


1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।


2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा।

 

  ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।

       सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है l

Sunday, 17 November 2024

Katha

 #भक्ति_कथा

                      🌟 कैंडिडास की कहानी 🌟


दो भाई थे। एक का नाम कैंडिडास था, जो देवी काली के उग्र रूप कैंडि की पूजा करता था। हालाँकि, उसका भाई भगवान विष्णु का भक्त था। कैंडिडास धनवान था क्योंकि दुर्गा की पूजा करने से अक्सर समृद्धि आती थी। उसके पास एक बड़ा बगीचा और एक भव्य महल था, जबकि वैष्णव भाई के पास केवल एक छोटा सा शालग्राम देवता था, लेकिन उसके पास चढ़ाने के लिए फूल नहीं थे।


हर दिन, वैष्णव भाई अपने भाई के सुंदर बगीचे को उत्सुकता से देखता और सोचता, “यहाँ इतने सारे फूल हैं, फिर भी मेरे शालग्राम के लिए मेरे पास एक भी नहीं है।” एक दिन, जब वह बगीचे को देख रहा था, तो उसने मन ही मन उसमें से एक फूल अपने देवता को अर्पित कर दिया।


अगले दिन, कैंडिडास ने वही फूल तोड़ा और देवी कैंडी को चढ़ाया। उसे आश्चर्य हुआ, वह तुरंत उसके सामने प्रकट हो गई। उसने पूछा, "मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, कैंडिडास। तुम क्या आशीर्वाद चाहते हो?"


आश्चर्यचकित होकर कैंडिडास ने पूछा, "देवी, आज आप क्यों प्रकट हुई हैं? मैं हर दिन आपकी पूजा करता हूँ, फिर भी आज आप अचानक मेरे सामने आई हैं। कृपया मुझे बताएं कि ऐसा क्यों हुआ।"


कैंडी ने उत्तर दिया, "आज आपने मुझे एक फूल भेंट किया जो पहले से ही शालग्राम को चढ़ाया गया था, और उसे प्रसाद बना दिया। उस प्रसाद फूल को देखकर मुझे बहुत खुशी हुई और इसीलिए मैं यहाँ आई हूँ।"


कैंडिडास भ्रमित हो गया और उसने पूछा, "यदि शालग्राम तुमसे श्रेष्ठ हैं, तो तुमने मुझसे कभी क्यों नहीं कहा, 'कैंडिडास, तुम्हें मेरी बजाय शालग्राम की पूजा करनी चाहिए'?"


देवी ने उत्तर दिया, "तुमने मुझसे कभी नहीं पूछा कि सर्वोच्च कौन है। अगर तुमने पूछा होता, तो मैं तुम्हें बता देती। मैं जानती हूँ कि सर्वोच्च कौन है - कृष्ण सर्वोच्च व्यक्तित्व हैं, और शालग्राम उनका पूजनीय रूप है, मैं नहीं। लेकिन चूँकि तुम सच्चे मन से मेरी पूजा कर रहे थे, इसलिए मैंने इसकी अनुमति दी, इस उम्मीद में कि एक दिन तुम जान जाओगे और पूजा का सच्चा उद्देश्य पाओगे।"


यह सुनकर कैंडिडास पश्चाताप से भर गया। उसने कहा, "मुझे अज्ञानता में अपना जीवन बर्बाद करने का बहुत अफसोस है। कृपया मुझे माफ़ कर दें। अब से मैं शालग्राम की पूजा करूँगा।"


देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, "इसमें माफ़ करने जैसी कोई बात नहीं है। मैं तुम्हारे लिए खुश हूँ। जाओ और शालग्राम की पूजा करो।"


पश्चाताप से भरे हुए, कैंडिडास ने अपनी भक्ति और अनुभूतियों को व्यक्त करते हुए कई गीतों की रचना की। बाद में श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं इन गीतों को सुनते थे और आनंद से भर जाते थे।


सीखने योग्य सबक:

यह कहानी हमें सच्ची भक्ति और उच्च सत्यों को स्वीकार करने की विनम्रता का महत्व सिखाती है, जब वे हमारे सामने प्रकट होते हैं। भले ही हम ऐसे मार्ग पर चलना शुरू कर दें जो पूरी तरह से सही न हो, लेकिन एक सच्चा दिल अंततः हमें परम सत्य तक ले जाएगा। कहानी अनुग्रह की परिवर्तनकारी शक्ति पर भी जोर देती है, यह दिखाते हुए कि सच्ची पूजा दिव्य समझ और पूर्ति लाती है।


प्रार्थना:


हे परमपिता परमेश्वर, कृपया मुझे भक्ति का सच्चा मार्ग समझने में मदद करें। भले ही मैं गलतियाँ करूँ, मेरा हृदय हमेशा ईमानदार रहे, और मैं आपके दिव्य मार्गदर्शन के लिए खुला रहूँ। मेरी पूजा मुझे गहन अनुभूतियों की ओर ले जाए, और मैं आपकी उस तरह से सेवा करूँ जो आपको वास्तव में प्रसन्न करे। जिस तरह कैंडिडास ने विनम्रता और ईमानदारी के माध्यम से आपकी कृपा पाई, उसी तरह मेरी भक्ति आपकी प्रेमपूर्ण सेवा में खिले।

Thursday, 14 November 2024

कार्तिक महात्मय

 . कार्तिक माहात्म्य 


                            अध्याय–34

          

          ऋषियों ने पूछा–‘हे सूतजी! पीपल के वृक्ष की शनिवार के अलावा सप्ताह के शेष दिनों में पूजा क्यों नहीं की जाती ?

          सूतजी बोले–‘हे ऋषियों! समुद्र-मंथन करने से देवताओं को जो रत्न प्राप्त हुए, उनमें से देवताओं ने लक्ष्मी और कौस्तुभमणि भगवान विष्णु को समर्पित कर दी थी। जब भगवान विष्णु लक्ष्मी जी से विवाह करने के लिए तैयार हुए तो लक्ष्मी जी बोली–‘हे प्रभु! जब तक मेरी बड़ी बहन का विवाह नहीं हो जाता तब तक मैं छोटी बहन आपसे किस प्रकार विवाह कर सकती हूँ इसलिए आप पहले मेरी बड़ी बहन का विवाह करा दे, उसके बाद आप मुझसे विवाह कीजिए। यही नियम है जो प्राचीनकाल से चला आ रहा है।’

          सूतजी ने कहा–‘लक्ष्मी जी के मुख से ऐसे वचन सुनकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी की बड़ी बहन का विवाह उद्दालक ऋषि के साथ सम्पन्न करा दिया। लक्ष्मी जी की बड़ी बहन अलक्ष्मी जी बड़ी कुरुप थी, उसका मुख बड़ा, दाँत चमकते हुए, उसकी देह वृद्धा की भाँति, नेत्र बड़े-बड़े और बाल रुखे थे। भगवान विष्णु द्वारा आग्रह किये जाने पर ऋषि उद्दालक उससे विवाह कर के उसे वेद मन्त्रों की ध्वनि से गुंजाते हुए अपने आश्रम ले आये। वेद ध्वनि से गुंजित हवन के पवित्र धुंए से सुगन्धित उस ऋषि के सुन्दर आश्रम को देखकर अलक्ष्मी को बहुत दु:ख हुआ। वह महर्षि उद्दालक से बोली–‘चूंकि इस आश्रम में वेद ध्वनि गूँज रही है इसलिए यह स्थान मेरे रहने योग्य नहीं है इसलिए आप मुझे यहाँ से अन्यत्र ले चलिए।’

          उसकी बात सुनकर महर्षि उद्दालक बोले–‘तुम यहाँ क्यों नहीं रह सकती और तुम्हारे रहने योग्य अन्य कौन सा स्थान है वह भी मुझे बताओ।’ अलक्ष्मी बोली–‘जिस स्थान पर वेद की ध्वनि होती हो, अतिथियों का आदर-सत्कार किया जाता हो, यज्ञ आदि होते हों, ऐसे स्थान पर मैं नहीं रह सकती। जिस स्थान पर पति-पत्नी आपस में प्रेम से रहते हों पितरों के निमित्त यज्ञ होते हों, देवताओं की पूजा होती हो, उस स्थान पर भी मैं नहीं रह सकती। जिस स्थान पर वेदों की ध्वनि न हो, अतिथियों का आदर-सत्कार न होता हो, यज्ञ न होते हों, पति-पत्नी आपस में क्लेश करते हों, पूज्य वृद्धो, सत्पुरुषों तथा मित्रों का अनादर होता हो, जहाँ दुराचारी, चोर, परस्त्रीगामी मनुष्य निवास करते हों, जिस स्थान पर गायों की हत्या की जाती हो, मद्यपान, ब्रह्महत्या आदि पाप होते हों, ऐसे स्थानों पर मैं प्रसन्नतापूर्वक निवास करती हूँ।’

          सूतजी बोले–‘अलक्ष्मी के मुख से इस प्रकार के वचन सुनकर उद्दालक का मन खिन्न हो गया। वह इस बात को सुनकर मौन हो गये। थोड़ी देर बाद वे बोले कि ‘ठीक है, मैं तुम्हारे लिए ऐसा स्थान ढूंढ दूँगा। जब तक मैं तुम्हारे लिए ऐसा स्थान न ढूंढ लूँ तब तक तुम इसी पीपल के नीचे चुपचाप बैठी रहना।’ महर्षि उद्दालक उसे पीपल के वृक्ष के नीचे बैठाकर उसके रहने योग्य स्थान की खोज में निकल पड़े परन्तु जब बहुत समय तक प्रतीक्षा करने पर भी वे वापिस नहीं लौटे तो अलक्ष्मी विलाप करने लगी। जब वैकुण्ठ में बैठी लक्ष्मी जी ने अपनी बहन अलक्ष्मी का विलाप सुना तो वे व्याकुल हो गई। वे दुखी होकर भगवान विष्णु से बोली–‘हे प्रभु! मेरी बड़ी बहन पति द्वारा त्यागे जाने पर अत्यन्त दुखी है। यदि मैं आपकी प्रिय पत्नी हूँ तो आप उसे आश्वासन देने के लिए उसके पास चलिए।’ लक्ष्मी जी की प्रार्थना पर भगवान विष्णु लक्ष्मी जी सहित उस पीपल के वृक्ष के पास गये जहाँ अलक्ष्मी बैठकर विलाप कर रही थी।

          उसको आश्वासन देते हुए भगवान विष्णु बोले–‘हे अलक्ष्मी! तुम इसी पीपल के वृक्ष की जड़ में सदैव के लिए निवास करो क्योंकि इसकी उत्पत्ति मेरे ही अंश से हुई है और इसमें सदैव मेरा ही निवास रहता है। प्रत्येक वर्ष गृहस्थ लोग तुम्हारी पूजा करेगें और उन्हीं के घर में तुम्हारी छोटी बहन का वास होगा। स्त्रियों को तुम्हारी पूजा विभिन्न उपहारों से करनी चाहिए। मनुष्यों को पुष्प, धूप, दीप, गन्ध आदि से तुम्हारी पूजा करनी चाहिए तभी तुम्हारी छोटी बहन लक्ष्मी उन पर प्रसन्न होगी।’

          सूतजी बोले–‘ऋषियों! मैंने आपको भगवान श्रीकृष्ण, सत्यभामा तथा पृथु-नारद का संवाद सुना दिया है जिसे सुनने से ही मनुष्य के समस्त पापों का नाश हो जाता है और अन्त में वैकुण्ठ को प्राप्त करता है। यदि अब भी आप लोग कुछ पूछना चाहते हैं तो अवश्य पूछिये, मैं उसे अवश्य कहूँगा।’

          सूतजी के वचन सुनकर शौनक आदि ऋषि थोड़ी देर तक प्रसन्नचित्त वहीं बैठे रहे, तत्पश्चात वे लोग बद्रीनारायण जी के दर्शन हेतु चल दिये। जो मनुष्य इस कथा को सुनता या सुनाता है उसे इस संसार में समस्त सुख प्राप्त होते हैं।

*🔔🌼🌿🙏हरि ॐ🙏🌿🌼🔔*

*┏╮/╱ कार्तिक माह की*

*╰ 🌹┛उन्तीसवी कहानी।।🪔))*

*╱/ ╰┛*इल्ली घुण की कहानी (पंचतीर्थ्या)*

*⚊⚊⚊⚊✬( हरि ॐ)✬⚊⚊⚊⚊*

 

एक इल्ली और घुण था । 

इल्ली बोली आओ घुण कार्तिक नहायें। 

तो घुण बोला तू ही नहा लें। 


मैं तो नहीं नहाऊँगा। 

बाद में इल्ली तो राजा की लड़की के पल्ले लगकर चली गई व काती नहाती रही और घुण नहीं नहाया । 


कार्तिक उतरते ही दोनों मर गये। 

बाद में इल्ली ने कार्तिक नहाने के कारण राजा के घर जन्म लिया और घुण राजा के घर गधा बना । 


राजा ने बेटी का विवाह का सावा निकलवाया। बेटी सुसराल जाने के लिए विदा होने लगी तो बेटी की बैलगाड़ी रूक गई। 


राजा- रानी बोले कि बैलगाड़ी क्यों रूक गई है। बेटी तुझे जो चाहिए माँग ले । 

तब लड़‌की बोली कि वह गधा मुझे चाहिए तो वह बोले यह क्या माँगा, यह मत ले जा चाहे और धन-दौलत ले जा। 


परन्तु वह नहीं मानी और कहा मुझे तो यही गधा चाहिए तो वह गधा रथ के साथ बांध दिया। 

जब गधे को साथ बाँध दिया तो वह फुदक-फुदक कर भागने लगा । 


लड़की महल में जाने लगी तो उसे सीढ़ी के नीचे बाँध दिया। 

जब सीढ़ी उतरने लगी तो गधे ने कहा कि लड़की थोड़ा पानी पिला दो। 


तब लड़की ने कहा मैने पहले ही कहा कि आ कार्तिक नहा ले तब तूने कहा था कि मैं तो बाजरा खाऊँगा और ठण्डा ठण्डा पानी पीऊँगा। 


उनकी आपस की यह बात दोरानी-जिठानी ने सुन ली और देवर को सिखा दिया कि तुम क्या जादूगरनी लायें हो जो जानवर से बात करती हैं। 


तो वह बोला कि कानों सुनी नहीं मानता, आखों से देखकर मानूंगा। दूसरे दिन वह छुप कर बैठ गया और देखा कि रानी महल से नीचे उतरी तो गधा फिर वहीं बात बोला और रानी ने जवाब भी दिया, 


अब राजकुमार बोला कि रानी तू जानवर से क्यों बात कर रही है। 

तू बता दे नहीं तो तलवार से मारूंगा। 


राम ने कहा कि औरत का भेद मत पूछो। 

तब राजा ने कहा कि मैं तेरा पूरा भेद लूंगा। 


रानी ने कहा कि पिछले जन्म में मैं तो इल्ली थी और वह घुण था। 

तब मैंने कहा कि आ घुण कार्तिक नहा लें तो यह नहाया नहीं जिससे यह गधा बन गया और मैं रानी के पल्ले के लगकर कार्तिक नहाई तो मैंने राजा के घर जन्म लिया। 


यह बात सुनकर राजा ने कहा कि कार्तिक में नहाने का क्या फल है? 

तो रानी ने कहा कि कार्तिक नहाने से मैं आपके घर में राज-पाट कर रही हूँ। 


तब राजा ने कहा कि इतना फल है तो हम दोनों अब जोड़े से नहायेंगे और बहुत दान-पुण्य करेंगे जिससे आगे हमें और ज्यादा सुख मिलेगा। 


दोनों जने कार्तिक नहाने लगे तो राजा के घर में बहुत धन-सम्पत्ति हो गई। हे कार्तिक महाराज जैसा इल्ली को सुख दिया वैसा सबको देना ।

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🎊🙇🏻‍♀️जय श्री कृष्ण शरणं मम🙇🏻‍♀️🎊

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हरे-कृष्ण-हरे-कृष्ण कृष्ण-कृष्ण-हरे-हरे

    हरे-राम-हरे-राम राम -राम -हरे-हरे

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हरे-कृष्ण-हरे-कृष्ण कृष्ण-कृष्ण-हरे-हरे

    हरे-राम-हरे-राम राम -राम -हरे-हरे

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Saturday, 2 November 2024

ધરણીધર - મીની દ્વારકા

ગુજરાત માં સનાતન ધર્મ ને વટલાવવા આવેલ દિલ્લી ના સુલાતનો ને ધરણીધર ભગવાન નો પરચો.



 સ્થાન: ઢીમા તાલુકો વાવ બનાસકાંઠા ગુજરાત 

https://youtu.be/jye32eqxiq0?si=GqkB6jJiVFb-L2I8